Friday, March 9, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 1 ]

     उस समय कुल ग्यारह लोग थे उस कक्ष में. लेकिन वे पर्यटक थे और अन्य देशों से आये थे. उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग थीं, और शायद उनके सोच भी. लेकिन सब एक ही दिशा में सोच रहे थे.ज़्यादातर लोगों का ख्याल यही था कि ये आत्म-हत्याएं ही थीं, और किसी भी कीमत पर इन्हें रोका जाना चाहिए था. कौन जाने रोकने की कोशिशें हुई भी हों, लेकिन अब वे सब किसी युद्ध के दिवंगत योद्धाओं की तरह इतिहास में दर्ज थे.
     अमेरिका के एक छोटे से नगर बफलो  के एक मुख्य मार्ग पर बना यह स्मारक- संग्रहालय उन लोगों की कहानी कह रहा था जिन्होंने कभी विश्व-विख्यात जल-प्रपात 'नायग्रा फाल्स' के अत्यधिक ऊँचाई से गिरते पानी में ऊपर से बह कर नीचे आने की खौफनाक कोशिश की थी. कोई नहीं जानता था कि इस दुस्साहस से उन्हें क्या मिलने वाला था, लेकिन इस से क्या उनके हाथ से छिन गया था, यह अब दुनिया देख रही थी.दुनिया भर के हजारों पर्यटकों ने संवेदना और समर्थन में उनके चित्रों पर हस्ताक्षर किये थे, और ह्रदय-विदारक सन्देश लिखे थे. पानी, जिसे जीवन-अमृत कहा जाता है, उनका जीवन लील गया था. लेकिन दोष पानी का नहीं, बल्कि उनके जोखिम-भरे खतरनाक इरादे का था. वे सब निस्संदेह अच्छे तैराक रहे होंगे, किसी ने लकड़ी का बॉक्स बना कर उसमें अपने को बंद करके ऊपर से बिजली की गति से बहते  पानी में छलांग लगाईं थी,कोई प्लास्टिक की नौका-नुमा पनडुब्बी बना कर उसमें बंद होकर  ऊपर से कूदा था, किसी ने पैराशूट की भांति अपने लिए मज़बूत पारदर्शक चैंबर बना कर, उसमें बैठकर जल-समाधि ली थी. लेकिन उन सभी ने सफलता नहीं, बल्कि सफलता के सपने को इतिहास में कैद किया था. इस जल-प्रपात को देखने आने वाले सभी पर्यटक यहाँ ज़रूर आते थे और इन लोगों के बारे में जान कर दांतों तले अंगुली दबा लेते थे.
   मैं वहां से बाहर निकला तो उन्हीं लोगों के बारे में सोच रहा था जिन्होंनें अमर होने के लिए जीवन की बाज़ी लगा दी .सड़क से थोड़ा आगे जाकर एक कॉर्नर पर विशाल इमारत थी, जिसमें जल-प्रपात देखने के लिए टिकट-घर था. यहीं पर पर्यटकों के लिए एक बड़ा-बाज़ार भी था, जहाँ आकर्षक चीज़ें बिक रही थीं. कई देशों के लज़ीज़ व्यंजन यहाँ उपलब्ध थे. छोटे से लेकर बड़े तक, सभी लोगों में एक अज़ब उत्साह था.यह बिल्डिंग जिस तिराहे पर थी, उस से एक सड़क आगे जाकर वाशिंगटन की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग से मिलती थी, दूसरी तरफ दरियाई विशाल नहर के समानांतर जाता वह रास्ता था,जो 'वर्लपूल'के करीब से होकर बफलो विश्व-विद्यालय के मनोरम परिसर तक जाता था. तीसरा रास्ता फाल्स की ओर ले जाता था.
     यहाँ मेरा ध्यान एक ख़ास चीज़ की ओर गया, आम-तौर पर इतनी तेज़ी से बहते पानी में किसी भी मछली का अस्तित्व संभव नहीं होता, पर ध्यान से देखने पर केसरिया रंग की इमली जैसे आकार की वह मछली मुझे पानी की सतह पर यहाँ कई जगह दिखाई दी.चौड़े पाट की जिस नदी से बेशुमार पानी आकर झरने की शक्ल में गिर रहा था, वह कहीं से बहुत गहरी, और कहीं-कहीं से उथली थी. पानी की धारा की तीव्रता भी अलग-अलग जगह अलग-अलग तेवर लिए हुए थी. शायद यही पानी भूमिगत रास्ते से निकल कर दो विशाल देशों की सीमा बना रहा था. पानी के उस पार केनेडा की चित्ताकर्षक इमारतें दिखाई दे रही थीं.[जारी...]                

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