Wednesday, November 14, 2012

क्या हमारी होटल इंडस्ट्री इतना नहीं कर सकती?

देश में होटल उद्योग का  नेटवर्क है। हर छोटे-बड़े शहर में ढेरों छोटे-बड़े होटल हैं। कई बड़े शहरों में तो पांच सितारा होटल भी कुकुरमुत्तों की तरह बेहिसाब खुलते ही जा रहे हैं। जबकि कहीं की , कैसी भी सरकार यह कभी नहीं कहती कि  वह होटल उद्योग को बढ़ावा देगी। न किफायती दरों पर भूमि का आवंटन, न ही होटलों पर अनुदान, न कोई प्रोत्साहन योजना, फिर भी होटल धड़ाधड़  खुलते ही जा रहे हैं।बरसों पुराने,बिसराये गए पर्यटन स्थलों के आसपास भी होटल ऐसे खुलते जा रहे हैं मानो इन्हें देखने के लिए दूर-दराज़ के लोग इन होटलों में डेरा  डाल कर धूनी  रमाएंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि  होटलों के पास पैसे की कोई कमी भी नहीं है।
जिन मंदिरों की मान्यता है, उनके आसपास खुलने वाले होटल-धर्मशालाओं की तो कोई गिनती ही नहीं है। कई नामी-गिरामी मंदिरों का तो हाल यह है, कि उनमें बसने वाले भगवान तो एक छोटी सी चौकी पर बिराजमान हैं,पर उनमें आने वाले दर्शनार्थियों के लिए सैंकड़ों होटल-सराय-धर्मशालाएं दूर-दूर तक  फैले पड़े हैं।
कई मंदिर ऐसे हैं कि उनमें चढ़ने वाला चढ़ावा उनकी संपत्ति को अरबों तक पहुंचा चुका है। उनकी आय देख कर कई राज्यों के वित्त-मंत्रियों में हीन-भावना आ जाती है,कि  इतना तो हमारे राज्य का सालाना बजट भी नहीं है। इनके आसपास भी बेशुमार होटल हैं।
इतने होटलों में मिला कर कर्मचारियों की कमी भी नहीं है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि  इन होटलों को देश भर में शिक्षा का कार्य दे दिया जाए। ताकि कम से कम बच्चे अपने बचपन में थोड़ा-बहुत  कुछ पढ़-लिख भी तो सकें।
हमारे विद्यालय तो इन्हें दोपहर का भोजन खिलाने में जी-जान से लगे हुए हैं। उनके पास न तो बच्चों को पढ़ाने का समय है, और न काबिलियत।         

1 comment:

  1. आपकी नज़र और आपके सुझाव...दोनों ही उम्दे,बस अमल हो जाए इन बातों पर फिर क्या कहने...|

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...