Sunday, October 2, 2011

रहिमन देख बड़ेन को,लघु न दीजिये डार

ये पंक्तियाँ किसकी हैं ? कोई भी कह देगा - निस्संदेह रहीम की. लेकिन मैं कुछ और सोच रहा हूँ. मुझे लगता है कि कोई भी पंक्ति उसकी मानी जानी चाहिए, जो उस पर अमल करता हो, उसकी नहीं जिसने वो लिखी हो. 
मुझे ये पंक्ति श्रीमती इंदिरा गाँधी की लगती है. 
एक बार श्रीमती गाँधी को एक ऐसे समारोह में जाना था, जिसमें राष्ट्रपति को भी शिरकत करनी थी. डॉ.फखरुद्दीन अली अहमद उस समय भारत के राष्ट्रपति थे. श्रीमती गाँधी के घर से समारोह-स्थल की दूरी लगभग दस मिनट की थी. इंदिराजी के साथ बच्चों[परिवार के] को भी जाना था. बच्चे डायनिंग टेबल पर नाश्ता कर रहे थे. पुत्र को इत्मीनान से टोस्ट पर मक्खन लगाते देख श्रीमती गाँधी ने कहा- शिष्टाचार के नाते हमें प्रेसिडेंट के वहां पहुँचने से पहले पहुंचना चाहिए, ताकि हम उनकी अगवानी कर सकें. उनकी बात का यह असर हुआ कि पुत्र ने एक और टोस्ट अपनी प्लेट में रख लिया, और मक्खन की प्लेट नज़दीक खिसकाली ताकि बाद में उस पर भी मक्खन लगाया जा सके. 
श्रीमती गाँधी ने दोबारा डायनिंग टेबल पर आकर कुछ कहने से बेहतर यह समझा कि वे राष्ट्रपति भवन को फोन से ही कुछ कहें. उन्होंने कहा- राष्ट्रपति के काफिले को कुछ देर रोका जाये. 
वे दूर-द्रष्टा थीं, अतीत होते राष्ट्रपति के लिए भविष्य के प्रधान मंत्री को गुस्सा नहीं कर सकती थीं. उन्हें दोष भी क्यों दिया जाये ? रहीम ने यही तो कहा था.  

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रेरक तथा सार्थक पोस्ट , आभार

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