Sunday, October 7, 2012

साहित्य, भाषा, कला और दर्शन में ही नहीं, सांख्यिकी और गणित में भी है रस!

   हर पुलिस-स्टेशन में एक बोर्ड लगा रहता है, जिस पर इलाके के अपराध दर्ज होते हैं। इस बोर्ड से किसी अवधि में अपराधों की संख्या, किस्म और उनके फैलाव का पता चलता है।यह बोर्ड अपनी फितरत में बहु-आयामी होता है। यह अधिकारियों को सांत्वना, जनता को दहशत और सरकार को आंकड़े देने का काम एक साथ करता है। इस को देखने के बाद ही हमें पता चलता है कि  खौफनाक आंकड़ों में भी कितना रस है।
   यदि किसी महीने में चोरी की वारदातें एक प्रतिशत घट कर ज्यादतियों की संख्या दो प्रतिशत बढ़ जाती है, तो पूरे नभ-मंडल में किस्म-किस्म के आकलन बादलों की तरह तैरने लगते हैं। मसलन- समाजशास्त्री कहते हैं कि  अब अर्थ शास्त्रियों का ज़माना लद  गया, अब हमारे दिन हैं। डाक्टर कहते हैं कि  बैंकर्स के दिन गए अब पैसा हम पर बरसेगा। जनता सोचने लगती है कि  गहने-ज़ेवर जाएँ तो जाएँ, घर के लोग सही सलामत वापस आ जाएँ!

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