Sunday, February 20, 2011

रक्कासा सी नाचे दिल्ली 2

बंगलों ने भ्रष्टाचार किया,सीना ताने हैं खड़े हुए
ली कोठी ने जम कर रिश्वत, तब बाग-बगीचे बड़े हुए
सपनों में बसता वायुयान,ख़्वाबों में मोटर दिखती है
जागी आँखों की वेला में पदयात्रा करती है दिल्ली
वादे करने का आता है,बस पांच बरस में मौसम अब
फिर खाने की ऋतु रहती है,डर कर हैं अदब बजाते सब
दो दानों का अनुदान करे तो दिल्ली 'शो' करवाती है
पर चाल करोड़ों लाखों की चुप होकर 'पास' करे दिल्ली
कहना मत कोई लाल किला,दिल्ली के होठों को यारो
तुम तो लिप-स्टिक भारत की,ओ रेड-फोर्ट की दीवारो
गुलमोहर नाम तो अच्छा है,पर उतनी महक नहीं इसमें
ये तब ही लुत्फ़ उठाती है,जब ' मेफेयर ' कहती दिल्ली
तुम गौतम गाँधी को जिंदा,जो नामों में चाहो रखना
हो जाते हैं ' एमजी ''जीबी 'सड़कों के नाम नहीं रखना
तेरे होंगे गलियां-कूंचे,इसके तो सब एवेन्यू हैं
सरणी-विहार तेरे होंगे,है एन्क्लेव रखती दिल्ली

2 comments:

  1. yah kavita aaj se 20 sal pahle likhi gai hai.lekin sthitiyon me koi vishesh fark nahin aaya hai.

    ReplyDelete
  2. बिल्कुल ऐसा नहीं लग रहा कि दो दशक पुराणी कविता है| बेहतरीन कविता| धन्यवाद

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...