Saturday, December 15, 2012

चोट लगने पर बदन को कस कर दबाना और मौन रह कर मोमबत्ती जला देना, एक ही बात है

 बात समझ में नहीं आई। ये कैसे हो सकता है? चोट लगने पर बदन को दबाना तो "रिफ्लेक्स एक्शन" है। हाथ खुद-ब-खुद वहां चला जाता है। यह तो शरीर में प्रकृति द्वारा मस्तिष्क की निगरानी में किया गया तात्कालिक उपचार है। क्योंकि चोट शरीर में पूर्व-निर्धारित नहीं है, इसलिए इसके स्वतः इलाज की कोई पूर्व-आयोजना भी नहीं है। चोट के लगते ही, जैसे सांप के काटते ही, मांस-पेशियों की बनावट में उथल-पुथल हो जाती है। कहीं वे एक पर एक चढ़ जाती हैं, तो कहीं कोशिकाओं और ऊतकों में अंतराल आ जाते हैं। इस अव्यवस्था को साधने के लिए हाथ तत्काल वहां जाता है। कस कर दबाने से एक तो अस्थि-मज्जा के सीमेंट और पत्थर की तरह जमने की प्रक्रिया होती है, दूसरे आस-पास से रक्त प्रवाह बाधित होने से भीतर उपजा दर्द समूचे शरीर और मस्तिष्क में महसूस होने से बच जाता है।
इसका मौन होकर मोमबत्ती जलाने से क्या लेना-देना?
"एक बीस वर्षीय युवक अपनी उस जन्मदायिनी माँ , बचपन में जिसके एक पल को भी ओझल होने पर विचलित हो जाता है, की जीवन-लीला को अपने हाथों समाप्त करके वहशियाना बदहवासी में उसके कार्य-स्थल पर पहुँचता है, और बीस निर्दोष जिंदगियों को समाप्त करके अपने जीवन की इतिश्री कर लेता है।"
इस घटना को आधुनिक समाज के बदन पर एक चोट मानिए। अब आँखों को आंसुओं के समंदर में डबडबाये बजरे की भाँति झुका कर हाथ में एक जलती कैंडल थाम लीजिये, और इंशा-अल्लाह कुछ न बोलिए ...
बताइये, कहाँ फर्क है?   

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