Monday, March 19, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 12 ]

     ...कहते हैं कि जिस तरह कांटा कांटे को निकालता है,उसी तरह डर भी डर का इलाज करता है. कभी जिस ग्यारह साल की लड़की को अपने तेरह साल के बेटे के साथ सूने घर में देख कर रस्बी डर गई थी, आज अचानक उसका ख्याल रस्बी को आ गया. वह अच्छी तरह जानती थी कि वह लड़की,  उसके बेटे पर नाराज़ होने के बावजूद पिछले चार साल से किन्ज़ान की गर्ल-फ्रैंड है. किन्ज़ान उस से लगातार मिलता है. रस्बी ने उस लड़की की मदद लेने की बात भी मन में सोच डाली. अगर वह कहेगी, तो शायद किन्ज़ान अपनी अजीबो-गरीब जिद छोड़ देगा, उसे ऐसा विश्वास हो गया, और कुछ दिन गंगा उलटी बही. जिस लड़की के साए से भी रस्बी किन्ज़ान को बचाती थी, अब उसी के बारे में किन्ज़ान से पूछ-पूछ कर उसे घर लाने की बात कहने लगी.
     सत्रह साल का किन्ज़ान इसके आगे और कुछ नहीं सोच पाता था, कि जब उसके घर में उसकी मित्र को बुलाया जा रहा है, तो उसे लाना ही चाहिए. हाँ, इतना सतर्क वह ज़रूर रहता था कि कहीं माँ के सामने उस से अंतरंगता उसकी मित्र को किसी मुसीबत में न फंसा दे. वह माँ को भरसक यह जताने की कोशिश करता कि वह केवल माँ के कहने से उसे ले आया है, उसका किन्ज़ान की किसी बात से लेना-देना नहीं है.
     लेकिन हर माँ जब यह जानती है कि उसके बच्चे को कौन सी चॉकलेट पसंद है, तो भला यह उस से कैसे छिप सकता है कि उस के बेटे को दुनिया का कौन सा इंसानी-बुत पसंद है. माँ ने अपना खेल खेला.
     लेकिन इस खेल में भी माँ हार गई. किन्ज़ान की गर्ल-फ्रैंड ने साफ़ कह दिया कि वह अपने मित्र की ख़ुशी को सँवारने के लिए उसकी मित्र है, उसके सपने को कुचलने के लिए नहीं. रस्बी ने अपने को एक बार फिर हताश देखा. अपमानित भी.
     उस आसमान से गिरते दरिया ने किन्ज़ान की दुनिया बस चुल्लू-भर की कर छोड़ी, जिसे किन्ज़ान तो पी जाना चाहता था, पर रस्बी को उसमें जिंदगी के  डूब जाने का अंदेशा था.अब रस्बी क्या करे ? क्या जवान बेटे के लिए ताबूत बना कर उसकी मौत का इंतज़ार करे, या फिर ऐसी घड़ी आने से पहले कुछ खाकर सो रहे ? तीसरा कुछ उसे दूर-दूर तक कहीं सपने में भी नहीं दीखता था. उसने क्या बेटे की ममी को किसी म्यूजियम में रखने के लिए उसे पैदा किया था ? और बेटा जिस तुफ़ैल में जी रहा था उसमें तो ताबूत में रखने या म्यूजियम में सजाने के लिए उसका मुर्दा भी हाथ आने की कोई गारंटी नहीं थी.
     रस्बी शायद नहीं जानती थी कि औलाद को जन्म देने का मतलब उसे अपने सपनों का वारिस बनाना नहीं  है.एक बार जिसे जिंदगी मिल गई, फिर उसके इस्तेमाल का हक़ भी उसे ही है. फिर रस्बी किन्ज़ान को सेना में भेज कर भी कहाँ महफूज़ कर रही थी ?
     ...सुबह किचन से कोई चीज़ उठाने के लिए किन्ज़ान ने जब भीतर झाँका, तो उसने देखा, तरकारी ऐसे ही पड़ी है, और माँ ने चाक़ू के ताबड़तोड़ वार अपनी कलाई पर कर लिए हैं ...[ जारी...]      

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