Thursday, December 13, 2012

वो तो गया, अब किसे दें?

जब बच्चे का नाम रखा जाता है, तब उसकी उम्र बहुत कम होती है। कई बार तो केवल कुछ दिन, कई बार कुछ माह, बस। कहने का मतलब यह है, कि कोई भी बालक अपने खुद के नामकरण में न  तो अपनी राय दे पाता है, न कोई पसंद-नापसंद बता पाता  है और न ही उसे अपने नाम का उस समय अर्थ ही पता होता है। वह तो जैसे-जैसे बड़ा होता है, उसे बस आत्मसात कर लेता है।
एक बार एक शोध में यह खुलासा हुआ था, कि  लगभग 47 प्रतिशत लोगों को अपना नाम पसंद नहीं था। उनमें से 0.02 प्रतिशत ऐसे थे, जो इसे बदलने के लिए कार्यवाही कर रहे थे, शेष सभी ने उसे बेमन से स्वीकार कर रखा था। कई बार बच्चे अपने नाम को केवल इसलिए मान लेते हैं, क्योंकि यह उनके परिजनों ने रखा है।
इस से यह सिद्ध होता है कि  किसी का भी नाम अपने खुद के लिए नहीं होता। इसीलिए नाम रखते समय बच्चे के समझदार हो जाने की ज़रुरत नहीं महसूस की जाती। यह माना जाता है कि  जिस तरह आदमी को अपना खुद का फोन डायल  करने की ज़रुरत नहीं पड़ती, उसी तरह उसका नाम भी दूसरों के ही काम ज्यादा आता है।वह इसे नहीं पुकारता।
कुछ दिन पहले मैं एक समारोह में गया तो वहां एक बड़े साहित्यकार को सम्मानित किया जा रहा था। ख़ास बात यह थी कि  वे साहित्यकार अब जीवित नहीं थे, कुछ दिन पहले ही उनका देहांत हो गया था। सम्मान "मरणोपरांत" दिया जा रहा था।
वहां कुछ लोग ये चर्चा कर रहे थे, कि  अब इस सम्मान का क्या औचित्य था? कुछ एक ये भी कह रहे थे, कि  जीते जी उन्हें यह सम्मान मिलता तो कुछ बात भी थी।
इसीलिए मैंने यह चर्चा की है, कि  अपना खुद का नाम व्यक्ति के खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए होता है। जब यह रखा गया, तब भी व्यक्ति अपने होश या समझ में नहीं था। अतः सम्मान करना भी दूसरों के लिए प्रेरक हो सकता है, खुद वह व्यक्ति जीवित हो या नहीं!
पंडित रविशंकर को मरणोपरांत ग्रैमी अवार्ड दिए जाने पर उनकी स्मृति को नमन।

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