Friday, March 2, 2012

थोड़ी देर और ठहर [ भाग 10 ]

     भोजन के बाद के प्रमाद भरे आलस्य में नीचे शुरू हुए सागर ने और इज़ाफ़ा किया. अब जहाज समुद्र पर से गुज़र रहा था. अब जो पानी दिखाई दे रहा था वह विलक्षण था. उसके एक छोर पर यूरोप और दूसरे पर अमेरिका था. दो  महा -द्वीपों के बीच की प्रशांत लहरें बड़ी दरियादिल थीं. प्रशांत महासागर की धीर-गंभीर व्यापकता यहाँ से भली प्रकार आंकी जा सकती थी.
     कई घंटों की सागर के साथ अठखेलियों के बाद जब जहाज न्यूयॉर्क विमानतल पर पहुंचा, दोपहर  के तीन बजे थे.हाथ में पहनी घड़ियों का कोई मोल नहीं था, वे सब अलग-अलग समय बता रही थीं. कैनेडी हवाई-अड्डे की विशाल-विराटता भी कैनेडी के व्यक्तित्व की तरह ही भव्य नज़र आती थी.
     विमानतल के अधिकारियों द्वारा पासपोर्ट पर ठप्पा लगाते ही यकीन हो गया कि यह वास्तव में अमेरिका की  धरती ही है.थोड़ी ही देर में मैं अपने सामान के साथ न्यूयॉर्क-विमानतल के गेट नंबर चार के बाहर खड़ा था. मैंने जेब पर हाथ लगाया तो यह सोच कर मुझे रोमांच हो आया कि चूहे ने भी मेरे साथ-साथ लम्बी यात्रा सकुशल पूरी करली थी. वह अब भी तरोताज़ा दिख रहा था.
     मेरे मेज़बान लोग मुझे लेने आये तो उन्होंने बताया कि हमें न्यूयॉर्क में ठहरने से पहले एक रात नेशुआ में रुकना था. मुझे यह कार्यक्रम बेहद राहत-भरा लगा.जब कोई डॉक्टर किसी की आँखों का ऑपरेशन करता है, तो उसके बाद आँखों की पट्टी एकदम से नहीं खोलता. पहले कम रौशनी में आँखें खुलवाई जाती हैं, ताकि आँखें चौंधिया न जाएँ. जब वे  प्रकाश की अभ्यस्त हो जाती हैं, तब आसानी से खोल ली जाती हैं. न्यूयॉर्क से पहले नेशुआ में रात गुज़ारना ठीक ऐसा ही था.
     नेशुआ एक शांत और सुन्दर क़स्बा था. रात को भोजन कर लेने के बाद नींद से पूरी तरह बोझिल आँखें लेकर जब मैं सोने के कमरे में आया तो मुझे अपनी जेब में बैठे चूहे से ईर्ष्या होने लगी, क्योंकि वह मुझे बिलकुल तरोताज़ा और खुश दिखाई दे रहा था. खुश मैं भी बहुत था, मगर मुझ पर लम्बी विमान-यात्रा के बाद का जेट्लैग हावी था. मैं सोना चाहता था.
     कपड़े बदल कर बिस्तर पर आने के बाद मुझे सोने में ज्यादा देर नहीं लगी. मैं फ़ौरन सो गया. लेकिन ये नींद विस्मित करने वाली थी. मुझे गज़ब का आराम मिल रहा था, किन्तु मैं अपने चारों ओर घट रही चीज़ों को साफ़ देख पा रहा था. शायद मेरी आँखें खुली थीं.
     खिड़की में कांच के पार एक सुन्दर चन्द्रमा था. नींद में भी यह विचार मेरे साथ था कि यह वही चन्द्रमा है जिसे बचपन से मैं भारत में भी देखता आया हूँ. लेकिन भारत में मैंने ऐसा चमत्कार कभी नहीं देखा था कि बंद कांच की खिड़की से कोई आर-पार जा सके. यह तो एक जादू ही था कि वह सफ़ेद चूहा कांच की उसी खिड़की से निकल कर चलता हुआ मेरे सामने ही नीचे बड़े-बड़े सफ़ेद फूलों की क्यारी में गुम हो गया.मैं सिहर गया. तो क्या यह चूहा यहीं का रहने वाला था ?यह फूलों की क्यारी में इस तरह चला गया, जैसे यही इसका घर हो. [जारी ...]        

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