Wednesday, December 12, 2012

उस हवा में भाषा के अणु नहीं थे, तो बहती रही

मैं आराम से सो रहा था। सुबह की नींद गहरी और मीठी होती है। तभी मेरे पिता ने मुझे जगाया। बोले, जल्दी से उठ कर बाहर आओ। बात पिता की थी, कोई ऑप्शन नहीं था। आँखें मलते हुए मैं आया।
बाहर एक टू-व्हीलर लेकर मेरे पिता के एक मित्र खड़े थे। वे कालेज में प्रोफ़ेसर थे। उन्हें किसी गौशाला से अपने सामने निकलवा कर गाय का ताज़ा दूध लाना था। पर वे गाड़ी चलाते, तो दूध का बर्तन कैसे पकड़ते? अतः वे मुझे अपने साथ ले जाने आये थे, कि  मैं पीछे बैठ कर दूध का बर्तन पकडूँ।
थोड़ी ही देर में मैं सरपट दौड़ती गाड़ी  पर उनके पीछे बैठा था। गौशाला के ठीक सामने एक रेतीली जगह पर तेज़ी से मुड़ने के प्रयास में गाड़ी  डगमगाई और मैं फिसल कर नीचे गिर गया। कुछ दिन हाथ पर पट्टी बंधी रही। इस बीच एक बार प्रोफ़ेसर साहब ने आकर मेरे पिता से क्षमा भी मांगी। इस क्षमा से मेरे मन में उनके प्रति सम्मान बढ़ता,यदि मुझे "ठीक" से न बैठने के लिए डांट न पड़ी होती।
बाद में मुझे पता चला कि  उन प्रोफ़ेसर साहब श्री देवेन्द्र शंकर के बड़े भाई बहुत अच्छा सितार बजाते हैं, और उन्होंने देश-विदेश में सितार बजाने के कई कार्यक्रम दिए हैं।
"भारत रत्न पंडित रविशंकर" के नाम से यह मेरा पहला परिचय था। दुनिया-भर की हवा में सितार की स्वर-लहरियों की  खुशबू फैलाने वाले महान संगीतकार को मेरी विनम्र आदरांजलि।

No comments:

Post a Comment

Some deserving ones for...No. 1

देश जल्दी ही एक नए राष्ट्रपति का नेतृत्व पाने को है। कहना पड़ता है कि राजनैतिक दलों का आपसी वैमनस्य और कटुता असहनीय होने की हद तक गिर चुके ह...

Lokpriy ...