Monday, March 26, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 19 ]

     किन्ज़ान ऐसे प्रस्तावों पर भावुक हो गया. वह उम्र में कम ज़रूर था, लेकिन इतना ज़रूर समझता था कि अभी उसने सफलता का केवल सपना देखा है, वह अभी तक कोई बड़ी कामयाबी का साक्षी नहीं बना है, इसलिए सभी प्रस्तावों को उसने खामोश रह कर ही सुना. वह इन पर कोई भी फैसला ज़ल्दबाज़ी में नहीं करना चाहता था.
     दूसरे, आज शाम से ही वह भीतर से कुछ बेचैन सा भी था.न जाने क्यों उसे अन्दर ही अन्दर कोई घुटन सी भी महसूस हो रही थी. उसे माँ रस्बी का ख्याल भी आ रहा था जिसे वह घर पर अकेला छोड़ कर आया था.
     रात को रस्बी के साथ भी कुछ सुखद नहीं घटा. किन्ज़ान के जाने के बाद वह घर में अकेली थी. उस रात उसने बेमन से अपने लिए भोजन बनाया, किन्तु खाया नहीं. उसे भूख ही नहीं लगी. रात को जिसे वह ज़ल्दी नींद का आना समझ रही थी, दरअसल वह भी उसकी कमजोरी से उपजी तन्द्रा ही थी. देर रात तक वह करवटें बदलती रही. ढलती रात का भारीपन उसे इस तरह जकड़े रहा, मानो वह गहरी नींद में हो. कुछ देर बाद ही उसकी नींद-नुमा विश्रांति में उसे न जाने कहाँ-कहाँ के दृश्य दिखाई देने लगे. नींद में उनींदा सा एक रजतपट आँखों के सामने फ़ैल गया.
     रस्बी को लगा, जैसे वह तेज़ी से कदम जमाये किसी चट्टान पर खड़ी है और उसके पाँव तले से ज़मीन खिसकती जा रही है. देखते-देखते पाँव के नीचे से गुज़रती रेत पानी में तब्दील हो गयी और वह तेज़ बहाव में गिरती-पड़ती लहरों से बचने की कोशिश में लड़खड़ा रही है.पानी का बहता दरिया उसके क़दमों से उसका जहां छुड़ाये दे रहा है.तेज़ रफ़्तार गाड़ी की खिड़की से भागते दृश्यों की सी चपलता भागते पानी में भी समा गई है. और एक मुकाम आखिर ऐसा आ ही गया, जब आसमान सी ऊंचाई से वह मानो नीचे गिर रही है. पानी के एक अदना से कतरे की तरह. रस्बी जीवन की आस छोड़ कर जैसे किसी पाताल में आ गिरी हो. गहरे और लहरदार पानी के कई जंतु किसी महाभोज के लिए उसकी ओर दौड़े. रस्बी ने पूरी ताकत से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. मुट्ठियों का कसाव इतना ज़बरदस्त था कि उसके अपने ही नाखूनों से उसकी अपनी हथेलियाँ लहू-लुहान हो गईं. एक जोर की आवाज़ हुई. आवाज़ भी ऐसी जैसे कहीं कोई तारा टूटा हो. आमतौर पर उल्का-पात की कोई आवाज़ नहीं होती, मगर यह उल्कापात रस्बी के अपने भीतर इतनी शिद्दत से हुआ कि आवाज़ भी आई और दहशत भरी गूंज भी.
     उसके बाद दोपहर तक रस्बी बेहोशी-भरी नींद में ही रही. जब उसे होश आया, तो उसने अपने को पलंग से नीचे गिरा हुआ पाया. पानी की दरियाई  चादर को अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश में उसने पलंग की चादर को मुट्ठी में भींच कर समेट दिया था. हथेलियों का खून जम कर सूख चुका था...[जारी...]   

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