Thursday, October 27, 2011

साओ लुईस में यह हवा सूरीनाम से ही पहुंची होगी

नई दिल्ली के प्रेस एन्क्लेव से एक पत्रिका निकलती है- "विश्व हिंदी दर्शन". इस पत्रिका की कई विशेषताओं में से एक यह भी है कि इसने दुनिया भर के कई देशों से लोगों को भारत से जोड़ा है. वैसे तो यह काम दुनिया की सारी एयर लाइंस करती ही हैं, पर इस पत्रिका ने लोगों को जोड़ने का काम एक विशेष माध्यम से किया है. 
कुछ साल पहले मुझे भी इसके एक आयोजन में जाने का मौका मिला था. उस कार्यक्रम में सूरीनाम, मॉरिशस, वियेना, त्रिनिदाद, इंडोनेशिया आदि देशों से कई लोग आये थे. मुझे हरिशंकर आदेश की अच्छी तरह याद है, जिन्होंने वहां बहुत मधुर प्रस्तुति दी थी. इस कार्यक्रम में कुछ विद्वानों से आरंभिक चर्चा के बाद ही मेरे उस आलेख की रूपरेखा बनी थी, जो अगले विश्व हिंदी सम्मलेन में प्रस्तुति के लिए स्वीकृत हुआ. 
तो मैं बात कर रहा था उस विशेष माध्यम की, जिससे दुनिया के कई कोनों में निवास कर रहे लोग एक मंच पर आते हैं- वह माध्यम है 'रामायण'. 
यह पत्रिका संसार के कई देशों में रामायण सम्मलेन और राम-कथा जैसे आयोजन भी करवाती रही है. आज शाम को दीपावली उत्सव के माहौल में मुझे वह वार्तालाप याद आ गया, जो आदेश जी को आमंत्रित करने के लिए एक सज्जन कर रहे थे. वे शायद साओ लुईस में किसी क्लब से जुड़े थे, जो ऐसे एक आयोजन के लिए इच्छुक था. ब्राजील की यह तटीय धरती भू-मार्ग से सूरीनाम से कितनी ही दूर हो, सागर के रस्ते से तो नज़दीक ही है. जो लहरें साओ लुईस के तट को छूती हैं, वही लहराती-इठलाती फ्रेंच गुएना होती हुई सूरीनाम को भी स्पर्श करती हैं.  

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