Sunday, February 20, 2011

रक्कासा सी नाचे दिल्ली 7

होली हो , ईद ,चतुर्थी हो, चाहे हो ईस्टर - दीवाली
अब सारे जश्न मनाती है कन्धों पर लेकर दोनाली
है गिरजों की , हरद्वारों की, ये मस्जिद और गुरुद्वारों की
पर पूजन और अजानों को अब वक्त नहीं पाती दिल्ली
भूली उपदेश कर्म का अब, दिल्ली का कर्म हुआ ' कर्मा '
धर्मों की परिभाषा भूली , दिल्ली का धर्म हुआ ' धर्मा '
ईसा के , राम , रहीमा के ,नानक के कितने बन्दे हैं
हर पांच बरस में बन्दों की बस लिस्ट बनाती है दिल्ली
लक्ष्मी-दुर्गा की शमशीरों से कटे मिले माटी में सिर
वो पुनर्जन्म पा दिल्ली में शायद हैं सब उग आये फिर
दिल्ली ने छीने प्रिवीपर्स ,पहले तो सब राजाओं से
फिर गद्दी देकर मंत्री की ,सबको ले आयी फिर दिल्ली
लिखने वाले किस्मत इसकी , दुनिया भर के सारे दलाल
वो करें गला इसका हलाल, ये रही बेचारी उन्हें पाल
वो राजा तो रण में जाकर खुद लड़ते थे तलवारें ले
अब तो देखो लड़वाने में माहिर राजा लाई दिल्ली

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