Wednesday, November 21, 2012

"कसाब" और रुदालियाँ

कसाब को फांसी हो गई। वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। वो जब तक रहा, करोड़ों लोगों को यह बात अखरती रही कि  उस जैसे सर्व-सिद्ध अपराधी को अब कौन सी बात जीवित रखे हुए है। लेकिन न जाने क्या बात है, कि  दुनिया में कुछ भी अंतिम नहीं है, पटाक्षेप अब भी नहीं हुआ है।अब भी फिजा में तरह-तरह के मिसरे तैर रहे हैं। मसलन-
उसे मरने तक इतना खर्चीला रख-रखाव क्यों दिया गया?
क़ानून इतना सुस्त-रफ़्तार क्यों चला?
उसके हमदर्द तब कहाँ थे जब 166 लोग निर्दोष होते हुए भी अपने जीवन से दूर कर दिए गए।
कौन था जो उसकी साँसों की डोर खींचता रहा?
जिसकी मौत की खबर खुद उसका देश 'रिसीव' तक नहीं कर रहा, उसे यहाँ 'बिरयानी' किसकी रसोई में पका कर खिलाई जा रही थी।
"उस जहाँ" में तो दो ही कमरे हैं-स्वर्ग और नरक, तो अब उसे कहाँ रखा जाएगा?
क्या "इस घटना"को कोई और नाम नहीं दिया जा सकता? कहीं भविष्य में कोई यह न कहे कि इस देश में  भगत सिंह और कसाब को ... 

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यदि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे हों और उनमें से एक अपने को कमज़ोर पा कर रो पड़े तो हम उनमें फिर से बराबरी की भावना जगाने के लिए एक का तात्कालिक ...

Lokpriy ...