Friday, November 30, 2012

"शून्य में कुछ उग रहा"

मुझे कई साल पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया बिल्डिंग में बैठे हुए मेरे एक आत्मीय मित्र ने कहा था, कि  लेखकों को सब-कुछ लिखते रह कर सार्वभौमिक लिक्खाड़ बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्हें बारीकी से अपने लेखन की सर्वश्रेष्ठ विधा को पहचान कर एक ही विधा में निरंतर काम करना चाहिए।
वह जनाब तो कह कर अपने काम में लग गए, पर मेरे गले उन्होंने यह बेचैनी मढ़  दी, कि  मैं किसी कहानी के बाद कोई कविता लिखता, तो अँगुलियों में खलिश सी होने लगती। उपन्यास लिख चुकने के बाद तो बीमार सा ही हो जाता, "फिर उपन्यास ही लिखूं?"
कई दिन बाद एक दिन बैठे-बैठे मुझे अकस्मात इस उलझन का समाधान मिल गया। जैसे अचानक बोधि वृक्ष के नीचे बैठे बुद्ध को दिव्य ज्ञान हुआ था, उसी तरह मुझे भी सहसा यह बोध हुआ, कि  उस मित्र की बात मैं भला क्यों मानूं? वो होता कौन है अपनी राय मुझ पर थोपने वाला?
आज यह बात मुझे इसलिए याद आ गई, क्योंकि वह एक दिन अचानक मुझे मिल गया। बरसों बाद मिले थे, अतः खूब बातें हुईं। मैंने चाय पीते-पीते उस से पूछा, अब तुम रिटायर होकर घर बैठ गए, ज़रा याद करके यह तो बताओ कि तुमने जीवन में किस-किस से क्या-क्या कहा?किस-किस ने तुम्हारी मानी, और किस-किस ने तुम्हारी बात हवा में उड़ा दी?
वह शरमा गया। इस तरह लजाया, जैसे उसे अपनी पत्नी की याद आ गई हो, जिसने तमाम उम्र कभी उसकी कोई बात नहीं मानी। जिस बात के लिए वह मना करता था, उसे तो वह हर हाल में करके ही रहती थी।
मेरी भी अब इच्छा हो रही है कि  जब वह अगली बार मेरे पास आये, तो उसे मेरी कविता की नई किताब पढ़ने को मिले। इस बार वह मेरा कहानी संग्रह "थोड़ी देर और ठहर" पढ़ने के लिए ले गया है।     

4 comments:

  1. सच कहा. आदमी को वही करना चाहिए, जो उसका मन कहे

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