Wednesday, November 28, 2012

तारे और अंगारे

    जब दुनिया अच्छी तरह बन गई तो सब काम सलीके से शुरू हो गए। घर-घर रोटी बनने लगी। जहाँ घर नहीं था, वहां भी रोटी बनती। पेड़ के नीचे, सड़क के किनारे, दो ईंट-पत्थर जोड़ कर उनके बीच अंगारे दहकाए जाते, और रोटी बनती। चूल्हे मिट्टी  के हुए, लोहे के, या पत्थर के, रोटी बनती। धुआं हो, लपटें हों, या आंच हो, रोटी बनती। लकड़ी, कोयला, गैस, तेल कुछ भी जलता, और उस पर रोटी बनती।
औरतें रोटी  बनातीं। बल्कि कभी-कभी तो औरतें केवल रोटी ही बनातीं। भूखे बच्चे सामने थाली लेकर बैठ जाते, और रोटी बनती। झोंपड़ी हो,कोठी हो, बंगला हो या महल हो, रोटी बनती। झोंपड़ी हो तो भूखे बच्चों के लिए रोटी बनती, बड़ा बंगला हो, तो नौकर-चाकर-कुत्तों और भिखारियों के लिए रोटी बनती।औरतें लाल आँखें करके चूल्हा फूंकते हुए रोटी बनातीं।चमचमाती रसोई हो तो होठ लाल रंग के रोटी बनातीं।
बेटी रोटी बनाती। बहन रोटी बनाती। भाभी रोटी बनाती। माँ रोटी बनाती। नानी और दादी रोटी बनातीं।
औरत अपने घर रोटी बनाती, फिर पराये घर जाकर रोटी बनाती।
लड़की रोटी बनाती, फिर जब उसे बिलकुल गोल रोटी बनाना आ जाता, तो वह महिला बन जाती। पहले पिता के लिए, फिर भाई के लिए, तब पति के लिए, और फिर ससुर के लिए रोटी बनाती।
माँ रोटी बनाने में मदद करती, सास रोटी न फूलने पर जली-कटी सुनाती, पर रोटी बनती। अगर गरीब का घर हुआ, तो पहले दोनों साथ-साथ मजदूरी करते, फिर घर आकर मर्द बीड़ी पीता और औरत रोटी बनाती। अगर अमीर का घर हुआ, तो मर्द टीवी पर मैच देखता और औरत रोटी बनाती।
आग,औरत और रोटी का सम्बन्ध कभी न टूटता, घर-घर रोटी बनती, रोज़-रोज़ रोटी बनती।
फिर इन्कलाब आया। आदमी भी रोटी बनाने लगा। आसमान फट पड़ा। तारे ज़मीन पर चले आये। रसोइयाँ एक स्टार, दो स्टार और पांच तारा होने लगीं।
और इस तरह अंगारों और सितारों का बंटवारा हो गया।    

2 comments:

  1. असमान और जमीं की दूरी अनंत है..पर आपके इस लेखन ने उन्हें बहुत करीब ला दिया... बहुत खूब !!!

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  2. Dhanyawad. Aasman aur zameen ka to pataa nahin, par tumko bahut din baad kareeb laa diya.

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