Saturday, November 10, 2012

इस तरह सागर और ज़मीन की जिंदगी कोई बहुत अलग नहीं

बीबीसी पर अभी थोड़ी देर पहले चाइना की बात हो रही थी। वे कह रहे थे कि बीजिंग में बीस में से एक आदमी करोड़पति  है। कुछ अमीर लोगों से उन्होंने बात भी करवाई। एक अमीर महिला कह रही थी कि  अब हम अमीर हैं तो हमें अमीरों की तरह रहना पड़ता है। एक युवक कह रहा था कि  वह गरीब है, पर उसे अमीरों को कीमती लिबास पहने देख कर बुरा नहीं लगता, क्योंकि यदि वह खुद अमीर होता तो वह भी ऐसा ही करता। लेकिन वह ईमानदारी से ये ज़रूर कह रहा था कि  उसे गरीब होने का अफ़सोस अवश्य है।
जीवन ऐसा ही है। इसे ऐसा ही होना भी चाहिए। जिस दिन सारी दुनिया के सारे लोग बराबर मिल्कियत के स्वामी बन कर एक सा लिबास पहनेंगे, उस दिन घरों में बैठे लोगों का दीवारों से सिर फोड़ लेने को मन करेगा। महिलायें अपने लिबास को तिलांजलि देने के लिए मन्नत मांगने लगेंगी। कोई घर से बाहर नहीं निकलना चाहेगा, क्योंकि बाहर जाकर क्या करेगा? कोई घर में भी बैठना नहीं चाहेगा, क्योंकि आखिर वह घर में बैठे-बैठे करेगा क्या?
सागर में गोताखोर इसीलिए जाते हैं, कि  सांस रोक कर नकली हवा के सहारे भी वे जीवन की विविधता खोज कर लायें। घर में लोग एक्वेरियम रख लेते हैं, कि उनमें तैरती मछलियों के अलग रंगों से जी बहले।सब एक से हो गए तो रैंप पर सुष्मिता सेन क्यों चलेंगी?
दीपावली का प्रकाश फैलने लगा है, यह आप तक पहुंचे, यह रौशनी आपसे भी निकले। शुभकामनाएं!  

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