Saturday, October 27, 2012

आप अपना एक मिनट कितने में देंगे?

जब हर साल दशहरा आता तो मोहल्ले में बच्चे इकट्ठे होकर "रावण" का पुतला बनाते, और फिर धूम धाम से उसे जलाते। वे उसे बुराई पर अच्छाई की जीत कहते। वे इस जीत को सेलिब्रेट करते। घर-घर से चंदे में कुछ पैसे जमा किये जाते, और फिर उनसे मिठाई भी बांटी जाती।
एक दिन बैठे-बैठे बाल-मण्डली के दिमाग में आया, कि  हम दिन भर रावण बनाने में इतनी मेहनत  करते हैं, और चंद क्षणों में उसे जला देते हैं? यह प्रतीक रूप में भी तो ठीक नहीं, क्योंकि बुरे पर अच्छाई की जीत कोई क्षणों का काम नहीं है। इसमें जीवन खर्च हो जाता है। कुछ बुद्धिमान बच्चों ने इस परंपरा में कोई नयापन लाने की ठानी। उन्होंने सोचा- हम अच्छाई और बुराई का द्वन्द दिखायेंगे, ताकि पूरी शाम का कुछ सघन उपयोग हो सके। सभी ने अपनी-अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाये।
अगली बार जब दशहरा आया तो बच्चे घर-घर जाकर एक सवाल करने लगे -"आप अपना एक मिनट कितने में देंगे?"
लोग हैरान होकर उनसे पूछते- "पर तुम्हें एक मिनट क्यों चाहिए?"
बच्चों की सेना के लीडर ने जवाब दिया - "हर बार राम के तीर चलाते ही रावण तुरंत जल कर नष्ट हो जाता है। हम चाहते हैं, कि  इस बार रावण कुछ प्रतिरोध करे, इसलिए हम उसे सहयोग देने वाली एक सेना भी बना रहे हैं। हम इसके लिए सेना को मेहनताना भी देंगे। कृपया बताएं कि  आप रावण को कितनी देर तक बचाने में सहयोग कर सकते हैं? हम आपको उतने समय का भुगतान भी करेंगे।"
एक बुजुर्ग से व्यक्ति ने इस सवाल पर बच्चों से कहा-तुम एक मिनट का मुझे क्या दोगे,यदि मैं रावण को आसानी से न मरने दूं?
बच्चे बोले- आप ऐसा कैसे करेंगे?
वे बोले- हम राम और रावण के दो दल बना देंगे। राम एक बॉल से रावण  पर हमला करेंगे और रावण बैट से अपना बचाव करेगा।और जब तक तुम बॉल  को कैच नहीं कर लोगे, रावण  बचा रहेगा।
बच्चों ने चंदे में मिले सारे पैसों में अपना-अपना जेब-खर्च भी मिलाया, और मोहल्ले में एक क्रिकेट-क्लब बन गया।   

2 comments:

  1. आपकी इस रचना को पढकर मुझे जो हंसी आई बता नही सकता । बहुत ही बढिया

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