Friday, November 23, 2012

दो उल्काएं,जुगनुओं की तरह प्यार से गले मिलीं

कुछ दिन पहले जब मैं बाल ठाकरे के दिवंगत हो जाने के बाद, किसी अखबार में पाठकों के कमेंट्स पढ़ रहा था, तो एक युवक की टिप्पणी  ने मुझे चौंकाया। उसने लिखा था कि  "शायद उन्होंने यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म 'जब तक है जान' देखली होगी, इसका सदमा वह सह नहीं पाए, और चल बसे।"
इस टिप्पणी  से मुझे लगा कि  हम सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से ही धरती पर चिपके हैं, वर्ना पता नहीं चलता कि  इस अन्तरिक्ष में कौन कहाँ?
वैसे कुछ दिन पहले यह चर्चा जबरदस्त ढंग से थी कि  दीवाली पर यश चोपड़ा की फिल्म रिलीज़ होने वाली है, और इसके लिए अजय देवगन को मनाने की कोशिशें चल रहीं हैं, कि  वह अपनी फिल्म 'सन ऑफ़ सरदार' की रिलीज़ आगें बढ़ा दें, ताकि एक म्यान में दो तलवारों की स्थिति न आये। अच्छे फिल्मकार सोचते हैं, कि  दर्शक एक बार में एक ही फिल्म पर तवज्जो दे सकते हैं। खैर, अब दोनों फ़िल्में दो निहायत सामान्य खेलों की तरह दो सिनेमा-घरों में चल रही हैं। कहीं कोई भीषण उल्कापात नहीं हुआ।
दर्शक भी अब पुराना किस्सा भूल कर कसाब और अफज़ल पर बात कर रहे हैं।फांसी और डेंगू पर बात कर रहे हैं। भ्रष्टाचार और मंहगाई पर बात कर रहे हैं। बीजेपी और कांग्रेस पर बात कर रहे हैं। राहुल और मोदी पर बात कर रहे हैं। फिल्मवाले इतना नहीं समझते, कि  बात हमेशा दो मुद्दों पर होती है। एक अकेले पर कोई क्या बोले?

4 comments:

  1. वाह, एक नई बात कही है आपने

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  2. सही कहा, विवाद के लिये दो मुद्दे होने चाहिये ।

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