Thursday, October 25, 2012

बैटरी ख़त्म हो जाना एक बात है, पर हाथ से छूट कर टॉर्च का गिर जाना दूसरी -जसपाल भट्टी को याद करते हुए!

जब वो हँसते थे ...नहीं, वो हँसते नहीं थे, वो केवल हंसाते थे। आपके भीतर से एक ऐसी  हंसी निकालने का ज़िम्मा उनका था जो किसी मकसद से निकली हो। वे सार्थक कॉमेडी के बादशाह थे। वे चेहरे पर घुमाव-फिराव, मोड़-तोड़ नहीं रचते थे, बल्कि ऐसी स्थिति रचते थे जो आपको विश्वसनीय बेचारा बना दे, लोग आप पर हँसें  और फिर अगले ही पल संभल जाएँ, कि  अरे, ये तो मेरी ही बात कह रहा है। हास्य की सबसे बड़ी सफलता और सबसे रोचक नाटकीयता यही है।
जसपाल भट्टी ने अभिनय से संन्यास नहीं लिया, वे गुजर गए। हाँ,वे नहीं रहे,वे सचमुच मर गए। उन्होंने एक बार अपने सीरियल में अपनी एक शोक-सभा फिल्माई थी, आज नियति ने सचमुच वह दृश्य फिल्मा दिए। तो नियति ने नया क्या किया, ये तो वे जानते ही  थे। नकलची नियति!
फिल्म और टीवी की दुनिया में यह बड़ा हादसा है। बैटरी तो रोज़ ख़त्म होती है, रोज़ बदली जाती है। टॉर्च ही खो जाए तो मन खराब होता है!

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