Monday, December 3, 2012

हाँ किसी ज़माने में परिवारों में ऐसा होता था

परिवार में एक मुखिया होता था। वह तेज़ नहीं चल पाता था। उसकी सांस फूल जाती थी। वह ज्यादा खा भी नहीं पाता था। उसके दांत कम या कमज़ोर हो चुके होते थे। वह कम सोता, और ज्यादा लेटता था।उसे घर का कोई बच्चा अखबार पढ़ कर सुनाता था क्योंकि उसकी नज़र कमज़ोर होती थी, फिर भी यदि घर की लड़की देर से घर आये तो वह दूर तक देख लेता था। उसका खर्चा बहुत कम होता था, पर घर के सभी लोग अपनी आमदनी उसी की हथेली पर लाकर रखते थे। खर्च के लिए मांगने पर वह जांच-पड़ताल करके एक-एक पैसा इस तरह देता था, मानो ये पैसे उसकी गाढ़ी कमाई के हों।
दुनिया कहती थी कि  वह घर "चला" रहा है।
धीरे-धीरे ऐसा ज़माना आया कि  घर ने उसको चला दिया।
वह कहीं जा नहीं पाता था क्योंकि उसे कोई ले जाने वाला नहीं था। उसकी सांस फूल जाती थी, क्योंकि उसकी दवा कई-कई दिन तक नहीं आ पाती थी। वह ज्यादा खाता नहीं था, क्योंकि ज्यादा उसे कोई देता ही नहीं था। वह लेटता कम और सोचता ज्यादा था। घर के लोग उसे अपनी कमाई बताते नहीं थे, बल्कि इस कोशिश में रहते थे कि  वह उस में से कुछ उन्हें देदे जो उसने अपनी जवानी के दिनों में कमाया था। उस से कोई कुछ मांगता नहीं था, बल्कि पडौस के लोग नज़र बचा के कभी कुछ नाश्ता उसके आगे रख जाते थे। उसे कुछ खबर नहीं रहती थी क्योंकि उसका चश्मा महीनों टूटा  पड़ा रहता था।
दुनिया कहती थी कि  ये दुनिया से कब जाएगा?

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