Saturday, November 10, 2012

संख्या, मात्रा से बहुत फर्क नहीं पड़ता

संख्या का अपना महत्त्व है। यह निर्णयों को अपने पक्ष में करने में सहायक है। लोकतंत्र में तो यह सिरमौर है। लेकिन फिर भी यह सब कुछ नहीं है। इसे क्वालिटी, अर्थात गुणवत्ता आसानी से मात देती है। कई बार एक और एक ग्यारह हो जाते हैं।
एक बार देश में लोकसभा के चुनाव होने वाले थे, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण से किसी सांसद ने पूछा- इंदिराजी की पार्टी को कितनी सीटें मिल जाएँ तो वे प्रधान मंत्री बन सकती हैं। राजनारायण, जो कि  इंदिराजी की विपक्षी पार्टी में थे, बोले- उन्हें तो उनकी खुद की एक सीट भी मिल गयी, तो वो लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करके प्रधान मंत्री बन जायेंगी।
एक दिलचस्प किस्सा फ़िल्मी दुनिया में भी प्रचलित है। अभिनेता जीतेंद्र इसे खुद अपने मुंह से सुना कर स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा- मेरी एक साल में छः-सात फ़िल्में आती थीं, मगर जब अमिताभ की साल में एक भी फिल्म आती, तो खुद मेरा बेटा भी उनकी तरफ हो जाता था।
एक फैक्ट्री के सौ काम करने वाले वर्करों को चार काम न करने वाले वर्कर , या एक कालेज के सौ पढ़ना  चाहने वाले बच्चों को चार न पढ़ना  चाहने वाले लड़के, सड़क पर हुडदंग  मचाने के लिए निकाल लाते हैं।
तो देखा आपने, संख्या तो गुणवत्ता ही नहीं, "दुर्गुणवत्ता" के आगे भी लाचार है। तभी तो कहते हैं, सौ सुनार की, एक लुहार की।

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