Saturday, October 25, 2014

अमेरिका में पहुँच कर याद आने वाली पहली बात

जब आप अमेरिका,कनाडा,फ़्रांस,जर्मनी,ऑस्ट्रेलिया,इंग्लैंड या जापान जैसे देशों में कदम रखते हैं तो पहली जिज्ञासा आपको शायद यही होती है कि इनका कचरा कहाँ है?
क्या भारत में हम ऐसा नहीं कर सकते? यदि इन संपन्न देशों की तुलना में हम अपने को गरीब भी मान लें, तब भी कुछ बातें तो ऐसी हैं ही जिनमें कुछ खर्च नहीं होता-
१. हम यहाँ-वहाँ सार्वजनिक स्थलों पर थूकें नहीं,खुले में शरीर की उत्सर्जन क्रियाओं को टालें, धूम्रपान, गुटखे आदि से होने वाली स्वास्थ्य-हानि व गंदगी को समझ कर इस से बचें।
२. पॉलिथीन ,कागज़ के रैपर आदि को इधर-उधर उड़ता न छोड़ें।
३. नाक-कान साफ करने के बाद अपने हाथ की सफाई का ध्यान तो रखें ही, उन उपकरणों का भी सही   निस्तारण करें जिनसे आपने सफाई की है।
४. सार्वजनिक स्थानों पर पड़े कचरे में यदि आपको कचरे से पुनर्उपयोगी वस्तुएं तलाश करते बच्चे दिखाई दें, तो उन्हें भी समझाने का प्रयास करें।
जो कचरा हमें बीमार करके दवा का खर्च बढ़वा देता है, उसे निपटाने के लिए कचरा-पेटी रखना समझदारी भरा निवेश है।
एक बड़ी समस्या सिर्फ लोगों की "आदत" है।
खुद जाँचिए-एक कमरे में बच्चों-किशोरों को अखबार पढ़ने के लिए दीजिये। फिर उन्हें किसी काम, मसलन दरवाज़ा खोलने,पानी लाने के लिए उठाइये। कमरे में पंखा चलता रहने दीजिये।
अब ध्यान से देखिये, इनमें कुछ ऐसे हैं जो जाने से पहले अखबार को किसी वस्तु से दबाएंगे, या तह करके सलीके से रख जायेंगे। अधिकांश ऐसे भी जो अख़बार को फरफरा कर उड़ता छोड़ चल देंगे।  अब आप आसानी से पहचान सकते हैं कि भविष्य में कौन "म्युनिसिपलिटी"के लिए 'प्रॉब्लम सिटिज़न' अर्थात सरदर्द -नागरिक बनने वाले हैं।                      

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