Tuesday, October 23, 2012

सात अरब में से अब केवल दो बचे

जी नहीं, ये किसी घपले-घोटाले की बात नहीं है। हमारा मतलब यह है, कि  दुनिया में अरबों लोगों के होते हुए भी अब केवल हमारे पास दो तरह के लोग ही बचे हैं।
ये कोई रोज़ की बात नहीं है। ये केवल आज की बात है। क्योंकि आज दशहरा है। और दशहरे के दिन हमें केवल ये दो लोग ही याद आते हैं- एक राम और दूसरा रावण । बाकी तमाम दुनिया इन्हीं दो के पीछे खड़ी  है। एक के पीछे हैं, आदर्श, सच्चाई, मर्यादा, और दूसरे के पीछे है- कपट,क्रूरता और वासना।
आज के दिन हमें चुनना होता है कि  हम इनमें से किस कतार में हैं? क्या हम अपना जीवन किसी आदर्श या मर्यादा के सहारे बिताना चाहते हैं, या हम छल-कपट के रथ पर बैठ कर अपनी वासनाओं के पीछे हैं?
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि  हम खुद नहीं जानते कि  हमारा ध्येय क्या है। ऐसे में हमारी स्थिति बिना पतवार की नाव जैसी हो जाती है, जो किनारे लग भी जाए, और डूब भी जाए। कहने का अर्थ है कि  हम भाग्यवादी हो जाते हैं। भाग्य पर भरोसा होना एक बात है, और भाग्य के हवाले होना दूसरी।
आप सभी को विजय-दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

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