Friday, May 9, 2014

रखना है कहीं पाँव तो रखते हैँ कहीँ हम, आखिर तो एक इंसान [आम] हैं, फरिश्ता तो नहीं हम

हमारी संस्कृति की खासियत है कि हम मन ही मन जो चाहें, वो सबके सामने न कहें। बल्कि कुछ लोग तो इस रूढ़ि के इतने क़ायल हैं कि जो चाहें , बार-बार ठीक उसका उल्टा कहें।
हमारी फिल्मों ने भी हमें यही सिखाया है, कि जो कहा जाएगा, वह होगा नहीं।
जब कोई नायिका कहती है "तुम मुझसे दूर चले जाना ना" , इसका अर्थ है कि वह शीघ्र ही बिछड़ने वाली है।
जब वह नायक से पूछती है "तारीफ़ करोगे कब तक", और नायक कहता है "मेरे सीने में साँस रहेगी तब तक", तो इसका मतलब है कि फ़िल्म में इंटरवल के बाद दूसरी हीरोइन आने वाली है।
यदि नायक भाव-विभोर होकर कह रहा है "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है" तो यकीन जानिये कि नायिका थोड़ी देर में अंधी होने वाली है।
यह मानसिकता हमारे देश के आम आदमी की भी है,शायद इसीलिए आम आदमी पार्टी का पदार्पण राजनीति में यही कहते हुए हुआ था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे और न देँगे। फिर खुलेआम जो हुआ, वो सबने देखा। ये सिद्ध मंत्र और भी कई पार्टियोँ के नेता और नेत्रियां भी आजकल जप रहे हैं। ईश्वर उन्हें कम से कम तब तक तो अपनी बात पर कायम रहने की शक्ति प्रदान करे, जब तक वे खुद कुछ नया नहीं कह लेते।
वैसे हो सकता है कि किसी को किसी की ज़रुरत ही न पड़े।  

                     

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