Saturday, October 29, 2011

क्या घर में रौशनी का यही इंतजाम है

सब जानते हैं कि आदम और हव्वा का सफ़र एक साथ शुरू हुआ था. फिर भी बहुत सी बातें अलग-अलग हुईं. हमारे देश में तो शायद कोई नहीं जानता होगा कि देश में पहला पुरुष पुलिस अधिकारी कौन और कब हुआ. देश में पहला ज़ुल्म कब, कहाँ, किस महिला के साथ हुआ. 
पर यह एक सुखद संयोग है कि देश की पहली महिला आई पी एस अधिकारी के बारे में सब जानते हैं.इस महिला का पूरा कैरियर खुली किताब की तरह है. यह भी समय-सिद्ध है कि इस महिला ने अपने कर्तव्य-पालन में कभी कोई कोताही नहीं की. फिर भी सेवा-निवृत्ति के समय से पहले ही स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति ले लेने को विवश होना, इस महिला के कैरियर पर नहीं, बल्कि पुरुष समाज की मानसिकता  पर एक कलंक की तरह है.
डॉ. किरण बेदी इसके बाद भी केवल  दादी-नानी बन कर घर की रसोई के इर्द-गिर्द खर्च नहीं हुईं. उनका जीवन अब भी प्रखर राष्ट्रीय और मानवीय लक्ष्य को समर्पित है. आज केवल अन्ना हजारे की मुहिम में साथ देने के कारण उन पर ऐसे-ऐसे बचकाने आरोप लगाए जा रहे हैं, जो एक सामान्य पुलिस वाले की कमाई के समकक्ष भी नहीं हैं. जो लोग अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों को खलनायक सिद्ध करने पर तुले हैं, वे शायद नहीं जानते कि वे इतिहास के किन बदबूदार गलियारों में अपने भविष्य को गिरवी रख रहे हैं? 
और सबसे बड़ा अचम्भा यह है कि देश के अखबार अन्ना और साथियों के कार्टून छाप रहे हैं. काले अक्षरों पर पलने वाला मीडिया काले और सफ़ेद को पहचानने में गच्चा कैसे खा गया? 

2 comments:

  1. aapne bilkul sahi kaha hai Kiran bedi ji jaisi mahila ko badnaam karne me unhi logon ka haath hai jo sir se paanv tak bhrash hain.jan lok pal bill ko aane nahi dena chahte.parantu inko nahi pata ant me sachchai ki hi jeet hoti hai.sara desh anna ji ka samarthak hai kis kis ko badnaam karenge.

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  2. buraai jab achchhai ko badnaam karne ki koshish karti hai, vah apni kabra khodne ki tayyari hi karti hai. aapka aabhar.

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