Saturday, December 1, 2012

जब आप पीछे रह जाएँ

कभी-कभी ऐसा होता है, आपको लगने लगता है कि  समय आगे बढ़ गया और आप पीछे छूट गए। ऐसे में आपके पास तीन विकल्प होते हैं-
1.अरे, ये कैसे हुआ? चलो पता लगाएं, और फिर से पकड़ें अपने समय की चाल को।
2.जाने दो, अब कौन दौड़े? जो आगे गए वो ही कौन सा तीर मार लेंगे? दुनिया गोल ही तो है। फिर यहीं आयेंगे।
3.लेकिन ये कैसे कहा जा सकता है? पहले इस बात की पुष्टि तो हो।
यदि आप भी ऐसा अनुभव करें, तो पहले ये देखें, कि  आप की स्थिति इन तीनों में कौन सी है?
सबसे पहले हम तीसरी स्थिति की बात करते हैं। चलिए, पुष्टि करें- आप को किसी पार्टी में जाना है, आपके मन में कश-म-कश चल रही है, कि  पार्टी में जाएँ, या न जाएँ। बस, केवल इस असमंजस का पता लगा लीजिये कि  आप क्यों नहीं जाना चाहते? आपका काम हो गया। न जाने का कारण पता लगते ही शीशे के सामने खड़े हो जाइए।या तो आपको ख़ुशी होगी, या आप को अफ़सोस होगा, या आपको अपने पर तरस आएगा। यदि "तरस" आया, तो सचमुच आप पीछे छूट गए हैं।
अब दूसरी बात। यदि आपकी मानसिकता 'जाने दो, कौन दौड़े' वाली है, तो अखबारों,पत्रिकाओं, टीवी या कंप्यूटर में "विज्ञापनों" को ध्यान से देखना शुरू कर दीजिये। क्रीम,पाउडर,शैम्पू,बाम,ऑइल,वैसलीन आदि के विज्ञापनों पर आँखें गढ़ा कर मन में सोचिये, कि  आप किसी सरोवर के किनारे बैठे मछलियाँ पकड़ रहे हैं। कुछ दिनों में आप पाएंगे कि  सब फ़िज़ूल की बातें हैं। आप कोई पीछे नहीं छूटे।
यदि आप पहले संवर्ग में हैं, अर्थात समय को फिर से पाना चाहते हैं, तो आप खुद अपना रास्ता तलाशने में सक्षम हैं। आपसे क्या कहना।      

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