Saturday, February 19, 2011

एक ही पेड़ पर लगे सुख-दुःख

पिछले सप्ताह उड़ीसा जाने का अवसर मिला। जयपुर से एक ट्रेन सीधी भगवान जगन्नाथ की नगरी पुरी जाती है।इस में दो रात और एक पूरे दिन का लम्बा सफ़र कर के तीसरे दिन सुबह ढेंकनाल पहुंचा। यह छोटा सा जिला भुवनेश्वर और कटक से पहले पड़ता है। भुवनेश्वर तो उड़ीसा का तेज़ी से आधुनिक होता शहर है।मुझे यह गोहाटी की तरह लगता है। महानगरीय चहल-पहल को रफ़्तार से आत्मसात करता हुआ।कटक में कोलकाता की गंध और झलक मिलती है। ऐसा लगता हैमानो छोटा कोलकाता ही हो। एक खास तरह की संस्कृति और पारम्परिकता को लिए हुए।
ढेंकनाल हरा-भरा और शांत सा शहर है।पहली नज़र में आपको ऐसा लगेगा कि यह बहुत छोटी सी ऐसी जगह होगी,जहाँ आधुनिक सुख-सुविधाएँ शायद ही हों। लेकिन खोज-टहल से आप पाएंगे कि यह भी विकास की गति में तेज़ी से शामिल है। यहाँ रह कर आपको हरियाली,ख़ामोशी और सुविधाओं की त्रयी के दर्शन एक साथ होते हैं। मेरा मन यहाँ बार-बार आने का होता है।
आप सोच रहे होंगे ,मैंने शीर्षक में किस दुःख का जिक्र किया है। दरअसल यह दुःख आपको किसी एक शहर या प्रान्त में नहीं मिलता। यह तो सारे देश में बिखरा पड़ा है। मैंने राजस्थान,उत्तर-प्रदेश,मध्य-प्रदेश,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र और उड़ीसा से गुज़रते हुए देखा कि हमारे सारे शहर,चाहे वे बड़े हों या छोटे, बुरी तरह पौलिथिन से अटे पड़े हैं।गन्दी और बदनुमा थैलियाँ शहरों को चारों तरफ से घेरे हुए हैं। कहीं ऐसा न हो कि आनेवाली दुनिया के लोग हमारी सभ्यता को इन्ही थैलियों में दफ़न देखें।

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