Tuesday, October 18, 2011

बड़े भाईसाहब की छोटी कहानी [भाग-तीन]

अब तक आपने पढ़ा- उन्होंने चारों तरफ से पैसा उधार लेकर, अपनी सारी जमापूँजी लगा कर किसी तरह फिल्म बना तो ली, पर वह सेंसरबोर्ड में अटक गई. कुछ लोगों की मदद से उसे सेंसरबोर्ड से तो छुटकारा मिल गया, किन्तु उसे सिनेमाघर ने रिलीज़ करने के लिए बड़ी राशि की मांग की. अब कहीं से आसानी से उधार मिलने की गुंजाइश नहीं थी, इसी से फिल्म की रिलीज़ टलती रही. अब आगे- 
अब फिल्म को रिलीज़ करने का काम ही बचा था, अर्थात क्लाइमेक्स, अतः भाईसाहब ने सोचा, कि अब यदि ज़रूरी राशि किसी एक ही व्यक्ति से ली गई तो पूरे प्रोजेक्ट की सफलता का श्रेय उसे ही जायेगा फिर आसानी से इतनी बड़ी राशि किसी से मिल पाना आसान न था, क्योंकि वे अपने सारे संपर्कों से धन पहले ही ले चुके थे.इसलिए ऐसी रिस्क न लेकर उन्होंने थोड़े दिन इंतजार करना बेहतर समझा, कि शायद समय के साथ कोई रास्ता निकल आये.
उधर समय बीत रहा था, इधर परिचित रोज़ पूछ रहे थे कि फिल्म कब रिलीज़ होगी?आखिर उन्होंने फिर बूँद-बूँद से घड़ा भरना शुरू किया. जहाँ से भी हो सकता था, जैसे भी हो सकता था, खर्चों में कंजूसी की हद तक कमी करके, घरवालों की बेहद ज़रूरी अपेक्षाओं की अनदेखी करके और कुछ चालाकी-बेईमानी तक करके एक उल्लेखनीय राशि जोड़ ली. रिटायर हो जाने के कारण वे घर में रहते थे, इसी से आस-पास के कुछ लोग अपने बिल आदि जमा करने के लिए उन्हें दे देते थे. इस अमानत में खयानत करने में भी उन्होंने गुरेज़ नहीं किया.असल में उनके मन में यह विश्वास बैठा हुआ था कि फिल्म रिलीज़ होते ही उसकी आय से वह सभी का पैसा कई गुना करके लौटा देंगे. 
जो सिनेमाघर मालिक उनसे पूरे पैसे एडवांस  मांग रहा था, उसे वे राशि दे बैठे.सिनेमाघर मालिक अनुभवी था, उसने शायद ताड़ लिया कि इस फिल्म को रिलीज़ करने में न उसे कुछ मिलेगा, और न उन्हें. उसने लालच और चालाकी से काम लिया. कहा- एक शो ट्रायल का चला देते हैं, जिससे प्रोजेक्शन का सही एडजेस्टमेंट पता चल जाये. भाईसाहब ख़ुशी से इतने उत्तेजित हो गए कि उन्होंने ट्रायल-शो देखने के लिए फोन कर-कर के अपने मित्रों-शुभचिंतकों और पड़ोसियों को बुला लिया. इस तरह संभावित दर्शकों ने भी मुफ्त में फिल्म देखी.
सिनेमाघर मालिक ने उन्हें रील में कोई तकनीकी कमी बता कर उसे दिल्ली भेजने और कुछ खर्च और करने का सुझाव दे दिया. अब वे दिल्ली जाने तथा वहां होने वाले खर्च के लिए फिर किसी जुगाड़ और लाचारी-भरे इंतजार में हैं. जिन लोगों के फिल्म टिकट लेकर देखने की ज़रा सी भी सम्भावना थी, वे उसे मुफ्त में देख चुके हैं. [शेष आगे कुछ होने पर].     

2 comments:

  1. पढ़ रहे हैं, ऐसे ही जीवन में सीख मिलती है।

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  2. aapki baat sahi hai, jeewan sikhata hai. dhanywad.

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