Thursday, October 30, 2014

"तारीफ" का प्रतिशत

एक कवि ने तन्मय होकर पूरे मनोयोग से एक कविता लिखी। कवि की अंतरात्मा से निरंतर ये आवाज़ आ रही थी कि कविता बेहद ही शानदार है, और ये अवश्य ही कवि को आधुनिक साहित्य में अहम मुकाम दिला कर कालजयी बनाएगी। लिहाजा कवि ने उसे एक नामी आलोचक के पास टिप्पणी के लिए भेज दिया, जो संयोग से एक प्रखर संपादक भी थे।
कुछ दिन बाद संपादक की टिप्पणी कवि को मिली-"बेहद मार्मिक, सार्थक,सटीक हृदयस्पर्शी रचना, मैं चाहता हूँ कि इसे जन-जन पढ़े,इस पर शोध हों, टीका-व्याख्या-मीमांसा हो,ताकि दुनिया को पता तो चले कि आखिर ये है क्या?"
कवि महोदय "उल्लास से स्तब्ध"हो गए, उनपर "हर्षातिरेक से हताशा" का दौरा पड़ गया।
वे तत्काल अपने एक गणितज्ञ-मित्र के पास दौड़े। उन्हें पूरा यकीन था कि उनका मित्र उन्हें मिले संपादक के पत्र में "तारीफ का प्रतिशत" निकाल कर उन्हें बता सकेगा।
           

Wednesday, October 29, 2014

एक हज़ार एक सौ बार कह दिया

फेसबुक पर एक ज़बरदस्त बहस चल रही है।  लोग "चुप रहने वालों" और "बोलने वालों" की तुलना कर रहे हैं।मुझे लगता है कि कहीं ११०० पोस्ट पूरी कर लेने वाले हमारे जैसे लोग भी किसी "नीलोफर" की चपेट में न आ जाएँ।वैसे इत्मीनान की बात ये भी है कि इस घोर तकनीकी युग में खुल्लम-खुल्ला शब्द-प्रहारों के बीच "बंद लिफाफों" की गोपनीयता अब भी कायम है।  
बहरहाल, "कहना पड़ता है" कि हम सब का आपसी सद्भाव-प्रेम-विश्वास-परिहास इसी तरह कायम रहे और महा संचारी, महा वाचाली,परम उन्मादी, चरम प्रमादी इस युग में अपनी-अपनी चमक लेकर हमारे विचारों के रंगीले जुगनू सदा इसी तरह उड़ते-मंडराते-छितराते रहें।
१०००  पोस्ट पूरी कर लेने के बाद मैंने यह सिलसिला रोक देना चाहा था। किन्तु कुछ मित्रों के उत्साह वर्धन के बाद मैंने बाँध के गेट फिर खोल दिए।मुझे वे सब याद आ रहे हैं।  उन सब के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। उनका नाम लेने लगूँगा तो शायद बात बहुत लम्बी हो जाएगी,क्योंकि वे बहुत दूर तक फैले हैं- पिट्सबर्ग, अमेरिका के अनुराग जी से लेकर नजदीकी मोहल्ले की नीलिमा टिक्कू जी तक।  
"रंगभेद"की खिलाफत को लेकर हम सब उन हस्तियों के साथ हमेशा रहे हैं जिन्होंने रंगभेद रुपी पक्षपात का हमेशा विरोध किया।  वे चाहें मार्टिन लूथर किंग हों,नेल्सन मंडेला हों,या बराक ओबामा साहब।  
लेकिन विडंबना है कि आज हमारा देश फिर रंगभेद के चक्रव्यूह में फंसा है। 
काश! हम गर्व से दुनिया से कह पाते कि हमारे जिस मुल्क को दुनिया में हमेशा गरीब,पिछड़ा,निर्धन समझा जाता रहा है, उसके ढेरों वाशिंदों के अरबों रूपये आज विश्व भर के तमाम मुल्कों में जमा हैं। लेकिन क्या करें- "सफ़ेद काले" का चक्कर यहाँ भी बीच में आ गया। अगली बार जब हम सब दीवाली मनाएं तो लक्ष्मी पूजन   के समय कृपया यह भी देख लें कि लक्ष्मी मैया कौन से रंग का परिधान पहन कर हमारी देहरी पर आ रही हैं?श्वेत या श्याम !    
बेचारे हम !                  

Tuesday, October 28, 2014

याद कीजिये हिंदी फिल्मों के डाकुओं को

डाकू !
जिनके नाम से ही रूह काँप जाती है।
सपने में भी किसी को दिख जाएँ तो नींद से उठ कर बैठ जाए।
उनकी तस्वीर को देख कर ही लोग अपनी तिजोरी सँभालने लग जाते हैं।
गाँव में उनके घोड़ों की टाप सुनते ही खिड़कियाँ बंद होने लगती हैं।
लेकिन थोड़ी देर बाद !
पनघट पर उन्हें पानी पिलाने के लिए युवतियों में होड़ मच जाती है।
नायिका चोरी-चोरी छिपके-छिपके उनसे मिलने लग जाती है।
गाँव के लोग उनके साथ नाचते-थिरकते दिखाई देते हैं।
उन्हें पुलिस से बचाने के लिए घर में छिपाया जाता है।
उनके सीने में लगी गोली निकालने को डॉक्टर बुलाया जाता है।
क्यों?
क्योंकि वे लूट की दौलत गरीबों में बाँट देते हैं।
गाँव की अबला-निर्धन युवतियों के कन्यादान करते हैं।
सड़कों के किनारे मंदिर-धर्मशालाएं बनवाते हैं।
और मोटे -मोटे चंदे देते हैं, अमर को भी,अकबर को भी, और एंथोनी को भी।     
     

Monday, October 27, 2014

हम-आप कौन होते हैं तूफानों के रास्ते तय करने वाले !

बवंडर किसी से रास्ते पूछ कर नहीं बढ़ते। आँधियाँ चलने से पहले अपना टूर प्रोग्राम ज़ाहिर नहीं करतीं।  ये मदमाते उच्श्रृंखल मंज़र हैं , इन्हें कुदरत ने छूट दी है मनमानी करने की।
ज़्यादा से ज़्यादा इतना किया जा सकता है कि इनके उन्मादी तेवर भाँप कर हम समय रहते अपने नुक्सान को कम से कम करने की जुगत कर लें।
कई भीषण झंझावात एक गली में हुंकार भरते हुए दूसरी गली से निकल जाते हैं। दरिया इनके हौसले पस्त कर देते हैं, हवाएँ इनका रुख पलट देती हैं।
ये कोई राजपुरुष नहीं हैं कि  इनके रथ का काफिला सुरक्षा-बेड़े की "पायलेट कार" के पीछे-पीछे ही चले।
जब धरती पर ही हम इनसे पार नहीं पा सकते, तो भला आसमानों पर किसका बस?
कई काली घटाएं ग़रज कर ही चली जाती हैं।उनकी मर्ज़ी,बरसें,न बरसें।
कई बार घनघोर गर्जन करते काले मेघ हलकी सी बूँदाबाँदी करके ही चले जाते हैं। हम-आप कर ही क्या सकते हैं। यदि ये बूँद भर छींटे भी किसी को भिगो न पाएं तो ? बाजार में छतरियाँ भी तो मिलती हैं। हम-आप कर ही क्या सकते हैं? फिर किसी 'हुद हुद' या 'नीलोफर'का इंतज़ार !              

Sunday, October 26, 2014

"दो" अब "वज़ीर"

दो मित्र थे। युवा,स्वस्थ,संपन्न।
दोनों ने एक साथ कहीं घूमने जाने का कार्यक्रम बनाया। सुबह दस बजे की गाड़ी थी, ठीक समय पर एक-एक  बैग में कपड़े और कुछ ज़रूरी सामान रख कर दोनों स्टेशन पहुँच गए।
एक कुली ने स्टेशन पर उनसे सामान उठाने की पेशकश की।सामान कुछ ज़्यादा तो था नहीं, फिर भी न जाने क्या सोच कर एक मित्र ने बैग कुली को सौंप दिया, जबकि दूसरे ने अपना बैग अपने कंधे पर टांग लिया।  
आमने-सामने की सीटों पर दोनों व्यवस्थित हुए ही थे कि गाड़ी चल पड़ी।  
अब उन दोनों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गयी कि दोनों में से किसका निर्णय ज़्यादा सही था।  
एक बोला-"इतना सा श्रम तो हमें करना ही चाहिए, आखिर बैग में वज़न ही कितना था?"
दूसरा बोला-"यदि एक मज़दूर की थोड़ी मदद करने के लिहाज़ से हमने पच्चीस-तीस रूपये का काम उसे दे दिया, तो इसमें गलत क्या है?"
-"तो क्या हम दूसरे को संपन्न बनाने के लिए अपने को आलसी बना लें?"
-"लेकिन यदि सब यही सोच कर अपने सब काम अपने आप करते रहे तो कितने ही लोगों की आजीविका छिन जाएगी।"
-"सबको काम देने का ज़िम्मा हमारा नहीं, सरकार का है।"
-"सरकार कैसे करेगी, हमारे माध्यम से ही न?"
-"हम सरकार के मोहरे हैं क्या?"
-"इसमें मोहरे की क्या बात है, अपने अच्छे काम का पुण्य या फ़ल हमें ही तो मिलेगा।"
बहस से दोनों तनाव में आ गए।आख़िर चुप होकर एक ने अन्य यात्री का,पास में पड़ा हुआ अखबार उठा लिया।  
अखबार में खबर थी कि अमिताभ बच्चन की फिल्म 'दो' का नाम बदलकर अब 'वज़ीर'कर दिया गया है।                

Saturday, October 25, 2014

अमेरिका में पहुँच कर याद आने वाली पहली बात

जब आप अमेरिका,कनाडा,फ़्रांस,जर्मनी,ऑस्ट्रेलिया,इंग्लैंड या जापान जैसे देशों में कदम रखते हैं तो पहली जिज्ञासा आपको शायद यही होती है कि इनका कचरा कहाँ है?
क्या भारत में हम ऐसा नहीं कर सकते? यदि इन संपन्न देशों की तुलना में हम अपने को गरीब भी मान लें, तब भी कुछ बातें तो ऐसी हैं ही जिनमें कुछ खर्च नहीं होता-
१. हम यहाँ-वहाँ सार्वजनिक स्थलों पर थूकें नहीं,खुले में शरीर की उत्सर्जन क्रियाओं को टालें, धूम्रपान, गुटखे आदि से होने वाली स्वास्थ्य-हानि व गंदगी को समझ कर इस से बचें।
२. पॉलिथीन ,कागज़ के रैपर आदि को इधर-उधर उड़ता न छोड़ें।
३. नाक-कान साफ करने के बाद अपने हाथ की सफाई का ध्यान तो रखें ही, उन उपकरणों का भी सही   निस्तारण करें जिनसे आपने सफाई की है।
४. सार्वजनिक स्थानों पर पड़े कचरे में यदि आपको कचरे से पुनर्उपयोगी वस्तुएं तलाश करते बच्चे दिखाई दें, तो उन्हें भी समझाने का प्रयास करें।
जो कचरा हमें बीमार करके दवा का खर्च बढ़वा देता है, उसे निपटाने के लिए कचरा-पेटी रखना समझदारी भरा निवेश है।
एक बड़ी समस्या सिर्फ लोगों की "आदत" है।
खुद जाँचिए-एक कमरे में बच्चों-किशोरों को अखबार पढ़ने के लिए दीजिये। फिर उन्हें किसी काम, मसलन दरवाज़ा खोलने,पानी लाने के लिए उठाइये। कमरे में पंखा चलता रहने दीजिये।
अब ध्यान से देखिये, इनमें कुछ ऐसे हैं जो जाने से पहले अखबार को किसी वस्तु से दबाएंगे, या तह करके सलीके से रख जायेंगे। अधिकांश ऐसे भी जो अख़बार को फरफरा कर उड़ता छोड़ चल देंगे।  अब आप आसानी से पहचान सकते हैं कि भविष्य में कौन "म्युनिसिपलिटी"के लिए 'प्रॉब्लम सिटिज़न' अर्थात सरदर्द -नागरिक बनने वाले हैं।                      

आन गाँव के सिद्ध

"घर की मुर्गी दाल बराबर" अथवा "घर का जोगी जोगणा" दोनों एक ही बात है। इसका अर्थ ये है कि किसी व्यक्ति की अपने घर या अपने लोगों के बीच उतनी महत्ता नहीं होती, जितनी दूसरों के बीच।
ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब कोई अपने घर अथवा देश में वर्षों तक अच्छा काम करता रहा पर उसे कोई महत्व नहीं मिला, और जब उसे किसी अन्य देश में पहचान कर सम्मानित किया गया, तो उसके अपने घर में भी लोगों ने उसका लोहा माना और उसके नाम का डंका बजने लगा।
ऐसा क्यों होता है? क्या अपने घरवाले या देशवाले निष्ठुर, पक्षपाती और नासमझ होते हैं?
नहीं, हमारी प्रतिभा को दूसरों द्वारा पहचाने जाने के कुछ कारण भी होते हैं, जिनकी वजह से हमें 'स्वीकार' मिलता है।
१. हम अपने लोगों के बीच काम करते हुए जब अपनी प्रतिभा को मांझ लेते हैं, तभी दूसरों के बीच जाते हैं, और वहां हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते हैं।
२. हमारे अपने लोग 'अपनापे' के कारण सहजता से हमारे काम का मूल्यांकन करके हमारी कमियाँ भी बता देते हैं, जिससे हम समझते हैं कि ये हमारी आलोचना कर रहे हैं, जबकि बाहरी व्यक्ति की बात हम खुद ध्यान से सुनते हैं।
३.बाहरी सम्मान पाते ही हमारा आभा-मंडल एकाएक दमकने लगता है, जिसके प्रभाव में हमारी सीमायें या कमियाँ स्वतः मुंह छिपा लेती हैं।
और बस, हमें लगने लगता है कि विश्व शांति के लिए महात्मा गांधी मलाला जैसा कुछ न कर सके,या प्रेमचंद में रबीन्द्र नाथ टैगोर वाली बात नहीं है।   
                   

Friday, October 24, 2014

अपने मित्रों को छाँटिए

हम प्रायः दो तरह से चीज़ों को पसंद करते हैं, शायद लोगों को भी।
एक में हम उन्हें देखते हैं, आगे बढ़ जाते हैं।  सहसा कोई कौंध सी उठती है, कि हम पलट कर फिर देखना चाहते हैं। संयोगवश या सायास हम उन्हें फिर देख पाते हैं।
जिस तरह पुराने ज़माने में गली-गली घूमता बर्तन कलई वाला कोई चमकीली धातु गर्म बर्तन पर रगड़ कर उसे चमका देता था, उसी तरह अपनी पसंद के प्राथमिकता-मानदण्ड से उसे छुआ कर देख कर हम फिर अपने जेहन में झलकी उस वस्तु को अपने पसंद-कोष में शामिल कर लेते हैं।बस, अब ये चीज़ या व्यक्ति हमें पसंद है।
दूसरे तरीके में हम उसे देखते ही ठिठक जाते हैं।  हममें से कुछ निकल कर उसमें या उसमें से कुछ निकल कर हम में जाने लगता है।  जैसे दो बर्तन किसी छिद्र से जुड़ जाने पर अपने भीतर का जल-स्तर समान कर रहे हों।
क्षणिक आवेग से हमारी आयात शर्तें उसकी निर्वाह शर्तों से समायोजित होने लगती हैं और ऐसा हो जाते ही वह हमारी पसंद की वस्तु या व्यक्ति हो जाते हैं।
एक तीसरा तरीका भी है, लेकिन वह फिलहाल अप्रासंगिक है क्योंकि उसमें हम ऑब्जेक्ट होते हैं, कोई दूसरा हमारे आखेट पर निकला हुआ होता है, जब और यदि, वह हमें जीत लेता है तो हम उसके हो जाते हैं, ये निर्णय हमारा नहीं है।ऐसा वस्तुओं के मामले में भी हो सकता है,जैसे सड़क पर चलते हुए यदि हमारी चप्पल टूट जाए, तो उसमें विवश होकर लगवाई गई कील हमारे न चाहते हुए भी अब हमारी चौबीसों घंटे की साथी है।                 

Wednesday, October 22, 2014

प्रकाश-विनिमय

प्रकाश विनिमय बड़ी कठिन प्रक्रिया है। प्रकाश यदि किसी को दिया जाए,तो यह जाता नहीं है। यह वहीँ रहते हुए अपना दायरा बढ़ा लेता है।ऐसे में प्रकाश विस्तार तो संभव है किन्तु प्रकाश विनिमय नहीं। आप किसी को बल्ब तो दे सकते हैं,जिसे वह अन्यत्र ले जाकर प्रकाशित कर ले, पर रोशनी ले जाने के लिए देना जटिल प्रक्रिया है। ठीक इसी तरह प्रकाश आयात करना भी पेचीदा है। हम कहीं से लैम्प ला सकते हैं,लेकिन उजास लाना संभव नहीं होता।
यदि हज़ारों साल में एक बार कभी ऐसा हो जाए कि अपने पैरों चल कर प्रकाश, रोशनी या उजाला आपके घर के द्वार चला आये तो अद्भुत बात होती है। वस्तुतः यही दीवाली होती है।इस दिन आसुरी शक्तियों का संहार करता भटक रहा आपका राम आपके पास वापस लौटता है। यह उजाला आने की प्रक्रिया होती है, जो सदियों में एक बार कभी होती है।
राम के लौट आने का अर्थ यह नहीं होता कि  दुनिया से आसुरी और मैली शक्तियाँ अब समाप्त हो गयीं, इनका बार-बार सिर उठाते रहना तय है। इसीलिये राम के आगमन पर बधाई से अधिक "शुभकामनाओं"का महत्व है। "उजाले संभाल कर रखिये, अँधेरे मरते नहीं, सोये होते हैं, आपको रोशनी की दरकार हमेशा रहती है"                  

Monday, October 20, 2014

महिमा-स्पर्धा

महाकवि केशव ने 'अंगद-रावण संवाद' लिख कर अंगद के मुंह से राम की महिमा का जो गुणगान किया, वह अप्रतिम है।  "सिंधु तर्यो उनकौ वनरा तुमपे धनु-रेख गई न तरी" में अंगद ने रावण को बताया कि राम का तो एक बन्दर भी  समुद्र लाँघ गया, और तुमसे लक्ष्मण रेखा तक नहीं लांघी गई।
लेकिन आज अगर महाकवि होते तो वे ये देख कर चकित हो जाते कि  अब राम की महिमा भी अक्षुण्ण नहीं रही, इस युग में उनसे भी अधिक महिमामय विभूतियाँ हैं। आप भी देखिये-

"चौदह बरस जो कटे वन में , तब जाके कहीं ये दिवाली मनी
इत काटि के लौटीं दिवस चौदह बस, भव्य कहीं ये दिवाली मनी
भाई लियौ अरु भावज छोड़ि ,ये फ्रेंड सभी संग लेय पधारीं
एक खड़ाऊँ तजी उन ने,इन नौ सौ खड़ाऊं टाँग सिधारीं
पार करी सरयू उन ने, जब केवट ने जल पाँव पखारे
कोर्ट के द्वार बन्यौ हेलीपेड कहीं तब जा इन पैर उतारे
स्वर्ण कौ देखि गए मृग दौड़ि के, सो भी तिहारे वो हाथ न आयौ
आय छियासठ कोटि करी जुरमाना भर्यो सौ कोटि चुकायो"

[भावार्थ-कवि कहता है कि श्री राम के चौदह वर्ष वनवास में काटने के कारण जैसी दिवाली मनती है, उस से भी भव्य दिवाली जयललिता जी के चौदह दिन कारावास में काटने पर मन रही है। राम तो भाई को साथ ले,भाभी को छोड़ गए, किन्तु जयललिता जी के मित्र-रिश्तेदार भी यात्रा में उनके साथ रहे। राम अपनी एक खड़ाऊँ घर पर छोड़ कर गए थे,सुश्री जयललिता जी साढ़े नौ सौ सैंडिलें घर पर टँगी छोड़ गयीं। राम के तो पैरों की मिट्टी भी धोकर उन्हें सरयू पार करने दी गयी, यहाँ न्यायालय के द्वार तक हेलीपेड बना।राम तो स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ कर भी उसे पकड़ न सके, किन्तु जयललिता जी ने छियासठ करोड़ ज्यादा कमा कर भी सौ करोड़ का दंड चुका दिया।]          
 
      

Sunday, October 19, 2014

दिवाली

शबरी के जूठे बेर खाके चाहे लौटे कोई
चाहे भरपेट ही खिलाके होए वापसी
चाहे वनवास मिले, चाहे कारावास हो
घर-वापसी पे तो दिवाली ही दिवाली है !
  

समाधान की समस्या

चूहों ने एक सभा की। कई अनुभवी चूहों ने भाषण दिए। एक अत्यंत बुजुर्ग चूहे ने कहा-"कानून का राज सबसे अच्छा होता है। कानून से सब डरते हैं, और अपराध नहीं करते।"
बात सभी को पसंद आई। आखिर सर्वसम्मति से कानून बनाया गया,कि अब से किसी चूहे को खाना कानूनन अपराध माना जायेगा, और इसके लिए उम्र कैद तक सजा हो सकेगी।
अब बेचारी बिल्ली को क्या मालूम, कानून क्या है, तो जैसे ही उसने झपट्टा मार कर एक चूहे को उदरस्थ किया, झट पुलिस आ गई। बिल्लीपर मुक़दमा चला और उसे जेल हो गई।
बिल्ली ने जेल में रोटी खाने से साफ़ इंकार कर दिया। प्राणी अधिकार आयोग के दबाव में आकर जेलर साहब को बिल्ली के लिए जेल में रोज सुबह-शाम चूहे परोसने की व्यवस्था करनी पड़ी।           

कालजयी होने के सात तरीके

कुछ लोगों की अभिलाषा 'कालजयी' होने की होती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, आखिर उम्र तो किसी की ज्यादा से ज्यादा सौ-सवा सौ साल होगी, पर कालजयी होने के बाद दुनिया में अनंत काल तक मंडराने की सम्भावना हो जाती है। यहाँ कुछ ऐसे उपाय सुझाये जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप सुगमता से कालजयी हो सकते हैं।
१. एक छोटे से [अमृता प्रीतम के शब्दों में कहें तो रसीदी टिकट के बराबर]कागज़ पर कोई शेर, दोहा,छंद लिख कर अपने नाम के साथ एक माचिस की डिबिया में रख कर गंगा में बहा दें।  [नोट-रचना तुलसी, कबीर,सूर,मीरा आदि के स्तर की हो, वह तो होगी ही, क्योंकि आप लिखेंगे]
२. केले के पत्ते पर एक "उसने कहा था" जैसी प्रगतिशील कहानी लिख कर उसके नीचे अपने हस्ताक्षर करें, और उसे किसी पूजास्थल के बुर्ज पर टांग दें।
३. अपनी अन्य इच्छाएं पूर्ण होने से पहले ही अपनी अंतिम इच्छा का जिक्र मीडिया में कर दें।
४. धर्मग्रंथों का ध्यान से अध्ययन करके ये जानने की चेष्टा करें कि कौन से नक्षत्र में किस विधि-विधान से कौन सी इलेक्ट्रॉनिक वस्तु खरीदना श्रेयस्कर रहेगा।
५. अपनी कोई स्वरचित कविता मोहल्ले के बच्चों को कंठस्थ करादें।
६. अपनी वसीयत में अपने अंतिम संस्कार के विकल्प के रूप में देहदान सुझाएं।
७. आँखें बंद कर के सोचें कि सागर-मंथन हो रहा है और अमृत हर हाल में आपको ही मिलेगा।             

Saturday, October 18, 2014

सपने में

दो मित्र थे। बचपन से ही एकसाथ खेले-पढ़े थे। हर बात में एक समान। जो बात एक को पसंद आती, वही दूसरे को भी।
न जाने कैसे, केवल एक बात में दोनों बिलकुल अलग थे। एक अपने मन की बात किसी को बताता न था,दूसरा जो भी सोचता, या करना चाहता, झटपट सभी को बता डालता था।
अब यह अंतर कहीं तो सिर चढ़ कर बोलना ही था। नतीजा ये हुआ कि पच्चीस साल बाद दोनों में से एक बेहद अमीर हो गया, जबकि दूसरा एक सामान्य मध्यम वर्गीय नागरिक रहा।
दोस्ती तो कायम थी, लिहाजा मिलते-जुलते भी थे। एक दिन फुर्सत से बैठे-बैठे दोनों के बीच इस बात पर मंथन होने लगा कि जीवन में आखिर हम दोनों के बीच स्टेटस का इतना बड़ा अंतर क्यों आया?
एक ने कहा- "मैं अपनी हर योजना सबको बता देता था, इससे मुझे सबके सुझाव और फीडबैक मिल जाते थे और मेरे काम में मुझे शानदार मुनाफा मिलता था, जिससे मैं अत्यधिक धनी हो गया।"
दूसरा बोला-"मैंने कभी किसी को कुछ नहीं बताया, तुझे भी नहीं, कि मेरा तुझसे भी चार गुना ज्यादा धन रखा कहाँ है? यहाँ तो मैं भी सादगी से रहता हूँ, ताकि धन ऐसे ही आता रहे, जबकि तुझे दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।"
-"लेकिन तेरा धन है कहाँ?" पहले ने आश्चर्य से पूछा।
दूसरा बोला-"देख, मैं तो तुझे बता देता,पर अभी तो मुझे बहुत नींद आ रही है, फिर बात करेंगे।"   
   
      

Wednesday, October 8, 2014

किसी की लकीर छोटी करके नहीं, अपनी लकीर बड़ी करके बात बनेगी

शीघ्र आने वाली दीवाली के सन्दर्भ में एक अपील फेसबुक पर पढ़ी। इसमें कहा गया है कि यदि दीपोत्सव पर चाइनीज़ लाइटें,बल्ब,लैंम्प, पटाखों आदि का प्रयोग किया जायेगा तो चाइना तीन सौ करोड़ रूपये से अमीर हो जायेगा, किन्तु यदि इनकी जगह मिट्टी के दिए जलेंगे तो कुम्हार रोजगार पाएंगे और देश का पैसा देश में रहेगा।  राष्ट्रप्रेम और मानवता की इस भावना को नमन, लेकिन  …?
-हम दुनिया के हर भाग के लोगों को विशाल बाजार देने का आश्वासन देकर आमंत्रित कर रहे हैं,क्या उन लोगों को हम उनके निवेश करने के बाद सहयोग नहीं देंगे?
-क्या हम मिट्टी के दिए बनाते हमारे कुम्हारों को शिक्षा, विकास,आधुनिक व्यापार से नहीं जोड़ कर जन्म-जन्मान्तर तक गाँव की मिट्टी से ही पसीना बहाते हुए रोटी निकालते देखना चाहते हैं?
-यदि विकास और राष्ट्रीयता की यह भावना हमें प्रिय है तो हम अपने बनाये "दीपकों" की मार्केटिंग दुनिया भर में नहीं कर सकते?अपने कुम्हार को निर्यात के लिए नीतियां और सहयोग नहीं दे सकते?    

Monday, October 6, 2014

ख़बरदार, जो सफ़ाई में किसी ने इसका साथ दिया

एक जंगल में झील के किनारे छोटी सी सुन्दर चट्टान सबका मन मोहती थी।
उड़ती-उड़ती एक तितली उस ओर चली आई। इधर-उधर देख ही रही थी कि सामने से एक छोटी मेंढकी आती दिखी। परिचय हुआ,थोड़ी बातचीत, और फिर दोस्ताना हो गया।
ऐसी सुन्दर जगह भला और कहाँ,दोनों ने तय किया कि चलो यहीं रहा जाय। एक से भले दो, मन भी लगा रहेगा और रहने का स्थाई ठिकाना भी हो जायेगा।
कुछ दिन बहुत मजे में बीते, सुबह की धूप दोनों को लुभाती,झील की लहरें दोनों के मानस को सहलातीं।
एक दिन सुबह उठते ही मेंढकी ने देखा कि तितली पथरीली चट्टान के आसपास साफ-सफाई में लगी है। पूछने पर बोली- "यहाँ कुछ सुन्दर फूल उगा लिए जाएँ,तो पराग-कणों से खाने-पीने का सतूना भी यहीं हो जाये।"
मेंढकी कुछ न बोली। अगली सुबह जब तितली सोकर उठी तो उसने देखा कि मेंढकी पहले से ही जाग कर काम में लगी है। वह झील से कुछ कीचड़,बदबूदार पानी और प्राणियों के मल से मैली हुई गन्दी मिट्टी वहां ला-लाकर डाल रही थी।  
पूछने पर बोली-"अरे मैंने सोचा, गंदगी का छोटा ढेर लगा लूँ तो कीड़े-मच्छर यहीं पनप जाएँ,खाने-पीने का जुगाड़ हो जाये।"
दोनों के बीच पहले कुछ देर का अबोला हुआ, फिर मनमुटाव हो गया।
तितली दिनभर उड़ती फिरती और जो भी मिलता उससे कहती कि इस जगह को गुलज़ार करने में मेरा साथ दो। मेंढकी कहती-"ख़बरदार जो सफाई में किसी ने इसका साथ दिया।"               

वो कौन था?

दो आदमी थे।  उनमें से एक आदमी दुनिया के किसी हिस्से में रहता था। एशिया,यूरोप,उत्तरी अमेरिका,दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया के किसी भाग में।
वह अपने सभी काम स्वयं अपने हाथ से करता था। मसलन अपना भोजन तैयार करना, सफाई करना, कपड़े धोना,अपने बगीचे की देखभाल करना, अपनी गाड़ी चलाना और उसका रख-रखाव करना, अन्य यंत्रों व उपकरणों की देखभाल और उन्हें इस्तेमाल करना, अथवा अपनी हेयर-कटिंग वगैरह। वह कभी-कभी इन कामों में अपने घर के दूसरे सदस्यों की थोड़ी बहुत मदद भी ले लेता था,लेकिन इस तरह कि जैसे वह उन्हें वो काम सिखाना चाहता हो। अगर कोई और उसके लिए ये काम करता तो वह सहयोग करने की चेष्टा करता था। यदि वह कोई काम नहीं जानता था, या उसे कोई अड़चन आती थी तो वह उसे इंटरनेट,किताबों या किसी से पूछ कर जानने की कोशिश करता था।
दूसरा आदमी दुनिया के किसी और हिस्से में रहता था।वही ,एशिया,यूरोप,उत्तरी अमेरिका,दक्षिणी अमेरिका,अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया के किसी भाग में।
वह अपने कम से कम काम अपने हाथ से करना पसंद करता था। मसलन, जब वह नहाने जाये, तो कोई महिला[-माँ,बहन,बीवी या बेटी आदि]उसे बताये कि साबुन-तौलिया आदि कहाँ हैं, और जब नहा कर आए तो उसके कपड़े, प्रसाधन आदि उसे दे। उसका भोजन कोई बनादे,उसे परोस दे और खा लेने पर बर्तन हटा ले।गाड़ी साफ करने को नौकर और चलाने को शोफर हो। बगीचे में माली हो।बाल काटने को सैलून हो।  कपड़े धोने और इस्त्री करने को धोबी हो।अगर कोई काम न हो पाये या बिगड़ जाए तो उसे वह डाँट सके,जो भी उसके सामने पड़े।जो काम उसे न आये,उसके लिए वह घर के किसी अन्य सदस्य को दोषी ठहरा सके।
हम भारतीय हैं, और हमें अपने पर गर्व करना चाहिए कि दुनिया के दो हिस्सों में अलग-अलग रहने वाले उन दो आदमियों में से एक "भारतीय" भी था।                       
    

Friday, October 3, 2014

"वेरी चीप"

समाजसेवा से जुड़ा एक संस्थान एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहा था। प्रबंधकों ने सब कुछ सोच कर कार्यक्रम की रूपरेखा बना ली, कौन मुख्य अतिथि होगा, कौन-कौन अतिथि होंगे, कौन वक्ता होंगे,किस विषय पर बातचीत होगी, जलपान में क्या परोसा जायेगा, इत्यादि। समारोह का पूरा बजट भी बना लिया गया।कार्यक्रम को नाम दिया गया-'ज्ञान- अर्जन'  
जब स्वीकृति के लिए फ़ाइल अध्यक्ष के पास गयी तो उन्होंने इस पर टिप्पणी की, "एक बार वित्तीय सलाहकार को भी दिखा लें"
सलाहकार महाशय टिप्पणी देख कर गदगद हो गए। उन्होंने तत्काल प्रबंधकों को अपने चैंबर में बुलाया और उनसे मुखातिब हुए। बोले-"सुन्दर कार्यक्रम है, केवल मुख्य अतिथि श्रीमान 'क' की जगह श्रीमान 'ख' को बुला लें।"
-"क्यों सर?" प्रबंधकों ने विनम्रता से कहा।
वे बोले-"आप क को लेने कार भेजेंगे, एस्कॉर्ट भेजेंगे, प्रेस बुलाएँगे, फोटोग्राफर बुलाएँगे।जबकि श्रीमान ख अपनी कार से आएंगे, ड्राइवर नहीं, स्वयं ड्राइव करेंगे, मोबाइल पर तस्वीरें लेकर मीडिया, प्रेस,फेसबुक,ट्विटर पर भी वे स्वयं डालेंगे, हो सकता है, उनके संस्थान का सभागृह आपको उपलब्ध करा दें,वहां जलपान की व्यवस्था भी उन्हीं की रहेगी। बहुत से श्रोता भी आपको उनके ही मिल जायेंगे, नेट से निर्धारित विषय पर बहुत सी सामग्री तो वे दिलवा ही देंगे।"
प्रबंधक-गण एक दूसरे का मुंह देखने लगे। साहस करके एक प्रबंधक बोले- "अद्भुत सर !केवल एक छोटा सा सुझाव है.… "
-"हाँ-हाँ बोलिए।"
-"हम लोग कार्यक्रम का नाम बदल दें? 'ज्ञान-लंगर' कैसा रहेगा?"
सलाहकार महोदय असमंजस में थे, वे समझ नहीं पा रहे थे कि उन्होंने संस्थान के हित में कैसे सुझाव दिए हैं !                 
     

प्राथमिक उपचार है तुष्टिकरण

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