Friday, November 9, 2012

चाय मीठी है ? पर कैसे?

अभी ज्यादा समय नहीं गुज़रा, जब किसी बड़े शहर में कोई बड़ा "कवि सम्मलेन" होता था, तो उसकी सफलता और भव्यता इस तरह आंकी जाती थी-
1.कवि  सम्मलेन कितनी देर तक चला, और कवियों को कितने 'राउंड' सुना गया।
2.कवियों को कितना पारिश्रमिक दिया गया।
3.सम्मलेन में श्रोताओं की भीड़ कितनी थी।
4.आने वाले कवि कितने नामवर हैं।
5.प्रस्तुत रचनाएं समाज पर कैसा प्रभाव डाल सकीं।
आज भी आकलन के यह सब मानदंड मौजूद हैं। केवल इनके आयोजन पक्ष के भाव थोड़ा बदल गए हैं।जैसे- आयोजक सम्मलेन स्थल को कितनी देर के लिए घेर पाए, श्रोताओं को कितनी देर रोक पाए, कवियों से कितना ले पाए, या वे और कवि  मिलकर कितने प्रायोजक ढूंढ पाए, कवियों के पास कितने नामवरों के हस्ताक्षरित किये प्रमाण-पत्र हैं। रचनाओं का कितना भाग सुबह के अखबारों में जगह बना पाया।
कुल मिला कर चाय की मिठास में कोई कमी नहीं है।अब अगर बाज़ार में चीनी ही "शुगर-फ्री" आ रही हो तो कोई क्या करे?

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