Friday, February 25, 2011

रक्कासा सी नाचे दिल्ली 13

फुटपाथों पर जो बड़े हुए , अधनंगे-अधभूखे चेहरे
वे दिख ना पाते हैं इसको ,हैं कहाँ बेचारे पड़े हुए
इस शुतुरमुर्ग सी दिल्ली को अब ' दर्शन दूर ' सहज लगता
छाती पर रिसते ज़ख्मों को अब देख नहीं पाती दिल्ली
चूसा है खून गरीबों का जिन आदमखोरों ने तमाम
उनके कुत्तों को टीवी पर प्रोटीन खिलाती सुबह शाम
ये भारत को ना देख सकी भारत ना छू पाया दिल्ली
दिल्ली ने दुनिया देखी है ,दुनिया ने देखी है दिल्ली
कुटिया में जो खोई सूई बुढिया जा गलियों में ढूंढें
भारत के दुखड़ों का इलाज दिल्ली परदेसों में ढूंढें
दिल्ली को है सबसे प्यारा 'वसुधा-कुटुम्बकम' का नारा
बस इसी वजह से आये दिन अम्बर में दिखती है दिल्ली
जब से टीवी संग आँख लड़ी दिल्ली के सब रंग-ढंग बदले
अब सत्ता और सियासत के फ़िल्मी ढंग अपनाती दिल्ली
तू मेरे आँगन धमक थिरक, में तेरे चौबारे नाचूं
नित उछल-उछल कर खोज रही 'संस्कृति 'को दीवानी दिल्ली

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