Tuesday, December 18, 2012

विक्रमादित्य होते तो क्या करते?

अपने पराक्रम के प्रसार और आकलन के लिए पहले अश्वमेघ यज्ञ किये जाते थे। यज्ञ करने वाले शौर्यवान सम्राट अपना घोड़ा स्वच्छंद विचरण के लिए खुला छोड़ देते थे। वह सारे में घूमता और उसे कोई न रोकता। जो उसे रोके, यह माना जाता था, कि  वह राजा का आधिपत्य स्वीकार नहीं करता। ऐसे में राजा को जाकर उसकी ललकार का जवाब देना पड़ता था, और उसे परास्त करना पड़ता था। घोड़े के सर्वत्र निर्बाध घूम लेने के बाद ही राजा को "चक्रवर्ती" सम्राट की उपाधि प्राप्त होती थी। इस यज्ञ के सफल निष्पादन के लिए विक्रमादित्य का नाम विख्यात है।
इतिहास की इस कीर्तिमयी परंपरा का आगमन कुछ परिवर्तनों के साथ मौजूदा दौर में भी देखा जा सकता है। चक्रवर्ती सम्राट बनने की ख्वाहिश रखने वाले लोग अब 'कागज़ के घोड़े' को दौड़ा देते हैं। फिर इस घोड़े के संभावित रास्तों पर लोगों की फुसफुसाहटों का आकलन किया जाता है। इसमें गुप्तचरों का सहयोग लिया जाता है। इन्हें "पूर्व सर्वेक्षण" कहा जाता है।यदि फुसफुसाहटें कर्ण-प्रिय, अर्थात कानों को लुभाने वाली न हों, तो एक्शन लिए जाते हैं। यदि फिर भी दिल्ली की दाल गलती न दिखे, तो और बातों में ध्यान लगाया जाता है। 
यदि 20 दिसंबर को कहने को कुछ न बचे, तो अहमदाबाद से ध्यान हटा कर  2014 का इंतज़ार किया जाता है।

3 comments:

  1. अब कोई राजा चक्रवर्ती नहीं रहा....

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  2. :) सटीक आकलन...रोचक तरीके से..

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  3. Aapki baat theek hai, ghode ad jaate hain, to raja chakravarti kaise hon? Dhanyawaad aapka bhi Mantu.

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