Tuesday, December 4, 2012

वो बचपन के दिन

मुझे याद है, बचपन में रोज़ शाम को हम सभी मित्र ठीक समय पर अपने-अपने घर से बाहर मैदान में खेलने निकल आते थे। परीक्षा हो, छुट्टियाँ  हों, त्यौहार हो, गर्मी-सर्दी हो, खेल तो थोड़ा-बहुत होता ही था। इसके नियम कोई बनाता नहीं था, लेकिन अनुशासित तरीके से सब चलता था। उस समय सरकारों की भी दिलचस्पी मोहल्लों में नहीं होती थी।
लेकिन फिर भी कुछ लड़के ऐसे ज़रूर होते थे, जिन्हें कोई नियम-क़ानून- कायदा न तो स्वीकार होता था, और न वे उनका अनुपालन करना जानते थे। वे कभी देर से, खेल शुरू होने के बाद आते, और आते ही कहते, "हम भी खेलेंगे-नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे", या फिर उन्हें ज़ल्दी जाना होता था, और वे कहते थे कि  हमारी बैटिंग पहले देदो, या फिर जब वे हारने लगते तो कहते थे कि  अब अन्धेरा हो गया, अब कल खेलेंगे। या फिर वे जब जीतने लगते तो वास्तव में अन्धेरा हो जाने पर भी खेल बंद नहीं होने देते। कहने का मतलब है कि  वे खेलने नहीं,बल्कि  खेल मैदान को जंगल राज बनाने आते थे। शायद उनकी आत्मा इसी में तृप्त होती थी, या फिर उनका व्यवहार अपने पिछली योनि  के जन्म से प्रभावित रहता था।
आखिर ऐसे बच्चे बड़े तो होते ही हैं।वे संसद और विधानसभाओं में भी जाते ही हैं। वे खेल-संघों और आयोजन समितियों में भी शिरकत करते ही हैं। फिर किसी भी अच्छी-खासी तैरती नैय्या को डुबोना तो उनके बाएं हाथ  का खेल होता है। वे देश का नाम चाहें रोशन न कर सकें, उसके नाम पर कलंक लगाना तो जानते ही हैं। उनके लिए ओलिम्पिक, एशियन या कोई भी खेल केवल अपनी तिजोरियों को भरने का त्यौहार होता है।

4 comments:

  1. एकदम सटीक कहा है आपने...

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  2. Dhanyawaad. Lekin ye baat kehne aap aa bhi to sakte the?

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  3. आखिर ऐसे बच्चे बड़े तो होते ही हैं।वे संसद और विधानसभाओं में भी जाते ही हैं। वे खेल-संघों और आयोजन समितियों में भी शिरकत करते ही हैं। फिर किसी भी अच्छी-खासी तैरती नैय्या को डुबोना तो उनके बाएं हाथ का खेल होता है। वे देश का नाम चाहें रोशन न कर सकें, उसके नाम पर कलंक लगाना तो जानते ही हैं। bilkul sahi kah rahe hain aap.sarthak abhivyakti badhai !दहेज़ :इकलौती पुत्री की आग की सेज



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