Sunday, February 20, 2011

रक्कासा सी नाचे दिल्ली -1

ये ऐबक का रंगीन शहर,ऊँची मीनारों की दिल्ली
ये शाह ज़फर का नूरे-नज़र, शंकित किरदारों की दिल्ली
ये शेर शाह की नगरी है, शासन-प्रबंध निष्णात दक्ष
है तबसे अब तक बनी हुयी,सत्ता-प्रपंच में सिद्ध-हस्त
कुर्सी-कुर्सी पसरे फैले, ये तुगलक से सुल्तानों की
दफ्तर-दफ्तर चाणक्य-नुमा जजमानों की नगरी दिल्ली
कन्धों पर काला कोट पड़ा,जो गोरों ने सिलवाया था
आँखों पर है काला चश्मा,लन्दन ने भेंट चढ़ाया था
इस जहाँगीर की नगरी में अब देखो न्याय-धर्म कैसा
दादा ने पत्थर मारा था,पोते को सम्मन दे दिल्ली
ये कोट नहीं छूटे प्यारे, भागे प्राणी की लंगोटी है
ये धर्मराज की धरती पर अब दुर्योधन की रोटी है
पर ऐसी बात नहीं कहना,जो नींद उड़ा दे दिल्ली की
कोई अभियोग लगाना मत,आयोग बना देगी दिल्ली

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