Thursday, December 6, 2012

अच्छा नहीं लगता अपने दौर को कमतर कहना, फूलों में नहीं गंध तो क्या, कलियाँ तो अभी हैं!

 यकीनन ऐसा कभी कोई दौर नहीं गया होगा, जिसमें कोई कमी न हो।लेकिन फिर भी उम्मीद हमेशा कायम रही।
एक नदी के किनारे पांच बच्चे खड़े थे। दुविधा यह थी कि  वे सभी उसपार जाना चाहते थे। लेकिन वहां केवल एक छोटी सी नाव थी, जिसमें बड़ा सा छेद साफ़ दिखाई दे रहा था। अब भला कैसे तो उसे पानी में उतारा जाय, और कैसे उस पर भरोसा हो, कि  यह सबको पार लगा देगी। लेकिन मन ललचा भी रहा था, कि  नदी भी है, नाव भी, तो ख्वाहिश अधूरी क्यों रहे? आखिर रहा न गया। सभी ने अपना-अपना दिमाग लगाना शुरू किया। सबसे बड़े बालक ने कहा- "कुछ ऐसा करो, कि यह छेद बंद किया जा सके।यदि यह बंद न हो तो चलना बेकार है।" 
उससे छोटा बोला-"इतनी जल्दी पानी थोड़े ही भरता है, तेज़ी से नाव चलाएंगे तो ठिकाने पहुँच जायेंगे।"
तीसरे नंबर वाला बोल पड़ा- "सबका जाना एकसाथ ज़रूरी है क्या, दो चक्कर करते हैं। वज़न कम रहेगा तो पानी भरने पर भी डूबेगी नहीं।"
चौथा कैसे चुप रहता। बोला-"चलो, और पतवारें ढूंढें,सब एक साथ ही जल्दी-जल्दी चले चलेंगे।"
अब बारी सबसे छोटे की थी। वह भी बोल पड़ा- "अरे सब आराम से चलो, दो जने नाव चलाना,तीन लोग अपने  हाथों से पानी फेंकते चलेंगे,पानी इकट्ठा कैसे होगा , अलग-अलग क्यों होते हो?"  

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