Monday, December 31, 2012

और इस तरह मैंने मान ली स्मार्ट इंडियन और मृत्युंजय कुमार की बात। शुभकामना दीजिये कि मेरा संकल्प पूरा हो। 

संकल्प

समय किसी उफनती धारा के किनारे डगमगा रहा है। थोड़ी ही देर में मिट्टी  की तरह भरभरा कर बहते पानी में जा मिलेगा। मौजूदा साल आशीर्वाद देकर आगे बढ़ते किसी  संन्यासी की भाँति ओझल होकर चला जायेगा। इसकी जगह एक नया साल ले लेगा, ठीक वैसे ही, जैसे बासी सांस के मुंह से निकलते ही ताज़ी हवा फिर से नई  सांस बन कर जीवन की आस बढ़ा देती है।
मैंने नए साल का "संकल्प" ले लिया है।
मैं इस साल अपने हर दिन को पिछले बीते दिन पर श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करूंगा। और हाँ, हर महीने कुछ ऐसे लोगों के साथ मिलकर थोड़ा समय ज़रूर गुज़ारूंगा,जो इस समय को बिता कर मन से खुश हों।
आप सभी को नव वर्ष की अनेकों मंगल कामनाएं!
"कल आपको एक चावल के दाने के बराबर ख़ुशी मिले। परसों दो दानों के बराबर। उस से अगले दिन चार दानों के बराबर। और उस से भी अगले दिन आठ दानों के बराबर। इसी तरह वर्ष- भर यह गणित चलती रहे।"  

Friday, December 28, 2012

रोगी हिन्दुस्तान और हकीम सिंगापुरी

जो बात कल तक परदे में थी, बाहर भी आकर रही।
सूरज भी एक फेरे में एक बार उगता है, और एक ही बार डूबता है। लेकिन भारत के लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। वह एक घटना से भी बार-बार शर्मसार हो सकता है।
राजधानी की सड़कों पर भविष्य की एक डाक्टर के साथ नियति ने पैशाचिक दरिंदगी के साथ पुरुष का जो रूप दिखाया, उस से हिंदुस्तान सकते में ही था कि एक महिला का फफूंद और कीड़े पड़ा घिनौना बयान आ गया कि पीड़िता को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था।
देश इसे सुन कर अपने  भूत-भविष्य-वर्तमान पर मनन कर ही रहा था कि एक माननीय नेता के मुखारविंद   से ऐसे उदगार फूटे-"जो महिलाएं ऐसी घटनाओं पर विरोध-प्रदर्शन करती हैं, वे तैयार होकर डिस्को आदि में क्यों आ जाती हैं?" उनका आशय यह था कि  डिस्कोथेक  जैसी जगह तो केवल पुरुषों के उछलने-कूदने के लिए है।
और फिर देश ने अपनी महिमा पर एक वार और झेला-"पीड़िता का इलाज यहाँ नहीं हो पा रहा, उसे सिंगापूर रवाना किया गया है।"अर्थात देश के हजारों हस्पताल इलाज के लिए नहीं हैं, वे तो मोटे डोनेशनों से डिग्री बांटने और आरक्षणों से  नौकरियां देने के लिए हैं। सच है, जिस देश में डाक्टर की 'ऐसी' क़द्र होगी, वह इलाज के लिए दूसरे देशों का मुंह ही ताकेगा। ठीक है???       

Wednesday, December 26, 2012

उसकी आँखों में आंसू थे , इसलिए मैंने ऐसा कहा

वह बीच चौराहे पर बैठ कर गठरी बाँध रहा था। न जाने क्या-क्या था, सिमटने में ही नहीं आती थी गठरी। उसकी आँखों में आंसू थे। मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, कोई इतना कुछ ले जा रहा हो,तो फिर रोने की क्या बात? मैंने उससे पूछ ही लिया- "बाबा तुम्हारे पास इतना ढेर सारा असबाब है, फिर क्यों रो रहे हो?"
उसने कातर दृष्टि से मुझे देखा, और बोला-"जितना है, उससे कहीं ज्यादा तो मैं छोड़ कर जा रहा हूँ।"
"अरे, तो उसे भी ले जाओ, तुम्हें कौन रोक रहा है?" मैंने कहा।
वह बोला - " बेटा ,  मैं उसे ले नहीं जा सकता, मुझे इजाज़त नहीं है। "
" तो फिर ख़ुशी-ख़ुशी जाओ, वैसे भी कुछ लेकर जाने से तो कुछ देकर जाना ही हमेशा अच्छा होता है।" मैंने कहा।
वह ग़मगीन होकर बोला- " बेटा , मुझे कुछ छोड़ कर जाने का गम नहीं है, मैं तो इसलिए उदास हूँ, कि  फिर अब मेरा यहाँ आना कभी नहीं होगा, मैं बस यहाँ चार दिन का मेहमान हूँ । " इतना कहते ही उसके आँसूं और भी तेज़ी से बहने लगे।
मैंने भरे गले से पूछा- " तुम्हारा नाम क्या है बाबा?"
वह बोला- "दो हज़ार बारह।"
मैंने उस से कहा- "ओह, तुम ख़ुशी से जाओ बाबा, खुदा हाफिज! तुम्हारे ये आंसू बेकार नहीं जायेंगे"
"क्यों?" उसने हैरत से कहा।
मैं बोला- "इस पानी में  दर्द घुले हैं,
               इस पानी में प्यास घुली है,
               इससे वाबस्ता हैं रिश्ते,
               इस पानी में आस घुली है,
               इस पानी में नमक है जब तक,
               तब तक है जीवन स्वादिष्ट!"



Friday, December 21, 2012

हम कितने किसके हैं?

यदि कोई किसी को मार देता है, तो सबके पास ये विकल्प हैं-
1.उस से डर कर सब छिप जाएँ, कि  वह औरों को भी मार देगा।
2.उसे भी मार दिया जाए, और मारने की प्रक्रिया ऐसी अपनाई जाए कि  उसे देख कर कोई अपने होश-हवास में किसी और को मारने के बारे में भूल कर भी न सोचे। 
3.मारने वाला उसके परिजनों को कुछ रूपये का मुआवजा दे, जिसे उसने मार दिया है।
4.सब मिलकर मरने वाले के परिवार को ढाढ़स बंधाएं।
5.मारने वाले को पकड़ कर सीमित भोजन देते हुए ऐसी कोठरी में बंद कर दिया जाए, जहाँ उसके ह्रदय में पश्चाताप और ह्रदय परिवर्तन की संभावना जन्म ले।
यदि इनमें से आपको अंतिम विकल्प पसंद आ रहा है, तो आप संविधान, क़ानून, व्यवस्था के ज्यादा नज़दीक हैं। यदि वास्तव में आपका उत्तर यही है,तो अपनी जानकारी में इतना इजाफा और कर लें, कि  "ऐसा करने में कितना समय लगेगा, कितना पैसा लगेगा, मारने वाले को ही सज़ा होगी, कुछ इनाम लेकर मारने वाला, मरने वाला, देखने वाला, बचने वाला सबके बदल दिए जाने आदि, किसी बात की कोई गारंटी नहीं होगी।"
जब खंडहर-जर्जर हो जाने पर पुराने भवन तोड़ कर या छोड़ कर नए भवन बनाए जा सकते हैं, पुराने लोग बूढ़े हो जाने पर उनकी जगह नए नियुक्त हो सकते हैं, तो पुराने कानूनों को बदलने में क्या बाधा हो सकती है?
हमारा क़ानून कातिल के सारे हित और अधिकार सोच लेता है, किन्तु जो मरा, उसके हितों को सोचने की चिंता नहीं करता। क्या यह "न्याय" है?
हम कितने सगे न्याय के हैं, और कितने अन्याय के?

Thursday, December 20, 2012

बुरा और अच्छा होने में काफी समानता है

यदि वास्तव में कल, अर्थात 21 दिसम्बर 2012 को सब कुछ समाप्त हो रहा है, तो भी हमारी आशाएं समाप्त नहीं हो जातीं। जो कुछ होगा वह हो, कोई इसमें क्या कर सकता है? लेकिन फिर भी, यदि सब कुछ ख़त्म होने के बाद, कभी दोबारा दुनिया आरम्भ होती है, तो उसमें कम से कम ऐसा तो न हो-
1,यदि कोई भी, कहीं भी,किसी भी कष्ट में हो, तो कोई भी ख़ुशी न मना रहा हो।
2.कोई भी किसी की मृत्यु, या प्राण-घातक आक्रमण का कारण न बने।
3.कोई भी अपने को किसी भी दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण या प्रिय न समझे।
4. नई दुनिया में इतनी गणित सबको आती हो, कि  वह संसार में किसी भी चीज़ का अपना हिस्सा जान सके, और उस से कण भर भी अधिक लेना स्वीकार न करे।
मुझे लगता है कि  हम में से 90 प्रतिशत लोग यह सोचने लगे हैं कि  यदि नई  दुनिया में ऐसा ही नीरस, उबाऊ,बोझल जीवन हो, तो इस से अच्छा है कि  दुनिया दोबारा बने ही नहीं।
दुनिया तो ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें हम मन-मर्ज़ी से साम-दाम-दंड-भेद कमा सकें। दूसरे कैसे भी कष्ट में हों , हम तो मौज मना सकें, दूसरे चाहे भूखे मरें, हमारे भण्डार सदा भरे रहें, अपने सुखके लिए दूसरों का क़त्ल भी करना पड़े तो हमें कोई ऐतराज़ न हो।
लेकिन सोचिये, यदि ऐसी ही दुनिया दोबारा बनानी हो, तो इसी को क्यों न रहने दिया जाए। ईश्वर भी बिना बात के परिवर्तन की ज़हमत क्यों उठाएगा? इसलिए आशा यही है कि कल कुछ नहीं होगा।हम और हमारी दुनिया, ऐसे ही रहेंगे, बदस्तूर!   

Wednesday, December 19, 2012

उगती प्यास दिवंगत पानी

मैंने एक बार आपसे कहा था कि किसी भी लेखक को हर उस विधा में लिखना चाहिए, जिसमें वह लिखना चाहे। मैंने भी उपन्यास, कहानी, कविता, निबन्ध, संस्मरण, लघुकथा, नाटक, क्षणिका, ग़ज़ल, गीत, व्यंग्य, समीक्षा, दोहे, छंद, यहाँ तक कि  "शब्दावली" भी, सब लिखा।
किन्तु प्रकाशकों-संपादकों ने मेरी "कविता" को थोड़ा उदासीनता से छापा। आप यह जानना चाहेंगे, कि  मुझे इस 'उदासीनता' की पहचान कैसे हुई? छाप तो दिया ही न ?
मैं बताता हूँ। मैं जब भी किसी अखबार या पत्रिका को कोई कविता भेजता था, तो वह छप तो जाती थी, किन्तु वे मुझे कई बार लिखते थे, कि  अब कोई ताज़ा कहानी भेजिए। बहरहाल, जब भी कहानी भेजी, कभी किसी ने यह नहीं कहा कि  अब कविता भेजिए। बल्कि कई बार तो ऐसा भी हो गया, कि  कुछ न भेजा,तो मित्र-संपादकों ने लिखा कि  कविता 'ही भेज दीजिये'। अब बताइये, समझदार को इशारा ही काफी है या नहीं?
इस तरह मेरी कुछ[ सब नहीं] कवितायेँ मेरे पास थीं। तभी मैंने एक युवा ब्लॉगर "मन्टू कुमार" के ब्लॉग पर कुछ कवितायें पढ़ीं। मुझे दाल में कुछ काला लगा। मतलब यह, कि  ब्लॉगर तो किशोर वय का, लेकिन कवितायें प्रौढ़। सच कहूं, मुझे लगा कि या तो कोई मझा हुआ लेखक पुरानी फोटो के साथ लिख रहा है,या किसी बच्चे के हाथ कोई डायरी लग गयी है।
संयोग देखिये, कुछ ही दिनों में मन्टू से मेरा प्रत्यक्ष मिलना हो गया। उसने मेरी शंका का निवारण मुस्कराते हुए किया, और मेरी ही मेज़ पर बैठ कर कुछ ताज़ा कवितायें लिख कर मुझे दीं।
उसकी और मेरी आयु में लगभग चालीस वर्ष का अंतर है। पर हम दोनों अपनी कुछ कवितायें जल्दी ही आपको पढवा रहे हैं।         

Tuesday, December 18, 2012

अब क्रूरता पर थोड़ा हक़ बन गया है हमारा

प्रगति और विकास के साथ हमने अपने को बचाने के कई सफल उपाय कर लिए। जो लोग ला-इलाज बीमारियों से मरते थे, उनके लिए हमने पूरी नहीं, तो काफी मात्रा में जिंदगी की संभावनाएं पैदा कर लीं। पैदा होते ही जो शिशु जीवित नहीं रह पाते थे, उनकी दर हमने कम करने की लगातार कोशिश करके कुछ सफलता पा ली। युद्धों में सैनिकों का शहीद हो जाना बहुत सीमित हो गया। प्राकृतिक आपदाओं पर प्रभावी नियंत्रण कर लिया गया। जो लोग समाज-कंटकों द्वारा मार दिए जाते थे उनकी सुरक्षा के लिए काफी-कुछ कर लिया गया। प्रशासनिक तरीके से भी, और वैज्ञानिक तरीकों से भी।
लेकिन एक नासूर समाज में अब भी है, और वह दिनों- दिन बेख़ौफ़ और निरंकुश ही होता जा रहा है। वह है इस समाज में बलात्कार। इसके कारण चाहे जो भी हों, लेकिन यह अगर समाज में रहेगा, तो समाज को "असामाजिक" कहने से हमें कोई नहीं रोक सकता। इसके लिए कुछ न कुछ ठोस किया जाना बहुत ज़रूरी है। चाहे इसके लिए हमारे क़ानून को "क्रूर" ही क्यों न होना पड़े।
एक सुझाव स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के लिए भी। जिस तरह वे बचपन में ही कई भीषण बीमारियों को ता-उम्र रोके रखने वाले टीके बना देते हैं, क्या कोई ऐसा टीका नहीं विकसित किया जा सकता, जिसे बचपन में ही लगा देने पर कोई भी यौन सम्बन्ध बनाना तभी संभव हो जब यौन सहयोगी की "शारीरिक" सहमति प्राप्त हो, अन्यथा ऐसा प्रयास परवान ही न चढ़ सके।

विक्रमादित्य होते तो क्या करते?

अपने पराक्रम के प्रसार और आकलन के लिए पहले अश्वमेघ यज्ञ किये जाते थे। यज्ञ करने वाले शौर्यवान सम्राट अपना घोड़ा स्वच्छंद विचरण के लिए खुला छोड़ देते थे। वह सारे में घूमता और उसे कोई न रोकता। जो उसे रोके, यह माना जाता था, कि  वह राजा का आधिपत्य स्वीकार नहीं करता। ऐसे में राजा को जाकर उसकी ललकार का जवाब देना पड़ता था, और उसे परास्त करना पड़ता था। घोड़े के सर्वत्र निर्बाध घूम लेने के बाद ही राजा को "चक्रवर्ती" सम्राट की उपाधि प्राप्त होती थी। इस यज्ञ के सफल निष्पादन के लिए विक्रमादित्य का नाम विख्यात है।
इतिहास की इस कीर्तिमयी परंपरा का आगमन कुछ परिवर्तनों के साथ मौजूदा दौर में भी देखा जा सकता है। चक्रवर्ती सम्राट बनने की ख्वाहिश रखने वाले लोग अब 'कागज़ के घोड़े' को दौड़ा देते हैं। फिर इस घोड़े के संभावित रास्तों पर लोगों की फुसफुसाहटों का आकलन किया जाता है। इसमें गुप्तचरों का सहयोग लिया जाता है। इन्हें "पूर्व सर्वेक्षण" कहा जाता है।यदि फुसफुसाहटें कर्ण-प्रिय, अर्थात कानों को लुभाने वाली न हों, तो एक्शन लिए जाते हैं। यदि फिर भी दिल्ली की दाल गलती न दिखे, तो और बातों में ध्यान लगाया जाता है। 
यदि 20 दिसंबर को कहने को कुछ न बचे, तो अहमदाबाद से ध्यान हटा कर  2014 का इंतज़ार किया जाता है।

Monday, December 17, 2012

वे झूठ नहीं बोलते, भोले हैं

मेरे बहुत से कवि मित्र कहते हैं,कि  हम तो खूब कवितायें लिखते हैं, और भी लिखें, पर क्या करें, कोई पढ़ता ही नहीं।
मुझे लगता है, कि  लोग उनकी कविताओं को ज़रूर पसंद करते होंगे, लेकिन उनके नाम को नहीं। वे थोड़ी देर के लिए अपनी कविताओं के पास से परे हट जाएँ, तो शायद लोग उन्हें पढ़ लें।
ठीक वैसे ही, जैसे आप चिड़ियों को दाना डालते हैं तो वे उड़ जाती हैं। आप वहां से हट जाइये, फिर धीरे-धीरे वे आ जायेंगी। दाना भी खा लेंगी। दरअसल वे आपके चंगुल में नहीं आना चाहतीं।
इसी तरह पाठक भी आपका मानस-आधिपत्य स्वीकारना नहीं चाहते। जब आप उनके सामने नहीं होंगे, तो वे आपको पढ़ लेंगे। उनमें जिज्ञासा भी है, और उन्हें मनोरंजन भी चाहिए। लेकिन जब तक अपनी रचनाओं पर आप लदे हैं, या आपका नाम लदा है, तब तक पाठक दूर से ही सलाम करेंगे।आपके सामने कैसे पढ़ें? आप उनके चेहरे के भाव ताड़ नहीं जायेंगे?
हाँ,एक बार आप ब्रांड बन गए तो फिर बात अलग है। आप लाख कहें कि  मेरी ये रचना तो यूँही है, फिर भी वे उसे पढ़ डालेंगे। क्योंकि उन्हें आपके विचार में दिलचस्पी हो न हो , उन्हें ये तो सीखना है, कि  'ब्रांड' कैसे बनते हैं। 
आप खुद सोचिये, यदि कपड़ा बुनने वाला जुलाहा,[ मुझे क्षमा करें, मैं गारमेंट फैक्ट्री के वर्कर को जुलाहा कह रहा हूँ] हर कपड़े पर अपना नाम लिखता जाए, तो आप अपने बदन पर ऐसा कपड़ा टांगना चाहेंगे? मैंने कहा न, ब्रांड की बात अलग है। क्योंकि ब्रांड तो सुन्दर विज्ञापनों से सज कर ही कोई बनता है।   

इंदिरा गांधी इस बात पर संतोष प्रकट करतीं ?

उन्होंने राजाओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति की मुहिम इसलिए आरम्भ की थी, कि प्रशासन में प्रगतिशील दृष्टिकोण को पारंपरिक सोच पर तरजीह दी जा सके। उनका मानना यह था, कि  किसी को कोई बड़ा दायित्व केवल इसलिए न मिले, कि  वह उस दायित्व के मूल हितग्राही से रिश्ता रखता है, पर साथ ही वे इस बात की हिमायती भी थीं, कि  किसी को केवल इस आधार पर बड़े दायित्व को ग्रहण करने से वंचित न किया जाए, कि  वह मूल हितग्राही से रिश्ता रखता है।मतलब यह, कि  "किसी अधिकार के साथ कितने भी कर्त्तव्य जुड़ें हों, वह अधिकार उसे तभी मिले, जब वह उनके योग्य अपने को सिद्ध कर चुका  हो, या यह सक्षमता रखता हो।" पूर्व-सक्षमता की परख के मामले में अवश्य उनके कुछ विवादास्पद विचार हो सकते हैं।
ऐसे में प्रधान-मंत्री पद के किसी भी ऐसे दावेदार को वह पसंद ही करतीं, जो किसी विरासत से न जुड़ा हो।वह किस पार्टी से हो, इस पर उनके विचार क्या होते, इस बात का अनुमान इस बात से लगता है, कि  उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस सिंडिकेट के सभी शीर्ष नेताओं के निर्णय से इत्तफाक न होने पर पुरानी बहती नदी से एक अलग धारा, 'इंदिरा-कांग्रेस' निकाल ही दी थी।  

Saturday, December 15, 2012

चोट लगने पर बदन को कस कर दबाना और मौन रह कर मोमबत्ती जला देना, एक ही बात है

 बात समझ में नहीं आई। ये कैसे हो सकता है? चोट लगने पर बदन को दबाना तो "रिफ्लेक्स एक्शन" है। हाथ खुद-ब-खुद वहां चला जाता है। यह तो शरीर में प्रकृति द्वारा मस्तिष्क की निगरानी में किया गया तात्कालिक उपचार है। क्योंकि चोट शरीर में पूर्व-निर्धारित नहीं है, इसलिए इसके स्वतः इलाज की कोई पूर्व-आयोजना भी नहीं है। चोट के लगते ही, जैसे सांप के काटते ही, मांस-पेशियों की बनावट में उथल-पुथल हो जाती है। कहीं वे एक पर एक चढ़ जाती हैं, तो कहीं कोशिकाओं और ऊतकों में अंतराल आ जाते हैं। इस अव्यवस्था को साधने के लिए हाथ तत्काल वहां जाता है। कस कर दबाने से एक तो अस्थि-मज्जा के सीमेंट और पत्थर की तरह जमने की प्रक्रिया होती है, दूसरे आस-पास से रक्त प्रवाह बाधित होने से भीतर उपजा दर्द समूचे शरीर और मस्तिष्क में महसूस होने से बच जाता है।
इसका मौन होकर मोमबत्ती जलाने से क्या लेना-देना?
"एक बीस वर्षीय युवक अपनी उस जन्मदायिनी माँ , बचपन में जिसके एक पल को भी ओझल होने पर विचलित हो जाता है, की जीवन-लीला को अपने हाथों समाप्त करके वहशियाना बदहवासी में उसके कार्य-स्थल पर पहुँचता है, और बीस निर्दोष जिंदगियों को समाप्त करके अपने जीवन की इतिश्री कर लेता है।"
इस घटना को आधुनिक समाज के बदन पर एक चोट मानिए। अब आँखों को आंसुओं के समंदर में डबडबाये बजरे की भाँति झुका कर हाथ में एक जलती कैंडल थाम लीजिये, और इंशा-अल्लाह कुछ न बोलिए ...
बताइये, कहाँ फर्क है?   

Friday, December 14, 2012

समय माफ़ी मांगने का अधिकार भी कहीं खो न दे, अमेरिका में

उनके बदन पर एक हलकी सी खरोंच भी देखने वालों को हिला देती है, बच्चे होते ही ऐसे हैं। वे अपने खेल में अपनी मर्ज़ी से, अपनी गलती से भी आहत हो जाते हैं तो उनके माँ -बाप अपने को अपराधी समझने लगते हैं।
आखिर क्या हुआ होगा, कैसे हुआ होगा, जब किसी इंसान के शरीर पर रखे ज़ख़्मी और दिवालिया 'दिमाग' ने उन पर अंधा-धुंध गोलियां बरसा दीं।
यह घटना एक ऐसा हादसा है, जिस पर न तो कुछ बोला जा सकता है, और न ही चुप्पी साध कर ही बैठा जा सकता है। इस घटना के बाद संसार-भर को यह खबर सुनाने वाले मीडिया कर्मियों के कैमरे का सामना करते समय  दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर शख्स के आंसुओं में न जाने कितना दर्द रहा होगा, कितनी हताशा रही होगी, कितने तूफ़ान रहे होंगे?
क्या हमने आसमान से गिरती बर्फ से भी ठंडा, बादलों में कड़कती बिजली से भी ज्यादा नुकीला, दरिया के उमड़ते ज्वार से भी ज्यादा उद्दाम, और आग की लपटों से भी अधिक विध्वंसक, अब  इंसानी दिमाग को बना लिया है?
क्या "समय" अपनी इस चाल पर कभी क्षमा मांगने योग्य भी रह सकेगा?

ईश्वर पर चढ़े फूल अगली सुबह कचरे के ढेर में हों, तो ईश्वर की महिमा कम नहीं

भानु अथैया ने "गांधी" फिल्म के परिधान आकल्पन के लिए 1983 में मिले ऑस्कर अवार्ड को वापस भेज  दिया। उन्होंने जो कहा, वह गंभीर है। वे कहती हैं कि  हमारे देश में आज के दौर में इन चीज़ों का कोई मोल नहीं है। ये चीज़ें यहाँ सुरक्षित भी नहीं हैं।
भानु की उम्र 85 वर्ष है। उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया है। उन्होंने वर्षों तक अनेक फिल्मों में नामी-गिरामी सितारों  को लिबास पहनाये। किसी बात को लेकर उनकी बेचैनी से हालात का लिबास उतर जाना लाजिमी है। लोग सोच रहे हैं कि  ऐसा कहकर, और करके, क्या उन्होंने देश का वह सम्मान वापस गिरा दिया है, जो 1983 में उन्होंने देश को दिलाया था?
नहीं, उन्होंने केवल उस आलमारी को साफ़ किया है, जिसमें समय की धूल जम गई थी। उस ट्रॉफी की भी डस्टिंग की है। उसे बेश- कीमती जान, लॉकर में रखने के मकसद से बाहर भेज दिया है।उनकी टिप्पणी उनकी उम्र और कैरियर की थकान का तकाजा है। मछुआरे जाल ऐसे ही समेटते हैं। जिन लोगों ने उनकी कला का अपने दौर में आनंद लिया है, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, कि  उनकी ट्रॉफी भारत में रखी है, या अमेरिका में। उनकी कला, क्षमता और योग्यता का रेखांकन हो चुका है।

सॉरी, रहीम

क्लास में शोर हो रहा था। बच्चे शरारत,चीख-पुकार,झगड़ा कर रहे थे।ऐसा लगता था जैसे क्लास में टीचर न हो। शोर सुनकर प्रिंसिपल उधर आ निकले। देख कर हैरान हुए कि  टीचर क्लास में ही है।
तमतमाते हुए क्लास में जा घुसे। उन्हें देख कर सब शांत हो गए। वे कुछ बोलते, इसके पहले ही एक बच्चा बोल पड़ा- "सर, हम संसद-संसद खेल रहे थे।"
-ओह,प्रिंसिपल साहब इत्मीनान से लौट गए।
वे अपने कक्ष में जा कर बैठ तो गए, किन्तु उन्हें लगा, कि  उन्होंने लौटने में कुछ जल्द-बाज़ी की है। कुछ भी हो, स्कूल में शोर तो हो रहा था। उन्हें किसी न किसी को इसका दोष देकर कुछ सज़ा तो देनी ही चाहिए थी। उन्होंने घटना से अपना ध्यान हटाने के लिए सामने पड़ा अखबार खोल लिया। पेज पर ऊपर ही एक बड़ा फोटो था- हामिद अंसारी और मायावती का। उन्होंने समाचार-पत्र बंद कर दिया।
अखबार रखते-रखते उनकी निगाह अखबार में छपे एक विज्ञापन पर गयी। लिखा था- "शहर को भिक्षा-वृत्ति से मुक्त बनाएं, मांगने वालों को भीख नहीं, सीख दें।"
उन्हें अपने बचपन में पढ़ा एक दोहा याद हो आया- "रहिमन वे नर मर चुके जे कहीं मांगन जाँय,तिनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसै नाहि।"
वे सोच में पड़  गए। जो मांगें, वे मरे समान? और जो न दें, वे भी मरे समान?
तो जीवित कौन? तो क्या उन्होंने दुनिया में जन्म लेने में भी जल्द-बाज़ी की है? ये सब मसले पहले तय तो हो जाते। वे सोच में पड़ गए।  
      

Thursday, December 13, 2012

वो तो गया, अब किसे दें?

जब बच्चे का नाम रखा जाता है, तब उसकी उम्र बहुत कम होती है। कई बार तो केवल कुछ दिन, कई बार कुछ माह, बस। कहने का मतलब यह है, कि कोई भी बालक अपने खुद के नामकरण में न  तो अपनी राय दे पाता है, न कोई पसंद-नापसंद बता पाता  है और न ही उसे अपने नाम का उस समय अर्थ ही पता होता है। वह तो जैसे-जैसे बड़ा होता है, उसे बस आत्मसात कर लेता है।
एक बार एक शोध में यह खुलासा हुआ था, कि  लगभग 47 प्रतिशत लोगों को अपना नाम पसंद नहीं था। उनमें से 0.02 प्रतिशत ऐसे थे, जो इसे बदलने के लिए कार्यवाही कर रहे थे, शेष सभी ने उसे बेमन से स्वीकार कर रखा था। कई बार बच्चे अपने नाम को केवल इसलिए मान लेते हैं, क्योंकि यह उनके परिजनों ने रखा है।
इस से यह सिद्ध होता है कि  किसी का भी नाम अपने खुद के लिए नहीं होता। इसीलिए नाम रखते समय बच्चे के समझदार हो जाने की ज़रुरत नहीं महसूस की जाती। यह माना जाता है कि  जिस तरह आदमी को अपना खुद का फोन डायल  करने की ज़रुरत नहीं पड़ती, उसी तरह उसका नाम भी दूसरों के ही काम ज्यादा आता है।वह इसे नहीं पुकारता।
कुछ दिन पहले मैं एक समारोह में गया तो वहां एक बड़े साहित्यकार को सम्मानित किया जा रहा था। ख़ास बात यह थी कि  वे साहित्यकार अब जीवित नहीं थे, कुछ दिन पहले ही उनका देहांत हो गया था। सम्मान "मरणोपरांत" दिया जा रहा था।
वहां कुछ लोग ये चर्चा कर रहे थे, कि  अब इस सम्मान का क्या औचित्य था? कुछ एक ये भी कह रहे थे, कि  जीते जी उन्हें यह सम्मान मिलता तो कुछ बात भी थी।
इसीलिए मैंने यह चर्चा की है, कि  अपना खुद का नाम व्यक्ति के खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए होता है। जब यह रखा गया, तब भी व्यक्ति अपने होश या समझ में नहीं था। अतः सम्मान करना भी दूसरों के लिए प्रेरक हो सकता है, खुद वह व्यक्ति जीवित हो या नहीं!
पंडित रविशंकर को मरणोपरांत ग्रैमी अवार्ड दिए जाने पर उनकी स्मृति को नमन।

Wednesday, December 12, 2012

उस हवा में भाषा के अणु नहीं थे, तो बहती रही

मैं आराम से सो रहा था। सुबह की नींद गहरी और मीठी होती है। तभी मेरे पिता ने मुझे जगाया। बोले, जल्दी से उठ कर बाहर आओ। बात पिता की थी, कोई ऑप्शन नहीं था। आँखें मलते हुए मैं आया।
बाहर एक टू-व्हीलर लेकर मेरे पिता के एक मित्र खड़े थे। वे कालेज में प्रोफ़ेसर थे। उन्हें किसी गौशाला से अपने सामने निकलवा कर गाय का ताज़ा दूध लाना था। पर वे गाड़ी चलाते, तो दूध का बर्तन कैसे पकड़ते? अतः वे मुझे अपने साथ ले जाने आये थे, कि  मैं पीछे बैठ कर दूध का बर्तन पकडूँ।
थोड़ी ही देर में मैं सरपट दौड़ती गाड़ी  पर उनके पीछे बैठा था। गौशाला के ठीक सामने एक रेतीली जगह पर तेज़ी से मुड़ने के प्रयास में गाड़ी  डगमगाई और मैं फिसल कर नीचे गिर गया। कुछ दिन हाथ पर पट्टी बंधी रही। इस बीच एक बार प्रोफ़ेसर साहब ने आकर मेरे पिता से क्षमा भी मांगी। इस क्षमा से मेरे मन में उनके प्रति सम्मान बढ़ता,यदि मुझे "ठीक" से न बैठने के लिए डांट न पड़ी होती।
बाद में मुझे पता चला कि  उन प्रोफ़ेसर साहब श्री देवेन्द्र शंकर के बड़े भाई बहुत अच्छा सितार बजाते हैं, और उन्होंने देश-विदेश में सितार बजाने के कई कार्यक्रम दिए हैं।
"भारत रत्न पंडित रविशंकर" के नाम से यह मेरा पहला परिचय था। दुनिया-भर की हवा में सितार की स्वर-लहरियों की  खुशबू फैलाने वाले महान संगीतकार को मेरी विनम्र आदरांजलि।

क्या आप 31 दिसंबर 2012 की रात को 10 बजे मुझे एक मिनट का समय देंगे?

एकलव्य द्रोणाचार्य के पास गया। बोला-"मुझे आपसे तीरंदाजी सीखनी है।"
द्रोणाचार्य ने कहा-"तुम जानते हो, कि  मैं राजपुत्रों को यह विद्या सिखाता हूँ।"
एकलव्य को एकाएक गुरुदेव का तात्पर्य समझ में नहीं आया। उसने मन ही मन कई अनुमान लगाए-
1.गुरुदेव राजपुत्रों के शिक्षक हैं, अतः राजा से आज्ञा लिए बिना अपनी विद्या और किसी को नहीं दे सकते।
2.गुरुदेव की गुरुदक्षिणा बहुत अधिक होगी, जो मेरा जैसा विपन्न आदिवासी  दे नहीं सकेगा।
3.गुरुदेव के आवास पर मेरा प्रवेश वर्जित होगा, मेरे आवास पर गुरुदेव आ नहीं सकेंगे।
4.गुरुदेव राजकुमारों को श्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए वचन-बद्ध हैं, अतः मुझे आगाह करना चाहते हैं कि  मुझे उनसे कम ज्ञानी बने रहना होगा।
5.वे व्यस्त हैं, अतः मुझे समय नहीं दे सकेंगे।
कारण जो भी रहा हो,एकलव्य की बात द्रोणाचार्य के साथ नहीं बनीं।
क्या आप बता सकते हैं,कि इनमें से क्या कारण रहा होगा?
यदि बता सकते हैं, तो बता दीजिये। एकलव्य और द्रोणाचार्य तो अब नहीं हैं,इसलिए वास्तविक कारण क्या रहा होगा, कहना मुश्किल है।मुझे तो केवल आपका अनुमान चाहिए!
यदि आपका 'अनुमान' मेरे अनुमान से मेल खा गया, तो मैं 31 दिसंबर 2012 को रात ठीक10 बजे आपको बता दूंगा, और नए वर्ष का अपना पहला ब्लॉग आपको समर्पित करूंगा।         

Tuesday, December 11, 2012

सब के पौ-बारह

जन्म के बाद बारह साल तक बच्चे, बच्चे ही रहते हैं, फिर हो जाते हैं-"टीन एज़र",माने किशोर। ये बारह साल इंसान को बहुत कुछ दे जाते हैं ..लेकिन साथ में ले भी बहुत कुछ जाते हैं। क्या ले जाते हैं, यह सुभद्रा कुमारी चौहान सबको बहुत पहले ही बता गई हैं। इन बारह सालों को हम फिर जीवन भर याद करते रहते हैं-
                            "बार-बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी
                             गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त ख़ुशी मेरी"
बच्चा बारह क्लास पढ़ा, और स्कूल छूटा।आखिर कोई कैसे भूल सकता है बारह को?
तो मत भूलिए, इस याद को हमेशा के लिए अपने स्मृति-संग्रहालय में बसा लीजिये। क्योंकि यह घड़ी फिर अगले सौ साल तक नहीं आएगी। बारहवां दिन, बारहवां महीना और बारहवां साल। आज हमारे बीच देवानंद होते तो वे यही कहते कि  यह घड़ी  सौ साल पहले आई थी, आज भी है, और सौ साल बाद भी रहेगी। ऐसी आशा-वादिता को नमन। इतनी सकारात्मक सोच हम सब को भी मिले!
"लम्हा-लम्हा बूँद गिरी, जीवन के गहरे सागर में
कतरा-कतरा पानी लौट गया बादल के आँचल में"

यूसुफ़ जो बन गया दिलीप

 कुछ लोग जब नहाने जाते हैं, तो बस गए और नहा कर आ गए। वे आनंद नहीं लेते नहाने का। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो नहाने जाते हैं तो जैसे गुसल में जाकर बैठ ही जाते हैं। घंटों आनंद लेते हैं नहाने का।
यही कारण है कि  दिलीप कुमार ने जीवन भर में साठ फिल्मों  में काम करने के लिए उन्नीस सौ चवालीस से लेकर उन्नीस सौ अठानवे तक के चौवन साल फ़िल्मी दुनिया में बिताये। हर फिल्म का आनंद जो लेना था।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आधी सदी से भी ज्यादा लम्बे सफ़र की सबसे बड़ी ख़ास बात क्या रही?
ख़ास बात यह रही, कि जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं आतीं,वैसे ही इस लम्बे दौर की कई नामी-गिरामी चोटी की हीरोइनें दिलीप साहब के साथ परदे पर नहीं आ सकीं। इसका कारण यही था, कि  दिलीप साहब अपनी फिल्म के एक-एक फ्रेम को देखने के कायल रहे। उन्हें ये कभी गवारा न हुआ कि किसी भी दृश्य तक में   कोई और उनके सामने ज़रा भी छा जाये।
नर्गिस,मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंतीमाला तक तो बात कोई ख़ास नहीं थी, क्योंकि वे दिलीप कुमार के भी शुरूआती दिन थे। लेकिन उसके बाद नूतन,माला सिन्हा, साधना, आशा पारेख,बबिता, शर्मीला टैगोर,हेमा मालिनी, जया भादुड़ी,जीनत अमान और रेखा उनके साथ नहीं दिखीं।
उनके कैरियर की लगभग एक तिहाई फिल्मों में सायरा बानो ने ही काम किया, जो बाद में उनकी जीवन संगिनी भी बनीं। नूतन को तो वह अपने अपोजिट सोच ही नहीं पाए। शर्मीला टैगोर ने मुश्किल से जाकर एक फिल्म "दास्तान"  उनके साथ की,जो भी दोनों के अहम के चलते जैसे-तैसे पूरी हुई। वहीदा रहमान को "गाइड" की ज़बरदस्त सफलता के बाद वे इसलिए बर्दाश्त कर पाए, क्योंकि "राम और श्याम"में उनका डबल रोल था, और महिला-महिमा वहीदा और मुमताज़, दो में बँटी हुई थी। उन्नीस सौ तिरेसठ से उन्नीस सौ उनहत्तर तक लगातार शिखर पर रही साधना के साथ उनकी जोड़ी बनाने की बात कोई निर्माता सोच भी नहीं सका, क्योंकि दिलीप साहब "वो कौन थी,मेरे महबूब, वक़्त,आरज़ू, एक फूल दो माली,राजकुमार और मेरा साया" की नायिका को अपने साथ देख कर सहज नहीं थे।
ये बातें दिलीप की तारीफ हैं या आलोचना, इन पर मत जाइए, 90 साल पूरे करने पर उन्हें मुबारकबाद दीजिये, जन्मदिन की। उनका सौवां साल भी हम इसी तरह मनाएं!       

Monday, December 10, 2012

आपका नजरिया क्या है, नज़र के बारे में?

सुबह हुई, और हमें सब कुछ नज़र आने लगा। दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे करामाती टॉर्च, जिसे हम सूर्य कहते हैं, क्षितिज से निकल कर हमारे सामने आ जाती है।
पैदा होते ही बच्चा आँखें खोलता है, और उसी के साथ रोशन हो जाती है पूरे परिवार की दुनिया।
जब हम किसी भी काम के लिए घर से निकलते हैं, तो तरह-तरह के प्रसाधनों से अपने को तैयार करते हैं। सलीके से कपड़े पहनते हैं, कि  सबकी नज़र हम पर पड़े। यदि कोई हमें अनदेखा करे, अर्थात हम पर नज़र न डाले, तो हमें अच्छा नहीं लगता। कहीं भी कोई खूबसूरत चीज़ अगर हमें दिखे, तो हम भी उस पर नज़र डालते ही हैं। नज़र ज़रा भी धुंधली पड़ी, तो लोग घबरा कर डाक्टर के पास भागते हैं। डाक्टर यदि हमारी आँखें दो की चार करदे, तब भी हमें कबूल,क्योंकि आखिर नज़र का सवाल है।
लेकिन किसी दिन हमारे साथ कुछ अशुभ या बुरा घटा, और हम कहने लगते हैं कि  "नज़र" लग गई। बच्चा बीमार हुआ, और बस,हम कहते हैं कि इसे किसी की नज़र लग गई। हमारे अच्छे चलते व्यापार में घाटा हुआ, और हमारा माथा ठनका, कि किसी की नज़र लग गई।
आखिर ये माज़रा क्या है? नज़र लगे कि न लगे?
इसका उत्तर है कि  हमें किसी की "बुरी" नज़र न लगे। और ऐसा तभी होगा, जब हम अपने सुख में दूसरों को भी शामिल करेंगे। दूसरों के सुख में खुश होंगे।
अपने दिमाग में कोई माइक्रोवेव-ऑवन नहीं रखेंगे, कि किसी की कोई ख़ुशी वहां आई, और जल-भुन गई!

मकड़ी और कस्तूरी

गाँव वालों ने अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए गाँव में एक स्कूल खोल लिया। कहीं से एक युवक और एक युवती को बुला कर उन्हें शिक्षक भी बना दिया गया ।बच्चे आये, विद्यालय चल पड़ा।
युवती को जो कुछ आता था, वह बच्चों को सिखा देती।धीरे-धीरे उसने अपना सारा ज्ञान बच्चों को दे डाला। अब बच्चे सोचते, जो इन्हें आता है, वह हमें भी आता है, तो इनमें और हम में अब फर्क ही क्या है? धीरे-धीरे शिक्षिका और बच्चों के बीच मित्र जैसा व्यवहार होने लगा, और वे आदर-भाव छोड़ कर हम-उम्र दोस्तों की तरह बात करने लगे।
उधर युवक बच्चों से दूरी बना कर रखता। वह बच्चों को आसानी से ऐसा कोई ज्ञान न देता, जो वह जानता था। बच्चे उस से संकोच से मिलते, और उनके बीच धीरे-धीरे इतना अंतर आ गया, कि  बच्चे अपने को अज्ञानी और शिक्षक को परम ज्ञानी समझने लगे। वे शिक्षक को कई-कई बार प्रणाम करते।
कुछ दिन बाद युवती का विवाह तय हो जाने से उसने विद्यालय छोड़ कर जाना चाहा।  उसने जाते-जाते बच्चों से कहा- "शिक्षा कस्तूरी-गंध की तरह होती है, जो शिक्षक से उड़ कर तुम तक आ जाती है। मेरे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा,तुम्हें जब भी मेरी ज़रुरत हो, आ जाना, मैं तुम्हें पढ़ा दूंगी।"
बच्चों ने अपनी टीचर को भरी आँखों से विदाई दी, और वह चली गईं।
अब युवक अकेला ही वहां रह गया। उसने वर्षों तक वहां काम किया।
वृद्ध हो जाने के बाद, जब उसने विद्यालय छोड़ कर जाना चाहा,तब भी वह न जा सका। क्योंकि ऐसा कोई दूसरा नहीं था, जो उसकी जगह काम कर सके। उसने शायद किसी को भी इतना ज्ञान नहीं दिया, जो उसका स्थान ले सके। अतः गाँव वालों ने उसे जाने नहीं दिया। उसे लगता, उसने किसी मकड़ी की भांति अपने चारों ओर  ऐसा जाला बुन लिया है, जिस में जकड कर, अब वह कहीं जा नहीं सकता।गाँव वालों के लिए शिक्षा की ज़रुरत भी तो लगातार बनी हुई थी। उनमें से कोई अब तक कुछ न सीखा था।
 

Sunday, December 9, 2012

काटजू, भारतीय और गणित

भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष काटजू साहब को बहुत-बहुत बधाई। उन्होंने वह काम पलक झपकते ही चुटकियों में कर दिखाया जो भारतीय जनगणना से जुड़ी सारी मशीनरी दस साल में भी नहीं कर पाती। लाखों कार्यकर्त्ता देश भर में कागज़ पैन लेकर बस्ती-बस्ती घूमते रहते हैं फिर भी यह नहीं पता लगा पाते  कि भारत में "भारतीय" कितने हैं, और उनमें किस की जाति  कौन सी है।
काटजू साहब ने आनन-फानन में  किसी सुपर कंप्यूटर की शैली में यह खड़े-खड़े पता लगा लिया कि  एक सौ बीस करोड़ भारतीयों में कितने मूर्ख या बेवकूफ हैं।
अब तक तो सब सुभीते से हो गया, लेकिन उलझन अब आ रही है। अब हर भारतीय अफरा-तफरी में काटजू साहब से संपर्क करना चाहता है। आखिर ये तो सब जानना ही चाहेंगे न कि  वे 'दस' में हैं या "नब्बे" में?क्योंकि काटजू साहब के मुताबिक़ सौ में से दस समझदार हैं, बाकी नब्बे मूर्ख।
यदि अपना नंबर नब्बे में आ गया, तो कोई चिंता नहीं है। अपनी चिंता सरकारें करेंगी ही। आरक्षण, रियायत, छूट, सब्सिडी आदि तमाम तरह की सुविधाएं हैं। हाँ, अगर कोई दस में रह गया,तो उसकी आफत है। वह कैसे अपने दिन गुज़ार पायेगा बेचारा।
खैर, यह तो आम आदमी की अपनी चिंता है, हम तो काटजू जी का नाम गणित के किसी बड़े पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करते हैं।  

क्या ला रहा है आने वाला वर्ष-2013

आप कहेंगे, कि  अभी तो आने वाले नए साल में पूरे तीन सप्ताह बाकी हैं, फिर अभी से नए साल की बात?
वो क्या है कि  जब कोई मेहमान आता है, और ढेर सारा सामान लेकर आपके दरवाजे पर खड़ा हो जाता है,तो एकाएक यही ख्याल आता है कि  इसे अब इतने सामान के साथ कहाँ ठहराएं। यदि थोड़ा पहले से पता हो तो व्यवस्था आसानी से हो जाता है।
इस साल माज़रा कुछ ऐसा ही है। ये साल बहुत कुछ लेकर आ रहा है। इसीलिए पहले से बताने का ख्याल आया। वैसे तो दुनिया में जितने ज्योतिषी, उतनी भविष्यवाणियाँ,फिर भी कुछ ख़ास बातें नोट कीजिये-
1. इस साल यूरोप के किसी देश में अब तक का विश्व का सबसे कम उम्र का व्यक्ति राष्ट्राध्यक्ष चुना जायेगा।
2. इस साल मिस इंडिया कोई फिल्मों में पहले से काम कर रही अभिनेत्री बनेगी।
3. इस साल शान्ति का नोबल प्राइज़ अज़रबैजान से मिलेगा।
4. इस साल कोई भारतीय व्यंजन कैलिफोर्निया में लॉन्च होकर ज़बरदस्त ढंग से लोकप्रिय होगा।
5. इस साल एक ऐसा नया देश अभ्युदित होगा जिसका राष्ट्रीय ध्वज क्रीम कलर का होगा।
6. इस साल अमेरिका की प्रथम महिला मिसेज़ ओबामा को कोई अंतरराष्ट्रीय सर्वोच्च सम्मान मिलेगा।
7. इस साल कोई दक्षिण अमेरिकी देश क्रिकेट में धमाकेदार एंट्री करेगा।
8. इस साल दुनिया की सबसे ऊंची इमारत के स्वामित्व के लिए बोली लगेगी, जिसमें देश के बाहर का व्यक्ति    सफल होगा।
9. इस साल एक नई संगीत शैली ईजाद होकर दुनिया में धूम मचाएगी।
10.इस साल मिस यूनिवर्स मोज़ाम्बीक से चुनी जाएगी।          

Saturday, December 8, 2012

ये लड़ाई न जाने क्या गुल खिलाएगी?

आज एक खबर थी कि  अब "भ्रष्टाचार का मुकाबला विज्ञान करेगा"। अखबार ने यह तो नहीं लिखा कि  यह विज्ञान की भ्रष्टाचार पर चढ़ाई है, या भ्रष्टाचार का ही विज्ञान पर आक्रमण है, अभी तो केवल दोनों के झगड़े का ज़िक्र है।
विज्ञान यह सबूत के साथ पकड़ लेगा कि कौन किससे कहाँ कब कितनी रिश्वत ले रहा है। इसके लिए चप्पे -चप्पे पर प्रामाणिक कीमती वैज्ञानिक यन्त्र लगाए जायेंगे। उन यंत्रों को देख कर सही स्थिति पता लग जायेगी। स्थिति पता लगते ही कार्यवाही की जा सकेगी।
आहा !
वैज्ञानिक यन्त्र "खरीदे" जायेंगे? माने वही टेंडर,खरीद, कमेटी,सप्लाई आदि-आदि ?
"स्थिति" का पता लगाने के लिए "समिति"?
फिर "कार्यवाही"? माने वही आरोप,सज़ा,अपील,'क्लीन-चिट' आदि-आदि? 
पानी आ रहा है। 
कहाँ?
विज्ञान की आँखों में,और भ्रष्टाचार के मुंह में !       

नव वर्ष के संकल्प [संशोधित]

कुछ दिन पहले मैंने ऐसे सात संकल्प बताये थे, जो इस वर्ष अपनाने के लिए मैं सोच रहा हूँ। मैंने आपसे इन पर आपकी राय भी मांगी थी। कुछ मित्रों ने मुझे अच्छे सुझाव दिए हैं।
एक सबसे आश्चर्य वाली बात यह है कि  मेरा केवल एक संभावित संकल्प ऐसा है जो किसी ने पसंद नहीं किया। मैंने वर्किंग लेडीज़ को ताज़ा भोजन उपलब्ध कराने की जो बात की थी, वह किसी को पसंद नहीं आई। थोड़ा और सोचने पर मुझे ही यह ख्याल अव्यावहारिक लगा। क्योंकि कमाने वाली महिलाएं किसी का अहसान  तो लेना नहीं चाहेंगी। वे अपने को दयनीय भी नहीं समझतीं। यदि यह भोजन पैसे लेकर खिलाया जाता है, तो यह व्यापार ही है, इसमें संकल्प कैसा?और यदि निशुल्क खिलाया जाता है तो इसका कारण किसी को भी समझ में नहीं आएगा। बल्कि एक संदिग्धता ही बनी रहेगी। इसलिए ये विचार मैंने छोड़ दिया।
अमेरिका से स्मार्ट इंडियन ने मुझे और भी कई अच्छे सुझाव दिए।
एक विचार यह भी है कि मैं स्थानीय ज़ू [चिड़ियाघर] में किसी एक पशु-पक्षी को रोज भोजन देने का कार्य करूँ। यह आसानी से संभव भी है।
कहते हैं कि नववर्ष का यह संकल्प अपने खुद के लिए लिया जाना चाहिए। इसके प्रचार की भी कोई ज़रुरत नहीं है। मैं जो इसकी चर्चा कर रहा हूँ उसका उद्देश्य प्रचार करना नहीं है, बल्कि अपने मित्रों को भी इसके लिए याद दिलाना ही मेरा मकसद है। हाँ, यदि कोई संकल्प अपने लिए ही लेना हो तो मैं चाहूँगा कि  इस वर्ष मैं कुछ चित्रकारी भी करूँ। इन चित्रों का फिर मैं क्या करूँगा, यह मुझे नहीं पता।
एक मन यह भी है कि  इस वर्ष मैं अपनी "आत्मकथा" लिखूं। लेकिन डरता हूँ, कि  कहीं यह झूठ बोलने का संकल्प तो नहीं है?अपने बारे में सच-सच लिखूं, तो उसमें किसी के लिए पढ़ने को है ही क्या?लेकिन फिर यह भी सोचता हूँ, कि  संकल्प तो अपने लिखने का लूँगा, दूसरों के लिए पढ़ने का थोड़े ही।वे पढ़ें, न पढ़ें, ये वे जानें।  

Friday, December 7, 2012

डिसीज़न मेकिंग-एक अभ्यास

कल जब मैंने अपनी मेल चैक की, तो मुझे एक मित्र का सन्देश मिला।
मित्र ने कुछ साल पहले भारत से अमेरिका जाकर एक नौकरी ज्वाइन की थी। वे प्रतिभाशाली, मिलनसार और प्रगतिशील महिला हैं, इसलिए उनके जाते समय केवल यही विचार मन में आया था  कि  वे जहाँ भी रहेंगी, अपने कैरियर और जीवन के लिए सकारात्मक होकर रहेंगी, और सफल तो रहेंगी ही। ऐसा हुआ भी, उनके समाचार मिलते रहे।
अब अचानक उन्होंने बताया कि  पिछले दिनों उन्हें भारत में नौकरी के अच्छे प्रस्ताव मिले हैं, और वे निर्णय लेने से पहले मित्रों, शुभचिंतकों, परिजनों और सहकर्मियों के विचार जानना चाहती हैं।
कुछ लोग उन्हें अपना देश, अपने लोग, अपने रीति-रिवाज़ का हवाला देकर लौटने की सलाह दे रहे थे। वहीँ कुछ लोग उन्हें बेहतर कैरियर,अच्छी भौतिक सुविधाओं तथा प्रतिष्ठित उपलब्धि के नाम पर वहीँ बने रहने की सलाह दे रहे थे।
आइये, उनके निर्णय में उनकी मदद करें।
हम जीवन में क्या चाहते हैं? वैसे प्रश्न मुश्किल है, पर फिर भी-
1.निरंतर आगे बढ़ने की सम्भावना।
2.पर्याप्त सुख-सुविधाएँ।
3.अपने परिजनों के साथ अपने रीति-रिवाजों के साथ जीवन-यापन।
ये तीनों ही सुविधाएँ उन्हें "दोनों" जगहों पर मिल सकती हैं। केवल देखने की बात यह है कि  ये कहाँ कैसे मिलेंगी? इनके बदले में जो कुछ उन्हें छोड़ना होगा, उसके लिए उनका "ज़मीर" उनका कैसा सहयोगी सिद्ध होगा, यह विचारणीय है। अन्यथा जैसे हमारा देश-वैसे ही हमारी वसुधा।

नया नया है, पुराना पुराना, दोनों को मिलाइए मत

जब किसी का निधन हो जाता है तो उसकी शैया को मृत्यु के बाद उठा दिया जाता है, उसे बिछा नहीं रहने देते। इसे शुभ नहीं माना जाता। यह एक पुरानी परंपरा है। यद्यपि एक समय ऐसा भी था कि  भारतीय घरों में दिन में शैया का पड़ा रहना, और उसपर बिस्तर बिछा रहना ही अच्छा नहीं माना जाता था। ऐसा केवल तब होता था, जब घर में कोई बीमार हो। इसलिए दिन में तो खाट खड़ी ही रहती थी।और जिस पर किसी के प्राण पखेरू उड़े हों, उस सेज को तो खड़ा कर ही दिया जाता था।"खाट खड़ी हो जाना" मुहावरा भी इसी से प्रचलन में आ गया।
समय के साथ बदलाव आये। खाट का स्थान भारी-भरकम लकड़ी के डिजायनर पलंगों ने ले लिया। दिन भर घर में बेड या डबल-बेड बिछे ही रहने लगे। इतने भारी शयन-मंच को रोज़ कौन उठाये। हम अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं में तो बदल गए, किन्तु अपने मानस बदलाव में हमारी गति वही नहीं रही।हम अपने नए दिनों में पुराने दिनों का तड़का अब भी कभी-कभी लगा ही बैठते हैं।
परसों एक वयोवृद्ध महिला की मृत्यु हो गई। उनके दिवंगत हो जाने के बाद, परंपरागत तरीके से भारी लकड़ी के उस आधुनिक डबल-बेड को भी उठा कर दीवार के सहारे खड़ा कर दिया गया।घर में लोगों का इकठ्ठा होना, और व्यवस्थाओं का अस्त-व्यस्त हो जाना आरम्भ हो गया।
एक तीन वर्ष की मासूम बालिका ने जीवन में पहली बार उस बेड को खड़ा देख, जिज्ञासा से हाथ क्या लगाया, कि देखते-देखते मातमी घर में मातम की नई लहर आ गई। भरभरा कर गिरते उस पाषाण-ह्रदय काष्ठाडम्बर ने यह भी नहीं देखा कि  नीचे एक ऐसी निर्दोष कलिका मासूमियत से खड़ी है जिसने अभी जिंदगी का साक्षात्कार भी ढंग से नहीं किया।
भारतीय घरों में प्रचलित मानस-शब्दावलियों में ऐसी घटना के कई संभावित कारक दर्ज हैं, इसलिए इस पर चर्चा बेमानी है। एक घर से समय-असमय उठी दो अर्थियों पर देवता पुष्प-वृष्टि करें।          

Thursday, December 6, 2012

सात रास्ते

कभी-कभी लगता है कि  हम कैसे किसी के दोस्त बनें, या कैसे उसे मित्र बनाएं। किसी-किसी को देख कर ये बात शिद्दत से दिल में उठती है। वैसे तो, कहते हैं कि  जिस मिट्टी से कुदरत ने आपको बनाया है, उसी मिट्टी  से बने और बुत जब भी दुनिया में कहीं आपसे टकराते हैं, तो दोस्त बन ही जाते हैं, पर कभी-कभी दिल ये भी तो कहता है कि  कोई किसी भी मिट्टी  का हो, हमारे परिचय के दायरे में आये। ऐसे में आपके पास मायूसी से पहले गुजरने वाले सात रास्ते हैं। इन्हें आजमाइए-
1.जिसे दोस्त बनाना चाहते हैं, उस से पहले उसके दोस्तों से मिलें, देखें कि  उनमें क्या है?
2.कागज़ की नाव बना कर उसे पानी में छोड़ दें, और आँख बंद करके सोचें, कि  यह उस तक जाय।
3.मन में सोचें, कि  यदि वह आपको मिल गया तो आप क्या करेंगे, और नहीं मिला तो क्या करेंगे।
4. जानें कि  आपसे मिल कर उसे क्या फायदा या नुकसान होगा।
5.देखिये, कि  वह कम से कम लोगों से किस वक़्त घिरा है।
6.तलाशिये, कि आपके पास उसके लिए खोने को क्या है?
7.उसकी कौन सी खूबी है जो आपको खींचती है, और वह खूबी और किस-किस में है?
यकीन कीजिये, इनमें से किसी न किसी राह पर चल कर वह जल्दी ही आपके साथ कहीं चहल-कदमी कर रहा होगा। बस, कुदरत किसी को, अपने चाहने या पसंद करने वाले से इतनी ही देर दूर रह पाने की मोहलत देती है।

अच्छा नहीं लगता अपने दौर को कमतर कहना, फूलों में नहीं गंध तो क्या, कलियाँ तो अभी हैं!

 यकीनन ऐसा कभी कोई दौर नहीं गया होगा, जिसमें कोई कमी न हो।लेकिन फिर भी उम्मीद हमेशा कायम रही।
एक नदी के किनारे पांच बच्चे खड़े थे। दुविधा यह थी कि  वे सभी उसपार जाना चाहते थे। लेकिन वहां केवल एक छोटी सी नाव थी, जिसमें बड़ा सा छेद साफ़ दिखाई दे रहा था। अब भला कैसे तो उसे पानी में उतारा जाय, और कैसे उस पर भरोसा हो, कि  यह सबको पार लगा देगी। लेकिन मन ललचा भी रहा था, कि  नदी भी है, नाव भी, तो ख्वाहिश अधूरी क्यों रहे? आखिर रहा न गया। सभी ने अपना-अपना दिमाग लगाना शुरू किया। सबसे बड़े बालक ने कहा- "कुछ ऐसा करो, कि यह छेद बंद किया जा सके।यदि यह बंद न हो तो चलना बेकार है।" 
उससे छोटा बोला-"इतनी जल्दी पानी थोड़े ही भरता है, तेज़ी से नाव चलाएंगे तो ठिकाने पहुँच जायेंगे।"
तीसरे नंबर वाला बोल पड़ा- "सबका जाना एकसाथ ज़रूरी है क्या, दो चक्कर करते हैं। वज़न कम रहेगा तो पानी भरने पर भी डूबेगी नहीं।"
चौथा कैसे चुप रहता। बोला-"चलो, और पतवारें ढूंढें,सब एक साथ ही जल्दी-जल्दी चले चलेंगे।"
अब बारी सबसे छोटे की थी। वह भी बोल पड़ा- "अरे सब आराम से चलो, दो जने नाव चलाना,तीन लोग अपने  हाथों से पानी फेंकते चलेंगे,पानी इकट्ठा कैसे होगा , अलग-अलग क्यों होते हो?"  

Wednesday, December 5, 2012

सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम अनारकली तुझे जीने नहीं देंगे

सरकार के पास दो प्यारे दुश्मन हैं। वैसे दुष्ट दोस्तों की भी कमी नहीं है।संसद में  एफ़ डी आई पर मतदान हो गया। नतीजा- ढाक  के तीन पात।
हमें यह वरदान प्राप्त है कि  हमारे यहाँ कभी कुछ नहीं हो पायेगा। क्योंकि जब कुछ होगा तो मंच पर वे गवैये आ जायेंगे, जिनके पास सुर न हों। और जब कुछ न होगा तो वे सुर आलाप लेंगे, जो होनी को अनहोनी करदें, अनहोनी को होनी।
सरकार आम आदमी को तो वोट देने के लिए तरह-तरह से लुभा रही है। यहाँ तक कि  'कैश' की गाज़र भी खरगोश के सामने टांगने की बात हो गई। किन्तु देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर देश की सर्वोच्च संसद में लाइन में लगे वोटर भी सरकार खुद ही, खैर, जो भी हो, सलीम अनारकली के डायलॉग हमारे देश में कभी फीके नहीं पड़ेंगे। सवाल यह नहीं है कि  वोट पक्ष में पड़ें या विपक्ष में, सवाल तो यह है कि  'वोटिंग' के समय देश के कई जिले मैदान से भाग जाएँ, और उन्हें कोई कुछ न कहे?

हाय, ऐसे तो व्रत टूट जाएगा !

व्रत माने उपवास। व्रत में भोजन नहीं किया जाता। जितने समय के लिए व्रत करना हो, उतने समय तक कुछ नहीं खा सकते। कोई-कोई व्रत तो ऐसा होता है जिसमें पानी भी नहीं पिया जाता।
कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने व्रत किया हो,उसे भोजन करना तो दूर, बल्कि भोजन देखना भी नहीं चाहिए। यदि भोजन की खुशबू आ जाय, तब भी व्रत में व्यवधान पड़ता है। कई धर्म-परायण लोग तो ऐसे व्यक्ति के सामने भोजन की बात करना भी अनुचित मानते हैं, जिसने व्रत किया हो।कहते हैं कि  व्रत के दौरान यदि भोजन को याद करके उसका काल्पनिक स्वाद भी जिव्हा पर आ जाय तो व्रत सफल नहीं माना जाता।
व्रत को खोलने के भी विभिन्न तरीके हैं। कोई व्रत सूरज ढलने के बाद समाप्त कर दिया जाता है। किसी-किसी में तारे उगने की प्रतीक्षा की जाती है। किसी व्रत में चाँद उगने के बाद उसे देख कर भोजन किया जाता है। यहाँ तक कि  कोई व्रत तो आधी रात तक चलता है। बारह बज जाने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण किया जाता है।
भारतीय महिलाओं में करवा चौथ जैसा व्रत बहुत लोकप्रिय है, जिसमें चन्द्रमा को देख कर, अर्ध्य लगा कर फिर भोजन किया जाता है।
राजनैतिक व्रत अपनी मांग पूरी न होने तक किये जाते हैं। इनके समाप्त होने की विधियाँ भी अलग-अलग हैं।किसी-किसी में विपक्ष द्वारा व्रत करने वाले पर हमला करके व्रत तुड़वा दिया जाता है। किसी में सत्ता पक्ष  चुपचाप आकर जबरन मौसमी का रस पिला जाता है। कोई-कोई व्रत मांग पूरी होने में देर होने, या मांग पूरी न हो पाने की आशंका होने के कारण स्वतः तोड़ दिए जाते हैं।
कभी अमेरिका के एक कदम से  व्रत-महात्म्य  कम हो गया  था। जिस चाँद को देख कर सुहागिनें व्रत खोला करती थीं, उस पर अमेरिका के आर्मस्ट्रॉंग चहल-कदमी करके आ गए थे।
चाइना भी, किसी भी बात में अमेरिका से कम नहीं रहना चाहता। अब ऐसा लगता है, कि चाइना भी व्रतों की गंभीरता कम करके छोड़ेगा, कुछ समय बाद जब व्रत करने वाली सुहागिनें चाँद को अर्ध्य देंगी, तो चाइना के किसान वहां सब्जी उगाते हुए दिखेंगे। अब दिन भर की भूखी महिलायें जब ताज़ा सब्जी देखेंगी, तो भला मुंह में पानी आने से कैसे रोक पाएंगी? और हमारे पंडित ऐसे व्रत को तो कतई सफल नहीं मानेंगे, जिसमें मुंह में पानी आ जाये, और पति की लम्बी आयु की कामना के लिए सुबह से भूखी बैठी महिला को शाम-ढले  "चाइनीज़"जेंटलमैन दिख जाए।       

Tuesday, December 4, 2012

वो बचपन के दिन

मुझे याद है, बचपन में रोज़ शाम को हम सभी मित्र ठीक समय पर अपने-अपने घर से बाहर मैदान में खेलने निकल आते थे। परीक्षा हो, छुट्टियाँ  हों, त्यौहार हो, गर्मी-सर्दी हो, खेल तो थोड़ा-बहुत होता ही था। इसके नियम कोई बनाता नहीं था, लेकिन अनुशासित तरीके से सब चलता था। उस समय सरकारों की भी दिलचस्पी मोहल्लों में नहीं होती थी।
लेकिन फिर भी कुछ लड़के ऐसे ज़रूर होते थे, जिन्हें कोई नियम-क़ानून- कायदा न तो स्वीकार होता था, और न वे उनका अनुपालन करना जानते थे। वे कभी देर से, खेल शुरू होने के बाद आते, और आते ही कहते, "हम भी खेलेंगे-नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे", या फिर उन्हें ज़ल्दी जाना होता था, और वे कहते थे कि  हमारी बैटिंग पहले देदो, या फिर जब वे हारने लगते तो कहते थे कि  अब अन्धेरा हो गया, अब कल खेलेंगे। या फिर वे जब जीतने लगते तो वास्तव में अन्धेरा हो जाने पर भी खेल बंद नहीं होने देते। कहने का मतलब है कि  वे खेलने नहीं,बल्कि  खेल मैदान को जंगल राज बनाने आते थे। शायद उनकी आत्मा इसी में तृप्त होती थी, या फिर उनका व्यवहार अपने पिछली योनि  के जन्म से प्रभावित रहता था।
आखिर ऐसे बच्चे बड़े तो होते ही हैं।वे संसद और विधानसभाओं में भी जाते ही हैं। वे खेल-संघों और आयोजन समितियों में भी शिरकत करते ही हैं। फिर किसी भी अच्छी-खासी तैरती नैय्या को डुबोना तो उनके बाएं हाथ  का खेल होता है। वे देश का नाम चाहें रोशन न कर सकें, उसके नाम पर कलंक लगाना तो जानते ही हैं। उनके लिए ओलिम्पिक, एशियन या कोई भी खेल केवल अपनी तिजोरियों को भरने का त्यौहार होता है।

मित्रता की लोच अर्थात इलास्टिसिटी ऑफ़ फ्रेंडशिप

पुराने समय में मित्र ऐसे बनते थे-
-पास-पड़ौस में रहने वाले हम-उम्र लोग।
-साथ पढ़ने वाले बच्चे या साथ काम करने वाले लोग।
-लड़कों के मित्र लड़के और लड़कियों की मित्र लड़कियां
-यात्राओं में मिल जाने वाले समान-स्तरीय लोग।
अब दोस्त ऐसे बनते हैं-
दुनियां के किसी भी कौने में बैठे किसी भी उम्र,व्यवसाय,कैसी भी अभिरुचियों के किसी भी प्राणी की मित्रता दिन- रात के किसी भी पहर  दुनियां के किसी भी स्थान पर कुछ भी करने वाले किसी भी उम्र के,किसी भी व्यवसाय के,कैसी भी शक्ल-सूरत के किसी भी जाति-धर्म-नस्ल-सम्प्रदाय के किसी भी भाषा के बोलने वाले, न बोलने वाले, अमीर-गरीब, गोरे-काले लम्बे-छोटे-मोटे-पतले स्वस्थ बीमार स्त्री-पुरुष या अन्य,के साथ परवान चढ़ सकती है। शर्त केवल एक है कि  वे दोनों हों। [ये मत कहियेगा कि जो न हो उसकी छवि से भी हो सकती है]
इसी से अनुमान लगाइए, कि  मित्रता की लोच की सीमा क्या है?
अब दूसरी बात यह है कि  मित्रता की अवधि क्या है?
यह एक क्षण से लेकर जन्म-जन्मान्तर तक हो सकती है।
एक बार दो घनिष्ठ मित्रों से किसी ने पूछा, आप दोनों एक दूसरे के साथ न होने पर कैसा महसूस करते हैं? पहले ने कहा- "ऐसा लगता है जैसे सूर्य से टूट कर एक टुकड़ा ठंडा हुआ और धीरे-धीरे उस पर जीवन तो आया, मगर इस सारी प्रक्रिया में समय बहुत लग गया।"
दूसरा बोला-"इसने बता दिया न , बस, वैसा ही।"
वह व्यक्ति बोला- "अच्छा,जब आप दोनों साथ होते हैं तब आपको कैसा लगता है?"
दोनों कुछ न  बोले।       

Monday, December 3, 2012

क्या मानव अधिकार की बात ऐसी है?

मैं अपने एक मित्र के साथ एक मीडिया हाउस में बैठा था। दो युवक एक तस्वीर के साथ कोई छोटी सी खबर अखबार में देने आये थे। उनसे बात हुई। वे बताने लगे- कुछ दिन पहले उन्होंने अपनी शोध के सिलसिले में एक जेल का दौरा किया। वहां विशेष अनुमति लेकर वे कुछ ऐसे लड़कों से मिले जिन्हें एक घर के भीतर दो-तीन महिलाओं पर लूट के इरादे से हमला करने पर जेल हुई थी। उनमें से एक लड़के की माँ  ने जेल के अधिकारी को यह अर्जी दी थी कि  उसके पुत्र को सर्दी के मौसम में ज़मीन पर बिना कुछ बिछाए सुलाया गया। वे मानव अधिकार के तहत इस घटना की जांच चाहती थी।
जब इन युवकों ने उस महिला से संपर्क करके यह पूछा- क्या वह जानती है, उसके पुत्र ने अन्य लोगों पर जान लेवा हमला किया है, और वह अपने पुत्र की ज़रा सी असुविधा की शिकायत कर रही है? तब माँ  ने जवाब दिया- पुत्र अठारह साल का हो चुका है, वह घर से निकल कर क्या करता है, यह उसके अख्तियार में नहीं है, किन्तु उसे रात के किसी भी पहर, दुनिया के किसी भी कौने में, कोई भी कष्ट होता है, तो उसकी चिंता करना उसका नैसर्गिक फ़र्ज़ है।
बाद में जांच से यह साबित हुआ कि  जेल में लड़के को बिना कुछ बिछाए नहीं सुलाया गया था, बल्कि उसके साथी ने रात को अधिक ठण्ड लगने पर उसके नीचे बिछी चादर खींच ली थी।

छाँट लीजिये अपने दोस्तों को

बहुत सारे लोग हैं दुनियां में। अब सबको तो हम दोस्त बना नहीं सकते। लेकिन फिर भी कुछ दोस्त तो चुन  लीजिये। दोस्त तो काम ही आते हैं।वैसे जिगरी दोस्त तो सबका एक ही होता है, पर आज के ज़माने में दो-  चार दोस्त होना बढ़िया होता है। 
चलिए सबसे पहले हम अपने बारह अच्छे मित्रों में से एक चुनते हैं। पहली लड़की है, ज़रा लम्बी सी,लेकिन बेहद ठन्डे स्वभाव की।दूसरी बहुत छोटी, लेकिन यह मत समझिये कि  वह हमेशा एक सी ही रहती है।  तीसरा लड़का है। बहुत खुशमिजाज़। चौथा भी लड़का ही है, लेकिन कुछ गरम स्वभाव का, लेकिन तीसरे से ज़रा छोटा। पांचवी और छठी लड़कियां हैं। लेकिन लड़कियां क्या हैं, बला हैं, इतने गरम दिमाग की, कि माथा घूम ही जाय। हाँ,सातवीं ज़रा अच्छे स्वभाव की है, कुछ भीगी-भीगी सी, लम्बी । फिर आठवां,नवां,दसवां,ग्यारहवां और बारहवां, सब लड़के। वैसे चाहें तो दोस्ती करें, पर ग्यारहवां और बारहवां हैं तो ठन्डे ही। आठवां और दसवां ज़रा लम्बा पर नवां कुछ छोटा सा।
अब बताइये, इनमें से किसे अपना मित्र चुनेंगे?
यदि आपने डिसीज़न ले लिया तो ठीक। पर यदि अभी तक उधेड़-बुन में पड़े हैं तो थोड़ी जानकारी और दे देते हैं।
बच्चों को तो पांचवीं और छठी ही सबसे ज्यादा भाती हैं। गाँव के किसानों से पूछेंगे तो वे सातवीं, और आठवें-नवें का नाम लेंगे। नेताओं से मत पूछियेगा, वरना पहली और आठवें की तारीफ़ के पुल बाँधने लगेंगे, क्योंकि ये दोनों ही उनकी दूकान सबसे ज्यादा चमकाते हैं न ?
यदि अब भी नहीं चुन पाए, तो थोड़े दिन और ठहर जाइए। एक-एक करके लाइन से फिर सब आपके सामने आ खड़े होंगे।
ऐसा लगता है कि  आप दुविधा में हैं, शायद आप इनके नाम जानना चाहते हैं। छोड़िये, नाम में क्या रखा है?नाम तो कुछ भी हो सकता है ...जनवरी,फ़रवरी, मार्च ...  

हाँ किसी ज़माने में परिवारों में ऐसा होता था

परिवार में एक मुखिया होता था। वह तेज़ नहीं चल पाता था। उसकी सांस फूल जाती थी। वह ज्यादा खा भी नहीं पाता था। उसके दांत कम या कमज़ोर हो चुके होते थे। वह कम सोता, और ज्यादा लेटता था।उसे घर का कोई बच्चा अखबार पढ़ कर सुनाता था क्योंकि उसकी नज़र कमज़ोर होती थी, फिर भी यदि घर की लड़की देर से घर आये तो वह दूर तक देख लेता था। उसका खर्चा बहुत कम होता था, पर घर के सभी लोग अपनी आमदनी उसी की हथेली पर लाकर रखते थे। खर्च के लिए मांगने पर वह जांच-पड़ताल करके एक-एक पैसा इस तरह देता था, मानो ये पैसे उसकी गाढ़ी कमाई के हों।
दुनिया कहती थी कि  वह घर "चला" रहा है।
धीरे-धीरे ऐसा ज़माना आया कि  घर ने उसको चला दिया।
वह कहीं जा नहीं पाता था क्योंकि उसे कोई ले जाने वाला नहीं था। उसकी सांस फूल जाती थी, क्योंकि उसकी दवा कई-कई दिन तक नहीं आ पाती थी। वह ज्यादा खाता नहीं था, क्योंकि ज्यादा उसे कोई देता ही नहीं था। वह लेटता कम और सोचता ज्यादा था। घर के लोग उसे अपनी कमाई बताते नहीं थे, बल्कि इस कोशिश में रहते थे कि  वह उस में से कुछ उन्हें देदे जो उसने अपनी जवानी के दिनों में कमाया था। उस से कोई कुछ मांगता नहीं था, बल्कि पडौस के लोग नज़र बचा के कभी कुछ नाश्ता उसके आगे रख जाते थे। उसे कुछ खबर नहीं रहती थी क्योंकि उसका चश्मा महीनों टूटा  पड़ा रहता था।
दुनिया कहती थी कि  ये दुनिया से कब जाएगा?

Sunday, December 2, 2012

नव-वर्ष के संकल्प

ऐसा रिवाज़ है कि  जब नया साल आरम्भ हो, तो इसका गर्म-जोशी से स्वागत किया जाए, और साथ ही इस अवसर पर इसके नयेपन को बनाए रखने के लिए कोई न कोई ऐसा संकल्प भी लिया जाए, जो वर्षभर हमें इस साल के मधुर आगमन की याद दिलाता रहे। प्रायः ऐसा होता है कि हम पहले से तो इस संकल्प की आयोजना करते नहीं, फिर आखिरी वक्त में हड़बड़ी में कोई संकल्प लेना चाहते हैं। हम सोच नहीं पाते कि  अपनी दिनचर्या में हम इस संकल्प का निर्वाह कर पाएंगे या नहीं। नतीजा यह होता है कि  या तो हम संकल्प लेने का इरादा छोड़ देते हैं, या फिर आधे-अधूरे मन से अनुपयोगी संकल्प ले बैठते हैं, जिसे उकता कर बीच में ही छोड़ना पड़ता है।
हम आपको समय रहते ही याद दिला रहे हैं कि  अभी से सोच लीजिये- आप क्या संकल्प लेंगे।
जो संकल्प मैंने अपने लिए सोचे हैं वे भी आपको बता रहा हूँ, ताकि आप अपनी सलाह देकर मुझे सही संकल्प चुनने में सहयोग कर सकें। ये हैं मेरे संभावित संकल्प-
 1. मैं अगले साल हर महीने में एक बार एक दिन के लिए किसी भी शहर में जेब में एक भी रुपया, फ़ोन या कोई पहचान-पत्र लिए बिना घूमूँगा।
2.मैं हर महीने में एक बार किसी भी स्थान [-होटल, रिसोर्ट,मंदिर,या अन्य] पर एक ऐसी पार्टी का आयोजन करूंगा, जिसमें केवल सभी "अपरिचित" लोगों को आमंत्रित करूंगा।
3.मैं हर माह में एक बार किसी भी 90 वर्ष से अधिक के व्यक्ति को आउटिंग [सिनेमा, डिनर,सांस्कृतिक कार्यक्रम] के लिए ले जाऊँगा।
4.मैं रविवार के दिन या ईवनिंग कक्षाओं में छोटे बच्चों के साथ कोई इंस्ट्रूमेंटल संगीत सीखने के लिए प्रवेश लूँगा।
5.मैं पुराने खेलों-शतरंज,ताश,चौपड़ आदि खेलने के लिए [केवल खाली और सेवा-निवृत्त ही नहीं, व्यस्त लोगों का भी ] एक क्लब संचालित करूंगा।
6.मैं इस वर्ष वृद्ध महिलाओं-पुरुषों के लिए संगीत व डांस की कक्षाएं संचालित करूंगा। जिसमें सिखाने के लिए युवाओं और बच्चों को आमंत्रित करूंगा।
7.मैं कार्यशील महिलाओं [वर्किंग लेडीज़] के लिए कार्य-स्थल पर ताज़ा भोजन 'टिफिन द्वारा' न्यूनतम मूल्य पर भेजने का केंद्र संचालित करूंगा।
नोट -टिप्पणीकारों से निवेदन है कि वे इनमें से जिसे सबसे उपयोगी समझें, कृपया, उसका क्रमांक लिख दें।     

Saturday, December 1, 2012

जब आप पीछे रह जाएँ

कभी-कभी ऐसा होता है, आपको लगने लगता है कि  समय आगे बढ़ गया और आप पीछे छूट गए। ऐसे में आपके पास तीन विकल्प होते हैं-
1.अरे, ये कैसे हुआ? चलो पता लगाएं, और फिर से पकड़ें अपने समय की चाल को।
2.जाने दो, अब कौन दौड़े? जो आगे गए वो ही कौन सा तीर मार लेंगे? दुनिया गोल ही तो है। फिर यहीं आयेंगे।
3.लेकिन ये कैसे कहा जा सकता है? पहले इस बात की पुष्टि तो हो।
यदि आप भी ऐसा अनुभव करें, तो पहले ये देखें, कि  आप की स्थिति इन तीनों में कौन सी है?
सबसे पहले हम तीसरी स्थिति की बात करते हैं। चलिए, पुष्टि करें- आप को किसी पार्टी में जाना है, आपके मन में कश-म-कश चल रही है, कि  पार्टी में जाएँ, या न जाएँ। बस, केवल इस असमंजस का पता लगा लीजिये कि  आप क्यों नहीं जाना चाहते? आपका काम हो गया। न जाने का कारण पता लगते ही शीशे के सामने खड़े हो जाइए।या तो आपको ख़ुशी होगी, या आप को अफ़सोस होगा, या आपको अपने पर तरस आएगा। यदि "तरस" आया, तो सचमुच आप पीछे छूट गए हैं।
अब दूसरी बात। यदि आपकी मानसिकता 'जाने दो, कौन दौड़े' वाली है, तो अखबारों,पत्रिकाओं, टीवी या कंप्यूटर में "विज्ञापनों" को ध्यान से देखना शुरू कर दीजिये। क्रीम,पाउडर,शैम्पू,बाम,ऑइल,वैसलीन आदि के विज्ञापनों पर आँखें गढ़ा कर मन में सोचिये, कि  आप किसी सरोवर के किनारे बैठे मछलियाँ पकड़ रहे हैं। कुछ दिनों में आप पाएंगे कि  सब फ़िज़ूल की बातें हैं। आप कोई पीछे नहीं छूटे।
यदि आप पहले संवर्ग में हैं, अर्थात समय को फिर से पाना चाहते हैं, तो आप खुद अपना रास्ता तलाशने में सक्षम हैं। आपसे क्या कहना।      

निजी दुःख-सरकारी दुःख

शादियों का सीजन है। शादी चाहे प्यार से हो, चाहे व्यापार से,होती तो सीजन में ही है।
शादियों के सीजन में दफ्तर खाली रहने लगते हैं, क्योंकि कर्मचारियों-अधिकारियों को बरातों में शिरकत करनी पड़ती है।स्कूल-कालेज सूने होने लगते हैं, क्योंकि सड़कों पर बच्चों और युवाओं को नाचना पड़ता है।मिल-कारखाने धीमे चलने लगते हैं, क्योंकि मजदूरों-मालिकों को मुफ्त की रोटी का बुलावा होता है। बाज़ारों में उफान आजाता है, क्योंकि यह महिलाओं के लिए साड़ी के मैचिंग रंग की नेलपॉलिश और पर्स के मैचिंग रंग की चप्पलें खरीदने का सीजन होता है। जौहरियों  की दूकान पर सोने के कंगन बिकने से लेकर गलियों में चेन लुटने तक का सीजन होता है।
दीवाली की रंग-बिरंगी रोशनी बिना दीवाली के चमकाने का सीजन होता है। आतिशबाजी ईद, दीवाली और क्रिसमस के साथ गुरुपर्व तक, सबकी याद एक साथ दिला देती है। सड़कों पर भेड़ -बकरियों की तरह रगड़ खाती कारें, इन दिनों सज-धज के चलने लगती हैं, क्योंकि उन्हें दूल्हा-दुल्हन लाने के कांट्रेक्ट मिलने लगते हैं।
डायबिटीज़,ब्लडप्रेशर,बदहजमी और गैस के रोगियों को बीबी की नुक्ताचीनी के बिना मसालेदार भोजन बिना कण्ट्रोल मिलता है।
ऐसे में थोड़ा बहुत दुःख-सुख भी मिले, तो लोग आराम से झेल जाते हैं।
और अगर दुःख भी सरकारी हो तो लोग ख़ुशी ...क्षमा कीजिये आसानी से सह जाते हैं, फिर चाहे एक दिन का हो या सात दिन का। आधा झुका झंडा, पूरी लहराती झंडियों में दीखता ही किसको है?         

Friday, November 30, 2012

"शून्य में कुछ उग रहा"

मुझे कई साल पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया बिल्डिंग में बैठे हुए मेरे एक आत्मीय मित्र ने कहा था, कि  लेखकों को सब-कुछ लिखते रह कर सार्वभौमिक लिक्खाड़ बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्हें बारीकी से अपने लेखन की सर्वश्रेष्ठ विधा को पहचान कर एक ही विधा में निरंतर काम करना चाहिए।
वह जनाब तो कह कर अपने काम में लग गए, पर मेरे गले उन्होंने यह बेचैनी मढ़  दी, कि  मैं किसी कहानी के बाद कोई कविता लिखता, तो अँगुलियों में खलिश सी होने लगती। उपन्यास लिख चुकने के बाद तो बीमार सा ही हो जाता, "फिर उपन्यास ही लिखूं?"
कई दिन बाद एक दिन बैठे-बैठे मुझे अकस्मात इस उलझन का समाधान मिल गया। जैसे अचानक बोधि वृक्ष के नीचे बैठे बुद्ध को दिव्य ज्ञान हुआ था, उसी तरह मुझे भी सहसा यह बोध हुआ, कि  उस मित्र की बात मैं भला क्यों मानूं? वो होता कौन है अपनी राय मुझ पर थोपने वाला?
आज यह बात मुझे इसलिए याद आ गई, क्योंकि वह एक दिन अचानक मुझे मिल गया। बरसों बाद मिले थे, अतः खूब बातें हुईं। मैंने चाय पीते-पीते उस से पूछा, अब तुम रिटायर होकर घर बैठ गए, ज़रा याद करके यह तो बताओ कि तुमने जीवन में किस-किस से क्या-क्या कहा?किस-किस ने तुम्हारी मानी, और किस-किस ने तुम्हारी बात हवा में उड़ा दी?
वह शरमा गया। इस तरह लजाया, जैसे उसे अपनी पत्नी की याद आ गई हो, जिसने तमाम उम्र कभी उसकी कोई बात नहीं मानी। जिस बात के लिए वह मना करता था, उसे तो वह हर हाल में करके ही रहती थी।
मेरी भी अब इच्छा हो रही है कि  जब वह अगली बार मेरे पास आये, तो उसे मेरी कविता की नई किताब पढ़ने को मिले। इस बार वह मेरा कहानी संग्रह "थोड़ी देर और ठहर" पढ़ने के लिए ले गया है।     

Thursday, November 29, 2012

"नित जोड़-तोड़म, तोड़-फोड़म, सकल संसद दूषणम"

अब सब यही चाहते हैं, कि  एक अच्छा, विकसित और संपन्न देश मिले।युवा पीढ़ी तो खास-तौर पर। सब उकता गए हैं बेईमानी, भ्रष्टाचार और बद-इन्तजामी से।ऐसी स्थिति और भी विचित्र होती है, जब आपके पास एक शानदार अतीत हो, एक संपन्न परंपरा हो, और नैतिक मूल्यों का ज़खीरा हो, फिर भी आप के सारे अर्जन और ऊर्जा  पर धुंध छा जाए, और आप रास्ता भटक जाएँ।
जब बर्फ गिरती है, तो हरे-भरे पेड़ सफ़ेद हो जाते हैं। सारा माहौल सुस्त हो जाता है। तब पुरानी चहल-पहल में लौटने- पहुँचने के लिए बर्फ हटानी पड़ती है, पेड़ नहीं।
हमें सबको हटा देने के लिए श्रम नहीं करना है। उनके मानस बदलने के लिए प्रेरित करना है। उनके ज़मीर पर से बर्फ हटानी है। उनका विकल्प नहीं, उनकी काहिली और जड़ता का विकल्प ढूंढना है।उन्हें हटा दिया, तो वे अपनी समूची भ्रष्टता और बेईमानी के साथ हमारे इर्द-गिर्द रहेंगे, और भी खतरनाक होकर। हमें ऐसे नई जुराबें नहीं पहननी, कि  पुरानी जुराबें जेब में ही रहें, और बदबू आती रहे। जब सही मौसम आयें, तो सतर्क रह कर हमें अपने अगले दिनों के लिए अन्न सहेज लेना है। रखा-पुराना, सड़ा-गला खाते रहने के दिन जितनी जल्दी बीतें, अच्छा है। ताजगी चुनने के मौके, भले ही  धीमी रफ़्तार से मिलें,पर लोकतंत्र में मिलते हैं।    

Wednesday, November 28, 2012

तारे और अंगारे

    जब दुनिया अच्छी तरह बन गई तो सब काम सलीके से शुरू हो गए। घर-घर रोटी बनने लगी। जहाँ घर नहीं था, वहां भी रोटी बनती। पेड़ के नीचे, सड़क के किनारे, दो ईंट-पत्थर जोड़ कर उनके बीच अंगारे दहकाए जाते, और रोटी बनती। चूल्हे मिट्टी  के हुए, लोहे के, या पत्थर के, रोटी बनती। धुआं हो, लपटें हों, या आंच हो, रोटी बनती। लकड़ी, कोयला, गैस, तेल कुछ भी जलता, और उस पर रोटी बनती।
औरतें रोटी  बनातीं। बल्कि कभी-कभी तो औरतें केवल रोटी ही बनातीं। भूखे बच्चे सामने थाली लेकर बैठ जाते, और रोटी बनती। झोंपड़ी हो,कोठी हो, बंगला हो या महल हो, रोटी बनती। झोंपड़ी हो तो भूखे बच्चों के लिए रोटी बनती, बड़ा बंगला हो, तो नौकर-चाकर-कुत्तों और भिखारियों के लिए रोटी बनती।औरतें लाल आँखें करके चूल्हा फूंकते हुए रोटी बनातीं।चमचमाती रसोई हो तो होठ लाल रंग के रोटी बनातीं।
बेटी रोटी बनाती। बहन रोटी बनाती। भाभी रोटी बनाती। माँ रोटी बनाती। नानी और दादी रोटी बनातीं।
औरत अपने घर रोटी बनाती, फिर पराये घर जाकर रोटी बनाती।
लड़की रोटी बनाती, फिर जब उसे बिलकुल गोल रोटी बनाना आ जाता, तो वह महिला बन जाती। पहले पिता के लिए, फिर भाई के लिए, तब पति के लिए, और फिर ससुर के लिए रोटी बनाती।
माँ रोटी बनाने में मदद करती, सास रोटी न फूलने पर जली-कटी सुनाती, पर रोटी बनती। अगर गरीब का घर हुआ, तो पहले दोनों साथ-साथ मजदूरी करते, फिर घर आकर मर्द बीड़ी पीता और औरत रोटी बनाती। अगर अमीर का घर हुआ, तो मर्द टीवी पर मैच देखता और औरत रोटी बनाती।
आग,औरत और रोटी का सम्बन्ध कभी न टूटता, घर-घर रोटी बनती, रोज़-रोज़ रोटी बनती।
फिर इन्कलाब आया। आदमी भी रोटी बनाने लगा। आसमान फट पड़ा। तारे ज़मीन पर चले आये। रसोइयाँ एक स्टार, दो स्टार और पांच तारा होने लगीं।
और इस तरह अंगारों और सितारों का बंटवारा हो गया।    

Tuesday, November 27, 2012

यह संकेत बहुत अच्छा है

यदि कोई चीज़ बिगड़ती है,तो सभी को बुरा लगता है। पहले सभी चाहते हैं कि  यह सुधर जाए, पर यदि प्रयास करने पर भी वह नहीं ठीक होती, तो फिर धीरे-धीरे सबका धैर्य चुकने लगता है, और वे उपेक्षा से उसे बिगड़ता हुआ देखते रहते हैं। बाद में उनकी हताशा उन्हें विध्वंसात्मक बना देती है और वे उसे और भी नष्ट-भ्रष्ट करने लग जाते हैं।
यह प्रक्रिया आप किसी बच्चे को अपने खिलौने के साथ अपनाते देख सकते हैं। अपने प्रिय खिलौने को टूटा देख कर वह पहले सकारात्मक होकर उसे जोड़ने की कोशिश करने में प्रवृत्त होता है, पर फिर विध्वंसात्मक हो जाता है। वह उसे और तोड़-फोड़ कर उसका अस्तित्व मिटा देना चाहता है।
यह स्थिति दो बातों को इंगित करती है। एक तो यह, कि  अब बच्चा किसी दूसरे, उससे बेहतर खिलौने की तलाश में लग जाएगा, और दूसरा यह, कि  बच्चा अब अपने मानसिक विकास की अगली पायदान पर चढ़ जाएगा।
बचपन में कोई अपने माता-पिता से कुत्ता या मछली पालने की जिद करता है। बाद में जब वह कुत्ता या वह मछली मर जाती है तो बच्चा दोबारा मछली नहीं मांगता,वह कुछ और चाहता है क्योंकि उसके अनुभवों का एक अध्याय यहाँ पूरा हो जाता है।
हमारी युवा पीढ़ी इन दिनों ऐसा ही सलूक "देश" के साथ कर रही है।वह दिन गए, जब वह इस पर अविश्वास करके इसकी अवहेलना करती थी। अब वह तन-मन-धन से इसका पुनर-निर्माण चाहती है। कई युवाओं से मिल कर मुझे ऐसा लगता है कि  अब वे समस्याओं को नहीं, उनके हल को सुनना चाहते हैं।

Monday, November 26, 2012

ऐसा पहले भी हो चुका है

अरविन्द केजरीवाल की "आम आदमी पार्टी"शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसका स्वागत यह कह कर किया कि  अब एक नया इतिहास रचा जा रहा है।कुछ लोगों ने यह भी कहा कि  पंद्रह सौ पार्टियों के देश में अब पंद्रह सौ एक पार्टिया हो गईं।
अब सब से दस-दस रूपये लिए जायेंगे। दस रूपये लेना कोई भ्रष्टाचार नहीं है। मोरारजी देसाई ने भी जनता से एक-एक रुपया लिया था। आम आदमी चुनाव लड़ेंगे। चुनाव लड़ना कोई गलत बात नहीं है। बीजेपी के अभ्युदय काल में संतों-पुजारियों-संन्यासियों ने भी चुनाव लड़े थे। अब देश के दो सौ पचास जिलों में लोगों ने पार्टी का दफ्तर बनाने के लिए अपने-अपने घर प्रस्तावित कर दिए। अच्छे काम के लिए अपने-अपने घर में जगह दे देना कोई गलत बात नहीं है। कांग्रेस के आरंभिक दिनों में भी मोती लाल नेहरु और ऐसे ही कई संपन्न लोगों ने अपनी मिलकियत देश के लिए दे देने की पेशकश की थी।पिछड़ों को साथ लेना कोई जुर्म नहीं है। मायावती और कांशीराम ने भी यह किया था।
दस रूपये, देश-सेवा के लिए दिया गया समय, गतिविधियों के लिए दी गई जगह,या पिछड़ों को सुविधाएं, बस केवल बीज की तरह इस्तेमाल न हों। दस रूपये देने वाले लोग कल रुपयों के पेड़ से धन झाड़ने न लगें,सेवा करने वाले बुलेट-प्रूफ एयर-कंडीशंड गाड़ियों में न घूमने लगें, दान दिए घरों को लोग पांच-सितारा होटलों,  और मालों में न बदलने लगें,तथा पिछड़े लोग समर्थ बनने के बाद अपनी ही जाति के लिए सब कुछ आरक्षित रखने की लालसा न रखें, इस के लिए शुभकामनायें।

ज़ेबरा,गधा,खच्चर,टट्टू और घोड़ा

राजा का लड़का जब थोडा बड़ा हो गया, तो उसके दिल में भी आया, कि  अब मेरी भी कोई सवारी हो। जैसे मेरे पिता नगर की सड़कों पर हाथी पर बैठ कर निकलते हैं, जैसे  मेरी रानी माँ बग्घी में बैठ कर निकलती हैं, वैसे ही मेरे पास भी तो कुछ हो। उसने इस बारे में अपने पिता के आगे कोई मांग रखने से पहले अपने गुरु से सलाह लेना उचित समझा।
गुरूजी ने कहा-"जब तक तुम्हारे पिता यहाँ के राजा हैं, तब तक तुम्हारे पास कोई विशेष काम तो है नहीं, तुम एक टट्टू  लेलो।"
राजकुमार को बात कुछ जँची  नहीं। उसने अपने मित्रों से सलाह करने की बात सोची। मित्रों ने कहा- "तुझे कौन सा कहीं जाना है, हमें तो शहर में मस्ती करते हुए ही घूमना है, तू एक खच्चर लेले।"
राजकुमार को सलाह जमी नहीं, उसने सोचा, क्यों न मैं अपनी बहन, राजकुमारी से पूछूं। राजकुमारी ने उसकी बात सुनते ही कहा- "इसमें सोचना क्या है, गधा ले डाल , तुझपे तो वही जमेगा।"
असंतुष्ट राजकुमार अपनी माँ  के पास गया। रानी माँ  ने कहा-"ये सब तो यहीं मिल जाते हैं, तू तो अपने पिता से कह कर दूर देश से बढ़िया सा ज़ेबरा मंगवाले, शान से उस पर घूमना।"
राजकुमार कुछ सोचता हुआ  लौट ही रहा था, कि  रास्ते में उसे एक घोड़ा मिला। घोड़े पर एक सैनिक का लड़का बैठा था। राजकुमार ने लड़के से पूछा- "तुम इस घोड़े पर सवारी क्यों कर रहे हो?" लड़का बोला-"मैं न तो किसी से कुछ पूछ कर कोई चीज़ खरीदता हूँ, और न ही खरीदने के बाद सोचता हूँ कि  यह मैने क्यों खरीदी"।कह कर लड़का चल दिया।
राजकुमार ने तुरंत अपने पिता से उसके लिए एक शानदार अरबी घोड़ा  खरीदने की फरमाइश कर डाली।   

Saturday, November 24, 2012

आम आदमी

आइये, सबसे पहले जानें, कि कौन है आम आदमी?
वो आदमी जिसे आसानी से रोटी कपड़ा और मकान नहीं मिलता,जिसे जीवन की मूलभूत ज़रूरतों के लिए लगातार संघर्षरत रहना पड़ता है।
इस आदमी के लिए किसी भी देश में, किसी भी समय में सबसे बड़ी बाधा यही है कि  कुछ लोग "उसकी रोटी"  अपने गोदाम में रख लेते हैं। उसका कपड़ा अपनी निगाहों से उतारने की फिराक में रहते हैं,उसके मकान पर अपना झण्डा फहरा देना चाहते हैं।
आम आदमी के लिए काम करने वाले  किसी भी व्यक्ति को इन गोदामों के ताले तोड़ना आना चाहिए,उन आँखों को फोड़ना आना चाहिए, उन झंडों के रंग बदलना आना चाहिए। यह आसान काम नहीं है।लेकिन इतिहास मुश्किल काम करने वालों को ही याद करता है।
एक राजा था।उसने ऐलान किया कि  जो कोई उसके राज्य के सभी लोगों को खुश कर देगा, वह उसे पुरस्कार देगा। एक युवक ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। वह रोज़ वेश बदल कर घूमता, और देखता कि  राज्य में कौन दुखी है। जो भी उसे दीन-दुखी दिखाई देता, वह चुपचाप, राजा के खजाने से चुरा कर उसे उसका वांछित धन दे देता। कुछ दिन में राज्य में सभी ओर खुशहाली फ़ैल गई।
जब उसने राजा से ईनाम माँगा, राजा ने तत्काल आदेश दिया कि  उसे शाही खजाने से मुंह माँगा ईनाम दिया जाय। तब मंत्री ने डरते-डरते बताया-हुज़ूर,आपके शाही खजाने में तो एक मुद्रा भी नहीं है।
राजा आग- बबूला हो गया। वह बोला- जब राज्य में मैं ही दीन-दुखी हूँ, तो फिर इस युवक को ईनाम किस बात का?
युवक तत्काल बोला-महाराज, बात तो आम लोगों की थी। आम आदमी तो आपके राज्य में सभी खुश हैं।
राजा को उसकी बात सही लगी। राजा ने अपनी पगड़ी उतार कर उसे ईनाम में देदी।    

Friday, November 23, 2012

दो उल्काएं,जुगनुओं की तरह प्यार से गले मिलीं

कुछ दिन पहले जब मैं बाल ठाकरे के दिवंगत हो जाने के बाद, किसी अखबार में पाठकों के कमेंट्स पढ़ रहा था, तो एक युवक की टिप्पणी  ने मुझे चौंकाया। उसने लिखा था कि  "शायद उन्होंने यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म 'जब तक है जान' देखली होगी, इसका सदमा वह सह नहीं पाए, और चल बसे।"
इस टिप्पणी  से मुझे लगा कि  हम सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से ही धरती पर चिपके हैं, वर्ना पता नहीं चलता कि  इस अन्तरिक्ष में कौन कहाँ?
वैसे कुछ दिन पहले यह चर्चा जबरदस्त ढंग से थी कि  दीवाली पर यश चोपड़ा की फिल्म रिलीज़ होने वाली है, और इसके लिए अजय देवगन को मनाने की कोशिशें चल रहीं हैं, कि  वह अपनी फिल्म 'सन ऑफ़ सरदार' की रिलीज़ आगें बढ़ा दें, ताकि एक म्यान में दो तलवारों की स्थिति न आये। अच्छे फिल्मकार सोचते हैं, कि  दर्शक एक बार में एक ही फिल्म पर तवज्जो दे सकते हैं। खैर, अब दोनों फ़िल्में दो निहायत सामान्य खेलों की तरह दो सिनेमा-घरों में चल रही हैं। कहीं कोई भीषण उल्कापात नहीं हुआ।
दर्शक भी अब पुराना किस्सा भूल कर कसाब और अफज़ल पर बात कर रहे हैं।फांसी और डेंगू पर बात कर रहे हैं। भ्रष्टाचार और मंहगाई पर बात कर रहे हैं। बीजेपी और कांग्रेस पर बात कर रहे हैं। राहुल और मोदी पर बात कर रहे हैं। फिल्मवाले इतना नहीं समझते, कि  बात हमेशा दो मुद्दों पर होती है। एक अकेले पर कोई क्या बोले?

धन्यवाद- ज्ञापन और 700 पोस्ट

ये एक सुखद संयोग ही था, कि  अपने ब्लॉग की इस सात सौ वीं पोस्ट के लिए मैं जब आपको "थैंक्स गिविंग" की  बात सोच रहा था, तब दूर -दूर से 'धन्यवाद-ज्ञापन' पर्व का शंखनाद सुनाई देने लगा। लीजिये, बहती गंगा में मैं भी हाथ धोता हूँ, और मेरे साथ एक लम्बा सफ़र तय करने के लिए मैं अपने मन के अंतिम छोर से आपके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
अब मैं आपको यह भी बतादूँ, कि  मेरे मन में इस समय जो कुछ उठ रहा है, वह बहुत सुख-संतोष वाला नहीं है। क्योंकि-
जैसे-जैसे यह संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसे पढ़ने वालों, इस पर टिप्पणी करने वालों, और इसे पसंद करने वालों की संख्या लगातार घट रही है। मेरी स्थिति उड़ान भरते उस "सीगल" सी होती जा रही है जो आकाश की ऊंचाइयों के कारण अकेला पड़ता चला गया। सच में, घाट पर जितने लोगों की चहल-पहल दिखती थी, अब यहाँ नज़र नहीं आती। शायद लोग उड़ते जाते परिंदे को देख कर इसीलिए कुछ नहीं कहते, कि इसके पास हमारा हाल पूछने का और अपना हाल सुनाने का न तो समय है और न ही चाव। खैर, यह दंश तो हम अपने कैरियर में भी झेलते हैं, जब एक दिन ऐसा आता है कि  हमारे केबिन में केवल वही साथी आने लग जाते हैं, जिन्हें हम बुलाएं। वे भी संकोच के साथ। फिर भी, जो आ रहे हैं, उनके प्रति ढेर सारा आभार।      

Thursday, November 22, 2012

मुंबई में समुद्र के किनारे बैठे हुए उसने कहा था- वो कमलेश्वर हैं तो हम भी ...

वो तब उन्नीस साल का कालेज से ताज़ा-ताज़ा निकला युवक था। वह मेरे पास आया, और कुछ दिन रहा। दिनभर हम अपने-अपने काम में व्यस्त रहते, शाम को फुर्सत से हमारी मुलाक़ात होती। उन दिनों घर समंदर से ज्यादा फासले पर नहीं था, इसलिए हम खाना खाने के बाद पैदल टहलते हुए निकलते, और सागर के किनारे देर तक टहलते। हम बातों में इतने मशगूल होते कि  न हमें समय का ख्याल रहता, और न ही इस बात का, कि  बस, एक छोटी सी रात बीच में है, फिर काम पर जाना है। मैं तो मुंबई की गर्मी का अभ्यस्त था, लेकिन उसे ये बहुत खुशगवार नहीं लगती थी। वह न जाने कब बातें करते-करते भी अपने पायंचे मोड़ कर ऊपर चढ़ा लेता, और पानी में पैर डाल कर बैठता।
एक दिन मैंने उस से कहा- "कल मुझे एक काम से कमलेश्वर के पास जाना है, चाहो तो तुम भी चलना।" कमलेश्वर तब मुंबई के साहित्य-जगत में फहराती सबसे ऊंची पताका का नाम था। वह युवक भी साहित्य-जगत की बगिया का नया पंछी था, मैंने सोचा, वह कमलेश्वर का नाम सुन कर कृत-कृत्य हो जायेगा और उनसे मिलकर तो फूला नहीं समाएगा।
पर उसने मेरा प्रस्ताव सुन कर तत्काल कहा- "वह कमलेश्वर हैं, तो हम भी ..."
वह कुछ दिन बाद चला गया। फिर हम कभी नहीं मिले, और लगभग तीस वर्ष का समय गुजर गया। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले कमलेश्वर मेरे शहर में आये, और एक गेस्ट-हाउस में ठहरे। शाम को जब मैं उनके पास जाने लगा तो मेरे कुछ मित्रों ने कहा, कि  मैं उन्हें भी साथ ले चलूँ, और कमलेश्वर से मिलवादूं।पर जब मैंने कमलेश्वर के कमरे में पहुँच कर उन्हें देखा, तो मैंने साथ आये मित्रों को लौटा देना ही मुनासिब समझा। देर रात कमलेश्वर के पास से लौटा तो मैं नहीं जानता था कि  यह उनसे मेरी आखिरी मुलाक़ात है।
अब कमलेश्वर नहीं हैं, पर लगभग पैंतीस साल बाद आज फोन पर मेरी अपने उसी मित्र से बात हुई है। वह कुछ दिन बाद मुझसे मिलने आ रहा है।अब जब वह आएगा, हम कमलेश्वर की नहीं, खुद अपनी-अपनी कहानियों की बातें करेंगे। पर उन कहानियों की नहीं,जो हमारी किताबों में दर्ज हैं,बल्कि उन कहानियों की,जिनके पात्र हम खुद हैं।      

सपनों के गाँव में, काटों से दूर कहीं, फूलों की छाँव में

इस प्रस्ताव पर किसी को कोई एतराज़ नहीं हो सकता। यदि आपसे कोई कहे कि  चलो चलें, सपनों के गाँव में, काँटों से दूर, फूलों की छाँव में, तो आप यह सोच कर खुश ही होंगे, कि  यदि दुनिया में कोई ऐसी जगह है तो क्यों न उसे देखा जाए।
दुनिया में ऐसी जगह है। यदि आप उसका पता-ठिकाना जानना चाहते हैं, तो आँखें बंद कीजिये।
अब आँखें खोल लीजिये। देखिये अपने चारों ओर। है न ठीक वैसी ही जगह, जैसी आप चाहते हैं।
यदि वास्तव में आपको अपने आस-पास  ऐसी जगह दिख रही है,तो उसका आनंद लीजिये, घूमिये, सोचिये, विश्लेषण कीजिये कि  क्यों आप आना चाहते थे ऐसी जगह?
अब बात करते हैं उस स्थिति की, अगर आपको ऐसी जगह नहीं मिली, तो ये कार्यविधि अपनाइए-
1.थोड़ा अन्वेषी नज़रों से इधर-उधर जा कर गहराई से देखिये, होगी।
2.जहाँ आप हैं, उस जगह की ही पड़ताल करके देखिये, क्या उसे ऐसी जगह में तब्दील किया जा सकता है? क्यों न अपने आस-पास के कांटे हटा कर देखें। धूप है, तो चलते जाइए, जहाँ धूप ख़त्म होगी, निश्चित रूप से वहां छाँव होगी ही। यदि सपनों का गाँव कुछ अलग सा है, तो ज़रा एक बार सपना ही फिर से देखें, अपना गाँव ही क्यों न उसमें देखें।
आपने बहरूपिये देखें हैं? देखिये, इसी वेश में आपको अपने आस-पास ईश्वर भी घूमता-फिरता दिखेगा। पहचान लीजिये, बहुत तरह के लिबास हैं उसके पास। हो गई न मुकम्मल जगह? इसका नाम है-"दुनिया!"

Wednesday, November 21, 2012

हम क्यों नहीं तय करते रंग आग का?

देखो-देखो, उम्र अभी तेरह साल भी नहीं होगी, और मुंह में दबा कर सिगरेट, बस लगाली आग!
स्वाहा ! पवित्र अग्नि के समक्ष लिया गया तुम्हारा संकल्प, अवश्य पूरा होगा।
पूरे शहर में कर्फ्यू है, ये आग इसी मोहल्ले की लगाई हुई है।
आग लगे पढ़ाई में, इस मौसम में तो पिकनिक पर जायेंगे।
बस बेटे, मुझे पता है तुझे भूख लगी है, बस दो मिनट, ये जली आग, और ये तैयार तेरा मनपसंद ...
मोक्ष तभी मिलेगा, जब मुखाग्नि कोई अपना देगा।
उसे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, ऐसी फूल सी बहू को जिंदा जला ...
बताइये, आग के कौन से रंग को चुनेंगे?
ऐसी ही है फांसी भी!
आज कसाब को फांसी लग गई। ये ठीक है कि प्रगतिशील कहे जाने वाले कई देश अब मृत्युदंड को नकार चुके हैं। भारत की उदारवादी छवि भी आज इस असमंजस में दिखाई पड़ी। लेकिन प्रगतिशीलता आग के रंग को पहचान पाने की क्षमता नहीं छीनती। यदि मौत का बदला मौत दिए जाने पर करोड़ों लोगों के ज़ेहन में जिंदगी लहलहा उठे, तो ऐसी सज़ा 'न' दिया जाना दरिंदगी है। कबीलाई संस्कृति में लौटने का लांछन पशुता को छिपाने का खोल नहीं होना चाहिए।  

"कसाब" और रुदालियाँ

कसाब को फांसी हो गई। वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। वो जब तक रहा, करोड़ों लोगों को यह बात अखरती रही कि  उस जैसे सर्व-सिद्ध अपराधी को अब कौन सी बात जीवित रखे हुए है। लेकिन न जाने क्या बात है, कि  दुनिया में कुछ भी अंतिम नहीं है, पटाक्षेप अब भी नहीं हुआ है।अब भी फिजा में तरह-तरह के मिसरे तैर रहे हैं। मसलन-
उसे मरने तक इतना खर्चीला रख-रखाव क्यों दिया गया?
क़ानून इतना सुस्त-रफ़्तार क्यों चला?
उसके हमदर्द तब कहाँ थे जब 166 लोग निर्दोष होते हुए भी अपने जीवन से दूर कर दिए गए।
कौन था जो उसकी साँसों की डोर खींचता रहा?
जिसकी मौत की खबर खुद उसका देश 'रिसीव' तक नहीं कर रहा, उसे यहाँ 'बिरयानी' किसकी रसोई में पका कर खिलाई जा रही थी।
"उस जहाँ" में तो दो ही कमरे हैं-स्वर्ग और नरक, तो अब उसे कहाँ रखा जाएगा?
क्या "इस घटना"को कोई और नाम नहीं दिया जा सकता? कहीं भविष्य में कोई यह न कहे कि इस देश में  भगत सिंह और कसाब को ... 

Tuesday, November 20, 2012

कहीं आंकड़ों के गुलाब आपके चारों ओर भी तो नहीं खिलते?

कुछ दिन पहले एक पुराने मित्र से मिलना हुआ। साथ बैठ कर उनके घर चाय पीने और बहुत सारी नई-पुरानी बातें करने के बाद वे अचानक कुछ ढूँढने लगे। यहाँ-वहां सारे में ढूँढने के बाद उनका अपने घर के लोगों पर झल्लाना शुरू हुआ। वे सबको 'उनकी' चीज़ें संभाल कर न रखने के लिए उलाहने देने पर उतर आये। आखिर मुझे बीच में बोलना ही पड़ा। मैंने कहा- "यदि तुम कुछ मुझे दिखाने के लिए, ढूंढ रहे हो, तो परेशान मत हो। मैं बाद में देख लूँगा।"
वे निराश से हो गए। झुंझलाना जारी रहा- "क्या करें? ये लोग कोई चीज़ संभाल कर रखते ही नहीं, मैं तुम्हें कुछ फ़ोटोज़ दिखाना चाह रहा था, जो अभी हमने साउथ में घूमने जाने पर खींची थीं।"
-"ओह, कोई बात नहीं, फोटो क्या देखना, तुम ही बतादो, क्या-क्या देखा?" मैंने उनके घर वालों को उनके गुस्से से बचाने के लिए कहा।
उन्हें शायद अपने देखे शहरों की फेहरिस्त लम्बी करके मुझे सबूत के साथ दिखानी थी। वे उन शहरों के बारे में मुंह से कुछ नहीं बोल पाए। मैंने सोचा, शायद उन्हें सैर से मिले आनंद से कोई सरोकार नहीं, केवल आंकड़ों का मायाजाल दिखाना था।
हाँ, कई लोग ऐसा ही करते हैं।वे ख़ुशी के क्षणों को भोगने से ज्यादा उनकी सनद रखना ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे कई लोग अपने 'ब्लॉग्स' पर आने वालों की संख्या से आनंदित होते हैं। वे इसके लिए "भ्रम-पूर्ण"फ्लैश डेटा जुटाते हैं। वे अपनी पसंद-नापसंद की परवाह किये बिना दूसरों की तारीफ इस प्रत्याशा में करते जाते हैं, कि अब दूसरे उनकी तारीफ करके क़र्ज़ चुकाएं। नतीजा यह होता है कि  कुछ समय बाद वे अपने शौक से उकता जाते हैं, और दूकान बंद करके चले जाते हैं।[दूकान खुली छोड़ कर भी]क्योंकि उनका जुड़ाव उन रचनाओं या विचारों से तो होता नहीं, जो वे पढ़ते हैं, वे तो आंकड़ों की चौसर बिछा कर पांसे फेंकते हैं।
यदि संख्या-मंत्र की माने, तो हमें यह परिणाम मिलेंगे-
1. हलकी भाषा और ओछे विचारों वाले ज्यादा लोकप्रिय होते हैं।
2. महिलाएं, विशेषकर युवा, ज्यादा लोकप्रिय रचनाकार हैं।
3.विद्यार्थी अपनी मित्र-मण्डली की बदौलत ज्यादा सफल हैं।
4.हमारा प्रतिबद्ध राजनैतिक रुझान हमारे "वाह-वाहकारों" की तादाद खूब बढ़ाता है।
5.तकनीक का ज्यादा ज्ञान आपको 'वैचारिक ग्यानी' भी सिद्ध करता है।
हाँ, अपवाद यहाँ भी हैं।            

Monday, November 19, 2012

हम इसी तरह अलग-अलग हैं

जब हम कुछ भी सुनते हैं तो उस पर हमारी प्रतिक्रिया कई तरह से होती है। पहले तो हम यह बात करें, कि  हम सुनते भी कई तरह से हैं। वैसे शाब्दिक रूप से सुनने के लिए हमारे शरीर में 'कानों' की व्यवस्था है। लेकिन इन कानों के द्वारा जो कुछ भी हमारे मस्तिष्क में आता है, वह सब न तो हमारे ही लिए होता है, और न ही यह प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने योग्य होता है।बहुत सी बातें तो वैसे ही, बहती हुई हवा की तरह हमारे इर्द-गिर्द बहती हैं। हाँ उसमें से कुछ बातें केवल हमारे लिए होती हैं, वे हमें चौकन्ना भी करती हैं, और हमारी प्रतिक्रिया भी चाहती हैं।
चारों ओर  बहती बातों से हम जो श्रवित-समूह पाते हैं,उनमें से चुन कर कुछ बातें हमारा अवचेतन हमें देता है, ठीक वैसे ही, जैसे कोई महिला किसी साग-सब्जी में से छिलके-डंठल आदि हटा कर खाने योग्य चुन लेती है। केवल इसी पर हमें 'रिएक्ट' करना होता है।यह हम प्रायः इस तरह करते हैं-
1.हम इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए सबसे पहले अपने चेहरे के लिए एक भाव चुनते हैं। यह भाव नौ रसों में से किसी एक पर केन्द्रित हो सकते हैं।
2.रस के चयन के अनुसार ही हम स्वतः भाषा का चयन भी कर लेते हैं।
3.फिर हम चेहरे के "हेलीपैड"से भाव की पिचकारी द्वारा भाषा का स्त्राव छोड़ते हैं।
यही हमारी प्रतिक्रिया है।
नोट-इस नियम के अपवाद भी होते हैं। जैसे, यदि हम किसी राजनेता का भाषण सुन रहे हों, तो हो सकता है कि  हमारे कानों में क्रिकेट की कमेंट्री जा रही हो, और हम प्रतिक्रिया स्वरुप कोई फ़िल्मी गीत गुनगुना रहे हों।

एक ही चित्र के दो शीर्षक -हताशा और प्रेरणा

हाँ, यह दोनों शब्द एक दूसरे के विपरीत हैं।
प्रेरणा का अर्थ है, हमें कुछ उभरता हुआ दिखे। उगता हुआ। बढ़ता हुआ। हम उसके प्रति आशा और आकांक्षा से भर जाएँ। हम उसमें अपना हित खोजें। हमें अच्छा महसूस हो। हमारी जिज्ञासा और जीवंत हो जाए। हम उसके अनुसरण को प्रेरित हों। प्रोत्साहित महसूस करें। हम कृतज्ञ अनुभव करें।
हताशा में एक पस्ती है। धुंधलाता हुआ कुछ। मिटता हुआ सा। थके-थके हम। निराश। भयभीत। असफलता का अहसास।अनुत्तीर्णता की आशंका। विफलता का खौफ। बोझिलता।शाम का क्षितिज।
कल "मुंबई"बंद और उसके बाद शिवसेना सुप्रीमो की अंतिम यात्रा के दृश्य, अखबारों, टीवी चैनलों और अपनी वास्तविकता में इन दोनों शब्दों का मिला-जुला अहसास जगा रहे थे। यदि किसी शख्स के जीवन के बाद ऐसा दृश्य उपस्थित होता है, तो यह एक  पवित्र उपलब्धि है। यह एक अनिर्णीत असमंजस भी है।

Sunday, November 18, 2012

आभासी दुनिया की विश्वसनीयता

कुछ लोग यह सवाल उठाते हैं, कि  आभासी दुनिया में असलियत की जांच कैसे की जाए? हाँ, यह हो सकता है। शर्त यह है कि  आप के पास इन सवालों के स्पष्ट जवाब हों-
1,आपको यह मालूम हो कि  आप क्या चाहते हैं, और जो चाहते हैं, उसके बारे में बिना किसी हिचकिचाहट के अपने को आश्वस्त कर सकते हों।
2.आप ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हों। यदि आपकी ईमानदारी संदिग्ध है, तो आपको मिलने वाले परिणामों को भी निरापद नहीं माना जा सकता।
3.आप अपनी वांछना पर कायम हों। हाँ, आप बार-बार बदलने की मानसिकता न रख रहे हों।
4.आपके पास सहनशीलता की एक पर्याप्त रेंज हो। मतलब, आप पाने की लालसा के साथ खोने की ज़िल्लत के लिए भी कुछ हद तक तैयार हों।
वाह, फिर फायदा ही क्या? यदि आभासी दुनिया में विचरना जुआ खेलने के सामान रिस्की है, तो इसकी विश्वसनीयता ही क्या? आप ठीक सोच रहे हैं।
लेकिन जब हम किसी रेस में दौड़ते हैं, तब उसका परिणाम केवल हमारे कार्य-निष्पादन पर ही निर्भर नहीं है। दूसरों का कार्य-निष्पादन भी परिणाम तय करता है। दूसरों के ख़राब खेलने में हमारी जीत है। इसे हम अलग-अलग नामों से जानते हैं। वास्तविक दुनिया में हम इसे "तकदीर" या भाग्य कहते हैं। संयोग भी कह देते हैं। नक्षत्रों की चाल भी।
आभासी दुनिया में भी ऐसी कुछ बातें आएँगी। लेकिन इन बातों के जवाब के रूप में आपके पास "आत्म-विश्वास" है।ठीक वैसे ही जैसे विपरीत हवा में किसी नाविक के पास दिशा मोड़ने के लिए पतवार होती है। इस पतवार का प्रयोग नाविक की शक्ति और बुद्धिमत्ता पर निर्भर है।पतवार की अपनी कोई स्वचालित शक्ति नहीं है।
इसे ऐसे समझिये। यदि आपसे आपकी कोई वस्तु खो गई,तो कई संभावनाएं हैं।
1.वह मिल जाए।
2.वह न मिले।
3.वह आपसे कुछ खर्च करवा कर मिले।
4.वह आपको कुछ ईनाम के साथ मिले [जैसे फिल्मों में होता है, खोया रुमाल लौटाने जो शख्स आता है, वही कालांतर में जीवन-साथी के रूप में आपको मिल जाता है]
अब इन सभी स्थितियों को आप सकारात्मक मानिए, क्योंकि आपने तो वस्तु खो ही दी थी।आभासी दुनिया ऐसी ही है।
    

Friday, November 16, 2012

दो और दो तीन

भारत में ऐसे ही मनती है दीवाली। सप्ताह-भर तक तैयारियां, फिर एक रात का ज़बरदस्त जश्न। आकाश में तारे धरती से भेजे जाते हैं उस रात। अंधियार से दिया लड़ता है। खामोशी से पंगा लेता है शोर। और फीकेपन को हराती है मिठाई। सोने-चांदी के बंदनवार सजते हैं, लक्ष्मी के लिए।
लेकिन ये सब तो हो चुका। अब तो आगे की कहानी की बारी है।
एक अखबार लिखता है कि  एक-एक शहर में अरबों के पटाखे बिके। दूसरा लिखता है कि कपड़ों की बिक्री हज़ारों करोड़ की। तीसरे की घोषणा होती है कि  करोड़ों के बर्तन देखते-देखते बिक गए। चौथा कहता है सोना-चांदी ने शताब्दी का सबसे बड़ा उछाल लिया। मिठाई ने ऐसा रिकार्ड तोड़ा,कि घी-दूध के समंदर खप गए। खबरी चैनल भी पीछे नहीं रहते, कहते हैं, जितने सूखे-मेवे पैदा हुए थे, उससे दो गुना ज्यादा बिक गए। साल-भर में जितनी बिजली का उत्पादन होता है,उससे डेढ़ गुनी इस रात जल गई।
फिर बारी आती है, आम आदमी की। वह कागज़ और पेन्सिल निकाल कर बैठता है और जोड़ने लगता है सब ख़बरों के आंकड़े। उसे लगता है कि  अब शहर, शहर नहीं रहे, बल्कि परीलोक हो गए।
और अगले दिन जब घर-घर गोवर्धन की पूजा हो रही होती है, तब आता है उसे पिछले दिन के गुड़ और अगले दिन के गोबर का स्वाद एक साथ।
नगर-पालिका कहती है कि  दीवाली ने इतना कचरा कर दिया कि  अब साल भर तक उठाने वाले नहीं मिलेंगे। बिजली विभाग कहता है, शहरों में रात का और गाँवों में दिन का ब्लैक-आउट। हस्पताल कहते हैं, मधुमेह रोगियों के लिए बिस्तर खाली नहीं। बारूद के सौदागार कहते हैं, बस, अब बाकी बची बारूद धमाकों में काम आएगी। लक्ष्मी कोरियर से स्विट्ज़रलैंड। 
और बेचारा आम-आदमी कहता है- दो और दो तीन!    

Wednesday, November 14, 2012

ऐसी बहनों को एक टीका लगा कर उनकी ख़ुशी की कामना करें

ज़रा अपने और अपने आसपास के घर-परिवारों को देखिये। कितनी ही लड़कियां आपको ऐसी दिखेंगी, जो अपनी मेहनत  और लगन से पढ़ाई करते हुए अपना कैरियर खुद बनाती हैं, और फिर अपने परिवार का सहारा बनती हैं। एक नहीं, बल्कि कई बार तो वे दो परिवारों तक को सहारा देती हैं, एक अपने माता-पिता का परिवार, दूसरा अपने पति का परिवार। भावनात्मक सहारा देने का काम तो उनके जिम्मे है ही। अपने भाइयों के लिए अपनी जान से भी ज्यादा स्नेह लेकर उनके हर दुःख-सुख में शामिल रहना, पिता-माता के लिए दायित्व भरा दुलार लेकर उनकी ज़िम्मेदारी संभालना, और पति व उसके परिवार के लिए तो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तत्पर रहना, कोई लड़कियों से सीखे। यह सब आप अपने आसपास आसानी से देख सकते हैं।
एक बात बताइये, क्या हमारे कलेण्डरों में कोई ऐसी तारीख दर्ज है, जब हम इन बहनों या बेटियों के माथे पे तिलक करके इनकी खुशियों की कामना करें? आइये, आज भाई-दौज है,आज भाई बहन दोनों ही एक दूसरे को शुभ का टीका लगाएं, और इसका नाम केवल "स्नेह-दौज" कर दें।

क्या हमारी होटल इंडस्ट्री इतना नहीं कर सकती?

देश में होटल उद्योग का  नेटवर्क है। हर छोटे-बड़े शहर में ढेरों छोटे-बड़े होटल हैं। कई बड़े शहरों में तो पांच सितारा होटल भी कुकुरमुत्तों की तरह बेहिसाब खुलते ही जा रहे हैं। जबकि कहीं की , कैसी भी सरकार यह कभी नहीं कहती कि  वह होटल उद्योग को बढ़ावा देगी। न किफायती दरों पर भूमि का आवंटन, न ही होटलों पर अनुदान, न कोई प्रोत्साहन योजना, फिर भी होटल धड़ाधड़  खुलते ही जा रहे हैं।बरसों पुराने,बिसराये गए पर्यटन स्थलों के आसपास भी होटल ऐसे खुलते जा रहे हैं मानो इन्हें देखने के लिए दूर-दराज़ के लोग इन होटलों में डेरा  डाल कर धूनी  रमाएंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि  होटलों के पास पैसे की कोई कमी भी नहीं है।
जिन मंदिरों की मान्यता है, उनके आसपास खुलने वाले होटल-धर्मशालाओं की तो कोई गिनती ही नहीं है। कई नामी-गिरामी मंदिरों का तो हाल यह है, कि उनमें बसने वाले भगवान तो एक छोटी सी चौकी पर बिराजमान हैं,पर उनमें आने वाले दर्शनार्थियों के लिए सैंकड़ों होटल-सराय-धर्मशालाएं दूर-दूर तक  फैले पड़े हैं।
कई मंदिर ऐसे हैं कि उनमें चढ़ने वाला चढ़ावा उनकी संपत्ति को अरबों तक पहुंचा चुका है। उनकी आय देख कर कई राज्यों के वित्त-मंत्रियों में हीन-भावना आ जाती है,कि  इतना तो हमारे राज्य का सालाना बजट भी नहीं है। इनके आसपास भी बेशुमार होटल हैं।
इतने होटलों में मिला कर कर्मचारियों की कमी भी नहीं है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि  इन होटलों को देश भर में शिक्षा का कार्य दे दिया जाए। ताकि कम से कम बच्चे अपने बचपन में थोड़ा-बहुत  कुछ पढ़-लिख भी तो सकें।
हमारे विद्यालय तो इन्हें दोपहर का भोजन खिलाने में जी-जान से लगे हुए हैं। उनके पास न तो बच्चों को पढ़ाने का समय है, और न काबिलियत।         

Tuesday, November 13, 2012

ये रात कब तक आएगी?

कल देर रात बिस्तर पर जाने के बाद भी दिन थमा नहीं। रौशनी रात भर रही। धमाकों का गगन-भेदी शोर पूरी रात चला। यह ख्याल आता रहा कि चौदह साल बाद घर लौटने पर राम का स्वागत अगर इसी तरह हुआ होगा तो क्या उन्हें घर लौटने के बाद भी नींद नसीब हुई होगी? मन यह सोच कर उदास रहा कि  जो लोग अब तक सोये नहीं हैं वे जुआ खेल रहे हैं। गुलज़ार सड़कों पर अब शराब पीकर घिसटने वालों की आमद होने लगी है। एक युवक ने गर्व से बताया कि  हर पंद्रह मिनट बाद वह जो विशेष पटाखा फोड़ रहा है, वह पांच हज़ार रूपये का है। सैंकड़ों रूपये किलो वाली कीमती मिठाइयाँ और सूखे मेवे बेकद्री से खाए-कम-फेंके-ज्यादा जा रहे हैं। बल्बों में बिजली और दीयों में तेल की न कोई गिनती है, न कोई सीमा। दफ्तर-विद्यालयों में सप्ताह भर तक  काम लगभग ठप्प है।
कभी-कभी लगता है कि  हमारी अर्थ-व्यवस्था, हमारा सामाजिक ताना-बाना,हमारा बौद्धिक चिन्तन कहीं सचमुच किसी दिन "राम-भरोसे" ही न हो जाए।

टिट फॉर टेट , यानी जैसे को तैसा

जब दशरथ का वचन सुन, राम को जंगल में जाने के लिए निकलना पड़ा, तब कैकेई और मन्थरा के अलावा कोई खुश नहीं हुआ। जब राम को लौटा लाने के भरत के प्रयास विफ़ल हो गए, तब सब मायूस हो गए। राम जंगल क्या गए, लोगों ने अपने घर को जंगल बना लिया।
जैसे जंगल में सैंकड़ों प्रजातियों के जीव रहते हैं, वैसे ही घरों में भी मच्छर, मकड़ी,छिपकली,मक्खी,पतंगे, खटमल,मेंढक,चूहे,छछूंदर,गिलहरी,कबूतर,चिड़िया,इल्लियाँ,चींटे,चींटियाँ,कनखजूरा, टिड्डा,तितली और न जाने कौन-कौन से जंतु रहने लगे। लोग इनसे लापरवाह रहते, वे सोचते, जब हमारे राम इन सब के बीच गुज़ारा कर रहे हैं, तो हमें इनसे क्या परहेज़। राम जंगल में हैं, तो घर और जंगल में फर्क ही क्या?
जब चौदह साल बाद राम घर लौट आये, तब लोगों का ध्यान गया।अरे, ये कौन-कौन घर के कौनों में डेरा डाले पड़ा है? बस, लोगों ने आव देखा न ताव, पिल पड़े इन पर। मार-मार कर भगाया सब को। झाड़ू,ब्रश,पौंछा,दवा का छिड़काव, चाहे जो करना पड़े, किसी को नहीं रहने देना है। मकड़ी कितनी ही ऊंचाई पर जाला बुने, लम्बे बांस के सहारे सब छिन्न-भिन्न।अब जब अपने राम घर लौट आये, तो इन जंगलियों से क्या वास्ता? ये दोबारा इधर का रुख न करें, इसके लिए रंग-रोगन, कलई, डिस्टेम्पर,कुछ भी लगा कर इनका रास्ता बंद करने के पीछे सब पिल पड़े। बिल,छेद,कंदराएं, दरारें,सब बंद। ये घर हैं, कोई जंगल नहीं, कि  कोई भी यहाँ आराम से घूमे।
ये सब, साल भर आदमी को तंग करते हैं न , तो दीवाली के दिन इनसे भी बदला। जैसे को तैसा।
हाँ, बस एक को आने की आज़ादी है घर में। सिर्फ एक। वह भी केवल आज के दिन। केवल "उल्लू"। न जाने वह अपने साथ किसे ले आये? वह आज कभी भी आये,उसका इंतज़ार हम सब करेंगे। वैसे तो वह अँधेरे में भी देख लेता है, पर उसके लिए दीप जला कर ढेर सारा उजाला करदें। "शुभ दीपावली"      

Sunday, November 11, 2012

गौतम, आम्रपाली, राखी,दिग्विजय, अरविन्द और समय

जैसे हम कहानिया पढ़ते हैं कि  आम्रपाली ने गौतम से पहले जिरह की और तब आशीर्वाद लिया, वैसे ही आगे आने वाली नस्लें भी तो कुछ पढ़ेंगी। उन्हें जानना होगा कि  राखी के युग में दिग्विजय कौन था।
पुराने समय में जब शासक अपने रहने के लिए किले बनवाते थे, तो उनमें सुरक्षा के सभी इंतजाम होते थे। लोग भाले, बरछी, कृपाण  आदि से हमले करते थे, तो इन सभी अस्त्रों के विरुद्ध दुर्गों में सुरक्षा चक्र भी होते थे। बारूद के गोलों को झेलने के लिए ऊंचे और मज़बूत बुर्ज़ हुए। शीश-महलों के दिन लदने के साथ बाद में जब शासकों पर पत्थर फेंकने का चलन आया तो शीशे की दीवारें प्रचलन से हट गईं , और लोहे के गेटों पर संतरी  खड़े होने लगे। संतरी पहरे के समय में गुटका आदि सुभीते से खा सकें, इसके लिए गेट पर गुमटियां बनीं।
आखिर शासकों को किस-किस चीज़ से महफूज़ रखा जाता? अतः फिर उनके ही बदन पर बुलेट-प्रूफ लबादे लपेटे जाने लगे। राइफलें ,बन्दूखें आ गई थीं। धीरे-धीरे हलकी-फुलकी चीज़ों का प्रयोग बढ़ा। कुपित होकर लोग चप्पल-जूते फेंकने लगे। तब जूता कम्पनियों ने इतने लम्बे लेस बनाने शुरू किये, कि  जब तक श्रोता जूता खोले तब तक 'माननीय' सभा बर्खास्त करके भाग सकें।  
कालांतर में युग वाचाल हो गया। बयानों से भी शासकों पर हमले होने लगे। तब सत्तानवीसों के आउट-हाउसों में श्वान-गृहों, अस्तबलों, गैराजों की भाँति कक्ष बना कर चारों दिशाओं की चौकसी करने वाले बयान-वीर भी रखे जाने लगे। ये संतों से लेकर नर्तकियों तक पर धारा-प्रवाह बोलते थे, और धारा की भाँति ही चंचल-अविश्वसनीय-उद्दंड और उच्श्रंखल होते थे। इनका चपल-नर्तन, दुनिया आभासी हो जाने के कारण दूर तक देखा-सुना जा सकता था।   

Saturday, November 10, 2012

इस तरह सागर और ज़मीन की जिंदगी कोई बहुत अलग नहीं

बीबीसी पर अभी थोड़ी देर पहले चाइना की बात हो रही थी। वे कह रहे थे कि बीजिंग में बीस में से एक आदमी करोड़पति  है। कुछ अमीर लोगों से उन्होंने बात भी करवाई। एक अमीर महिला कह रही थी कि  अब हम अमीर हैं तो हमें अमीरों की तरह रहना पड़ता है। एक युवक कह रहा था कि  वह गरीब है, पर उसे अमीरों को कीमती लिबास पहने देख कर बुरा नहीं लगता, क्योंकि यदि वह खुद अमीर होता तो वह भी ऐसा ही करता। लेकिन वह ईमानदारी से ये ज़रूर कह रहा था कि  उसे गरीब होने का अफ़सोस अवश्य है।
जीवन ऐसा ही है। इसे ऐसा ही होना भी चाहिए। जिस दिन सारी दुनिया के सारे लोग बराबर मिल्कियत के स्वामी बन कर एक सा लिबास पहनेंगे, उस दिन घरों में बैठे लोगों का दीवारों से सिर फोड़ लेने को मन करेगा। महिलायें अपने लिबास को तिलांजलि देने के लिए मन्नत मांगने लगेंगी। कोई घर से बाहर नहीं निकलना चाहेगा, क्योंकि बाहर जाकर क्या करेगा? कोई घर में भी बैठना नहीं चाहेगा, क्योंकि आखिर वह घर में बैठे-बैठे करेगा क्या?
सागर में गोताखोर इसीलिए जाते हैं, कि  सांस रोक कर नकली हवा के सहारे भी वे जीवन की विविधता खोज कर लायें। घर में लोग एक्वेरियम रख लेते हैं, कि उनमें तैरती मछलियों के अलग रंगों से जी बहले।सब एक से हो गए तो रैंप पर सुष्मिता सेन क्यों चलेंगी?
दीपावली का प्रकाश फैलने लगा है, यह आप तक पहुंचे, यह रौशनी आपसे भी निकले। शुभकामनाएं!  

संख्या, मात्रा से बहुत फर्क नहीं पड़ता

संख्या का अपना महत्त्व है। यह निर्णयों को अपने पक्ष में करने में सहायक है। लोकतंत्र में तो यह सिरमौर है। लेकिन फिर भी यह सब कुछ नहीं है। इसे क्वालिटी, अर्थात गुणवत्ता आसानी से मात देती है। कई बार एक और एक ग्यारह हो जाते हैं।
एक बार देश में लोकसभा के चुनाव होने वाले थे, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण से किसी सांसद ने पूछा- इंदिराजी की पार्टी को कितनी सीटें मिल जाएँ तो वे प्रधान मंत्री बन सकती हैं। राजनारायण, जो कि  इंदिराजी की विपक्षी पार्टी में थे, बोले- उन्हें तो उनकी खुद की एक सीट भी मिल गयी, तो वो लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करके प्रधान मंत्री बन जायेंगी।
एक दिलचस्प किस्सा फ़िल्मी दुनिया में भी प्रचलित है। अभिनेता जीतेंद्र इसे खुद अपने मुंह से सुना कर स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा- मेरी एक साल में छः-सात फ़िल्में आती थीं, मगर जब अमिताभ की साल में एक भी फिल्म आती, तो खुद मेरा बेटा भी उनकी तरफ हो जाता था।
एक फैक्ट्री के सौ काम करने वाले वर्करों को चार काम न करने वाले वर्कर , या एक कालेज के सौ पढ़ना  चाहने वाले बच्चों को चार न पढ़ना  चाहने वाले लड़के, सड़क पर हुडदंग  मचाने के लिए निकाल लाते हैं।
तो देखा आपने, संख्या तो गुणवत्ता ही नहीं, "दुर्गुणवत्ता" के आगे भी लाचार है। तभी तो कहते हैं, सौ सुनार की, एक लुहार की।

Friday, November 9, 2012

चाय मीठी है ? पर कैसे?

अभी ज्यादा समय नहीं गुज़रा, जब किसी बड़े शहर में कोई बड़ा "कवि सम्मलेन" होता था, तो उसकी सफलता और भव्यता इस तरह आंकी जाती थी-
1.कवि  सम्मलेन कितनी देर तक चला, और कवियों को कितने 'राउंड' सुना गया।
2.कवियों को कितना पारिश्रमिक दिया गया।
3.सम्मलेन में श्रोताओं की भीड़ कितनी थी।
4.आने वाले कवि कितने नामवर हैं।
5.प्रस्तुत रचनाएं समाज पर कैसा प्रभाव डाल सकीं।
आज भी आकलन के यह सब मानदंड मौजूद हैं। केवल इनके आयोजन पक्ष के भाव थोड़ा बदल गए हैं।जैसे- आयोजक सम्मलेन स्थल को कितनी देर के लिए घेर पाए, श्रोताओं को कितनी देर रोक पाए, कवियों से कितना ले पाए, या वे और कवि  मिलकर कितने प्रायोजक ढूंढ पाए, कवियों के पास कितने नामवरों के हस्ताक्षरित किये प्रमाण-पत्र हैं। रचनाओं का कितना भाग सुबह के अखबारों में जगह बना पाया।
कुल मिला कर चाय की मिठास में कोई कमी नहीं है।अब अगर बाज़ार में चीनी ही "शुगर-फ्री" आ रही हो तो कोई क्या करे?

Thursday, November 8, 2012

हर बीज बिरवा, और हर बिरवा बनता है पेड़

एक राजा था।
एक दिन उसके दरबार में कहीं से एक युवक आया, और बोला-"राजा, आपके पास महल में जो भी रक्षक-पहरेदार हैं, वे सभी सीधे-सादे लोग हैं, आज्ञाकारी भी हैं, लेकिन क्षमा करें, ऐसे लोग किस काम के? जब कभी भी राज्य पर कोई धूर्त, लुटेरे-डाकू आक्रमण करेंगे, तब ये सीधे-सादे, शरीफ लोग भला उनका क्या कर  पायेंगे? और सीधे शरीफ लोग तो आक्रमण करेंगे नहीं!"
राजा को युवक की बात उचित लगी।फ़ौरन ये फरमान जारी हो गया कि  राज्य की सेना में नियुक्त करने के लिए डाकू-लुटेरे-आतताई-गुंडे किस्म के लोगों की ज़रुरत है।
कुछ लोगों को यह राजा  की कोई चाल जैसी लगी, फिर भी डरते, शंकित होते हुए  भी राज्य के तमाम गुंडे-आवारा-डाकू-लुटेरे-गिरहकट-कातिल आवेदन करने लगे।
एक दरबारी से रहा न गया। वह राजा से बोला- "महाराज, आप ऐसे लोगों से घिर जायेंगे तो उनसे फिर आपकी रक्षा कौन करेगा?"
राजा ने कहा- "जब यह सब लोग हमारा ही दल हो जायेंगे, तो हमें किसी का क्या डर?और हम उस युवक को ही सेनापति बनाए देते हैं, जिसने हमें इनकी भरती का सुझाव दिया था।"
राजा ने उस युवक को बुलवाने के लिए आदमी भेजे, किन्तु वह स्वयं ही आ पहुंचा और सारी बात सुन कर बोला- "महाराज, मैं आपको आपकी रक्षा का वचन देता हूँ, आपको विश्वास न हो, तो सनद के लिए हम दोनों अपनी पगड़ी बदल लेते हैं।"
राजा ने मायूस होकर कहा-"यह बात हम दोनों तक ही रहे, जनता तक न पहुंचे।"























ध्येय के लिए निकलने से ज्यादा चुनौती भरा है, ध्येय हासिल करके लौटना

नहीं, यह सही नहीं है।
ज्यादा चुनौती तो जीवन के लिए कोई ध्येय चुन लेने में ही है। जब हम अपने लिए कोई पथरीला रास्ता चुनते हैं, तब हमारे मस्तिष्क में अपना श्रेष्ठतम देने की लालसा का ताप जगता है। जब हम लक्ष्य को पा लेते हैं, तब तो संतोष की अंगड़ाई  लेने का वक़्त होता है। यह समय महान नहीं होता।
हाँ, यह समय उन लोगों के लिए महान होता है, जिन्हें हमने अपना लक्ष्य अर्जित करने के संवेग में भुला दिया था। वे खुश होते हैं।
राम जब घर लौटते हैं, तब वे न तो दिया जलाते हैं, न मीठा ही खाते हैं, और न उनका मन पटाखे फोड़ने का होता है। दीवाली तो हम मनाते हैं, जिनके राम लौट आये।हमारे लिए यही समय उत्तम है।
दीपावली के उत्सवी सप्ताह के आगाज़ पर शुभकामनाएं!

अमेरिका में नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त ओबामा की दूसरी पारी

कल जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में वोटों की गिनती का सिलसिला चल रहा था, तब दोनों उम्मीदवारों की तरह ही एक और प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा भी  दाव पर लगी थी। एक ऐसा प्रतिष्ठान, जिसकी साख बरसों से सारे विश्व में बनी हुई है। जिस नाम की घोषणा यह प्रतिष्ठान करता है, वह चाहे संसार के किसी भी कौने का हो, उसमें देखते-देखते सुर्खाब के पर लग जाते हैं। वह नाम फिर इतिहास में अमर हो जाता है। उसे अपने फील्ड में "अल्टीमेट" माना जाता है।
ओबामा जब अपने पिछले कार्यकाल के आरम्भ में ही थे, तब उन्हें "नोबल"शांति पुरस्कार के लिए चुन लिया गया था। उस समय भी कुछ लोगों की प्रतिक्रिया यही थी कि  उन्हें यह सम्मान ज़रा जल्दी मिल गया है।  इस बार किसी भी कारण से यदि राष्ट्रपति चुनाव परिणाम में फेर-बदल हो जाता तो तीन साल पहले के उन समीक्षकों के स्वर में नई  ताजगी आ जाती। और साख में ज़रा सा बट्टा उन घोषणाकारों की सिद्ध-श्रेष्ठता पर भी लगता जो तमाम कयासों के उड़ते बादलों के बीच भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह सौगात लेकर आये थे।
लेकिन यह सब अब केवल विगत-कलाप है। वर्तमान कहीं ज्यादा सुखद, ज्यादा फलदायी है।

Wednesday, November 7, 2012

ओबामा महोदय की सफलता उस इच्छा का सम्मान है जो सितारों से आगे के जहाँ को छूने की तमन्ना में छिपी है

जिन कोशिशों को लेकर वे जन-मानस में लोकप्रिय हैं, उन पर विराम अभी कोई नहीं चाहता। शायद यही महत्वाकांक्षा बराक ओबामा की सफलता में बदली है। इस शानदार जीत पर बधाई और असंख्य शुभकामनाएं!

Tuesday, November 6, 2012

बौरा गए थे देख कर,जिनकी ख़ुशी को हम, उनके ग़मों को देख कर,पगला गए हैं अब

किसी ने कहा है कि  आदमी को न तो ख़ुशी में आपा खोना चाहिए, और न ही दुःख में धैर्य खोना चाहिए। पर उनका क्या हो, जो सुख-दुःख दोनों में उतावले हो जाते हैं? यद्यपि इस मुद्दे पर भी सब एकमत नहीं हो सकते। कुछ लोगों की धारणा  यह होती है कि  हमें संवेदनशील होना ही चाहिए, हम प्रसन्न भी हों, विचलित भी, उल्लसित भी, तो उदासीन भी। वहीँ कुछ लोगों का मानना यह होता है कि  भावनाओं पर नियंत्रण करना ही मनुष्य की सफलता है।
इस विवाद में गहराई से उतरने का परिणाम यह होता है कि  हम आदमी को दो भागों में बाँट देते हैं। हमें वह देव और दानव के रूप में दिखने लगता है। इन्हीं दोनों का औसत निकालकर हम "मानव" को तलाश कर लेते हैं। किसी- किसी को यह अचम्भा भी होता है, कि इस में दानवता कहाँ से आ गयी? पर इसमें दानवता है!
चौंकिए मत, दानवता उसी स्वभाव में है, जिसे हम 'संत-स्वभाव' कहते हैं । सुख और दुःख दोनों से निरपेक्ष रहना वस्तुतः दानवता ही है। मनुष्य जटिल अनुभवों से गुजर कर ही ऐसा बनता है।
किसी ऐसे घर में जाइए, जहाँ ख़ुशी का कोई कारण हो।पर आप खुश मत होइए। देखिये, सभी देखने वालों को आपके स्वभाव में कुटिलता, ईर्ष्या या नकारात्मकता दिखेगी। यह सभी दानवीय गुण हैं।
ऐसा ही दुःख के बारे में पाएंगे।   

झूठ बोलने का सबसे सम्मानजनक तरीका

एक बार एक व्यक्ति विचित्र दुविधा में घिर गया। एक रात उसके सपने में एक-एक करके उसके सभी पूर्वज आये,और उससे कहने लगे कि  उसने अपने जीवन में जो कुछ भी  किया वह अपने जीते-जी  सारी  दुनिया को बताये, ताकि यदि उसके किसी कार्य से दुनिया में किसी को भी कोई कष्ट हुआ हो, तो वह उससे क्षमा तो मांग ही सके, बल्कि आवश्यक होने पर अपनी भूल का प्रायश्चित भी अपने जीवन में ही कर सके।
व्यक्ति सुबह उठते ही रात को आये सपनों को याद करके बेहद शर्मिंदा हुआ। उसे तत्काल कई ऐसे कार्य-व्यवहार याद आ गए, जिन्हें उचित कदापि नहीं कहा जा सकता था। उनसे अवश्य कई लोगों को अपार कष्ट हुआ होगा, यह वह मन ही मन जान गया। किन्तु अब किया ही क्या जा सकता था।
उधर पुरखों के संकेत का अनदेखा करना भी एक घोर पाप जैसा ही था। अतः उसने स्वप्न में मिले निर्देश का अनुपालन करने का ही निश्चय किया।
अब सवाल यह था कि  अपनी करनी लोगों को बताई कैसे जाए? जिनके साथ उसने अवांछित व्यवहार किया था, वे तो इस बाबत जानते ही थे, पर ऐसा तरीका क्या हो, जिससे बाकी के लोग भी ऐसे व्यवहार को जानें। बहुत सोच-विचार के बाद आखिर उसे एक तरीका सूझ ही गया। उसने अपनी आत्म-कथा लिखने का मानस बनाया। उसने अपनी जीवन-गाथा लिखनी शुरू की, और कुछ ही दिन में पूरी लिख डाली।
उसे यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि सब कुछ कागज़ पर उतार देने के बाद भी किसी ने कोई विरोध या अप्रसन्नता दर्ज नहीं कराई। किन्तु उसने तो अपना काम कर ही दिया था। वह अब प्रसन्न और संतुष्ट था।
वह रोज़ रात को सोने से पहले अपने पूर्वजों को याद करता कि  वे उसके सपने में आयें, और वह उन्हें बता सके कि  उसने उनका कहा कर दिया है। किन्तु उसका कोई पूर्वज फिर कभी उसके सपनों में नहीं आया। क्योंकि उन सभी ने स्वर्ग में स्थित लायब्रेरी में बैठ कर "आत्म-कथा" की परिभाषा पढ़ ली थी। 

Monday, November 5, 2012

ओबामा का मतलब- फूल से बड़ी उसकी गंध

किसी भी इंसान के जीवन में पिता होने का अर्थ क्या है, यह शायद सब समझते हैं। हाँ, अभी हम चिड़ियों की बात नहीं कर रहे, क्योंकि किसी भी चिड़े के युवा होने तक उसका पिता इतनी दूर चला जाता हैं, कि माँ - चिड़िया उसकी सूरत भी बच्चे को दिखा नहीं पाती। खैर, चिड़िया का बच्चा पिता की सूरत देखने को लालायित भी नहीं होता, क्योंकि इंसान की तरह किसी भी चिड़े  का पिता उसे अपने पंख ट्रांसफर नहीं कर सकता। हर चिड़े  - चिड़िया को अपने पंखों से ही उड़ना होता है।
पिताओं के पास फंड ट्रांसफर से लेकर परिवार के टाइटिल ट्रांसफर तक का अधिकार होने पर भी दुनिया का हर इंसानी बच्चा अपने पिता से संतुष्ट नहीं देखा गया। हाँ, महाशय ओबामा जैसे महान, सफल और लोकप्रिय पिता इस बात को बच्चों का दुर्भाग्य नहीं मानते, क्योंकि उनका मानना है कि  किसी फूल से उसकी खुशबू ज्यादा महान है। वह दूर तक पहुँचती है, और ख़त्म होते ही फूल की साख भी गिरा देती है। वे बच्चे , जिन्हें पिता या पिता का साया नहीं मिला, इस बात को सीने से लगा कर रखेंगे। शायद इस से उन्हें "पिता की धूप" सहने की शक्ति मिले।

मीठा मुंह

परीक्षा में पास हो गए? मुंह मीठा कराओ। अरे, इनाम मिला है, मुंह तो मीठा करवाना ही पड़ेगा। जन्मदिन है, मिठाई खाकर ही बधाई देंगे। क्या, खेल में जीत गए? मुंह मीठा ...इसका कोई अंत नहीं है।
यह तकिया कलाम अब ख़ुशी का पर्याय ही बन चला है। कहीं भी किसी की भी ख़ुशी देखेंगे तो सब इसमें आपका साथ देंगे। केवल एक को छोड़ कर।
लेकिन वो एक भी कोई ऐसा-वैसा नहीं है, जिसे आप अनसुना करदें। वो है आपका डॉक्टर!
आज आपको मिठाई खाते देख कर कोई भी यह नहीं कहेगा, कि  आपको अपनी सेहत का ख्याल है। इसके कई कारण हैं-
1.आज की जिंदगी तनाव भरी है, तनाव और 'मीठा' एक साथ  मिलते ही आपके लिए मुसीबत बन जायेंगे।
2.आप जहाँ 40 के हुए 'डायबिटीज़' की लहरें आपके बदन-तट से टकराने लगेंगी।
3.आज पग-पग पर कभी ख़ुशी कभी गम इतनी मात्रा  में आते हैं कि  हर काम को मीठे मुंह से करने-कराने वालों के दांत खट्टे होने में भी देर नहीं लगती।
4.हर खाद्य पदार्थ में मिलावट का आलम यह है कि मीठे के रूप में हम क्या-क्या खा रहे हैं, यह हम सोच भी नहीं सकते।
5.आप जानते हैं कि  मोती सीप में बनते हैं, तो आप दांतों की जगह पर मोती चाहेंगे या सीप?
6.मंहगाई हमें फीका-सादा ही खाने दे यही बहुत है, मीठा,यदि वह शुद्ध और असली है, तो केवल रईसों का काम है।

हम मेज़ लगाना सीख गए!

 ये एक ज़रूरी बात थी। चाहे सरल शब्दों में हम इसे विज्ञापन कहें या प्रचार, लेकिन ये निहायत ज़रूरी था कि हम परोसना सीखें। एक कहावत है कि भोजन ...

Lokpriy ...