Wednesday, October 24, 2012

"प्रेम" के भी नए क्रिया-कलाप रचे कवि

पिछले दिनों एक कवि -सम्मलेन में जाने का अवसर मिला। नए-पुराने, छोटे-बड़े, संघर्षरत- स्थापित, सभी तरह के रचनाकार एक साथ थे। अच्छा लग रहा था, कि  कुछ किशोर व युवा कवि भी दिग्गजों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर पूरे उत्साह से अपनी बात कह रहे थे।
लेकिन एक बात खटक रही थी। लगभग सभी कवियों के ज़ेहन में 'प्रेमिका' का वही रूप स्थापित था, जो तुलसी, केशव,बिहारी या अन्य श्रृंगारी कवियों की कल्पना में देखा जाता है। वही, प्रेमिका की चाल, उसके बाल, उसके चेहरे के आधारभूत श्रृंगार आज के कवियों की कल्पना में भी  बसे हुए थे।
क्या आज की महिलाओं के तौर-तरीकों पर हमारे युवा कवियों का ध्यान नहीं गया?क्या नारी-जगत की अधुनातन को अपनाने की मुहिम अनदेखी ही रहेगी? क्या जो स्त्रियाँ कर्त्तव्य, अधिकार, प्रतिष्ठा की जंग लड़ रहीं हैं, उन्हें प्रेम नहीं किया जाएगा? क्या वे अपनी शारीरिक ज़रूरतों के लिए "रोबोट" रचेंगी? क्या गाड़ी  चलाती स्त्री के हाव-भाव प्रेमी को आकर्षित नहीं करते? वेतन लेकर लौटती पत्नी क्या उन्हें मुग्ध नहीं करती? हमारे युवा रचनाकार इस ओर  भी सोचें। यही बात युवा कवयित्रियों पर भी लागू है। अब उनके प्रेमी केवल उन्हें भोगने वाले योद्धा ही नहीं हैं, उनकी सी भावनाएं अब उनके प्रेमियों में भी हैं।

5 comments:

  1. बिल्कुल सही कहा आपने...|

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  2. Dhanyawaad! Ab isi pariprekshya me aapki rachna ka Intzaar!

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  3. बात तो आपकी सही है …………नये आयाम गढने होंगे

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  4. Aur is par "watch" aap logon ko rakhna hoga, ki aapke kriya-kalaapon ki sahi tasveer utari ja rahi hai ya nahin! Dhanyawaad!

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