Thursday, November 1, 2012

कोहिनूर और पारस

एक दिन कोहिनूर और पारस में बहस हो गई। कोहिनूर की बातों से साफ़ झलक रहा था कि  उसे पारस से ईर्ष्या हो रही है। बात भी कुछ ऐसी ही थी। अगर एक पत्थर की महत्ता एक हीरे से ज्यादा होगी तो हीरे को बुरा लगेगा ही।
कोहिनूर ने चिढ़ते हुए कहा- "हीरा हीरा ही होता है, उसका मुकाबला एक पत्थर भला क्या करेगा।"
पारस ने कहा- "सवाल यह नहीं है कि  हम खुद क्या हैं, सवाल यह है कि  हम किसी दूसरे को क्या बना सकते हैं। मुझे देखो, मुझे लोग पारस पत्थर ही कहते हैं, मगर वे मेरा सम्मान इसीलिए करते हैं कि  मैं किसी को भी छू कर सोना बना सकता हूँ।"
डॉ . राधाकृष्णन यही कहा करते थे- "मैं अपने उन दिनों को याद करता हूँ जब मैं शिक्षक था। वे दिन पारस पत्थर जैसे दिन थे, मैं तब अपने विद्यार्थियों को पढ़ा कर न जाने क्या से क्या बना देता था। अब तो इस विशाल भवन [राष्ट्रपति भवन] में कोहिनूर की तरह दिन काट रहा हूँ।"
डॉ .राधाकृष्णन का जन्मदिन एक राष्ट्राध्यक्ष के जन्मदिन के रूप में नहीं, शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।    

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