Monday, May 5, 2014

लहरें

लहरें, हिलोरें, जलजले, झंझावात, सब होते हैं. आप इन्हें देखें, न देखें, ये होते हैं.
जब सागर तट पर लोगों का हुजूम हो, लहरें तब भी होती हैं. भिनसारे या देर रात जब नीरव निशब्द सागर तट पर कोई भी नहीं होता, मछुआरे तक नहीं, लहरें तब भी होती हैं. ज्वार में, भाटे में, कम या ज्यादा, किन्तु लहरें होती हैं.
लहरें पानी को साफ़ करती हैं. लहरें सन्नाटे तोड़ती हैं. लहरें जम गई काई या मिट्टी को हटाकर तलों को एकसार करती हैं. लहरें मल्लाहों को पसीने ला देती हैं.लहरें ठहरे पानी में मलाल भरती हैं.लहरें बहते पानी में जलाल भरती हैं. लहरें बरसते पानी में थिरकन जगाती हैं.
लहरें जनमानस के ह्रदय-दालान में अंतःक्षेप करके तुलसी के खुशबूदार बिरवे रोपती हैं.
लहरें जनजीवन के मस्तिष्क-आलोड़न से नागफ़नियों के फ़न कुचल देती हैं.
इनके विध्वंसक, इनके नियामक, इनके सृजनकारी आयामों को निहारने का अपना अलग ही मज़ा है.
आइये, इनकी राह देखें !                      

4 comments:

  1. प्रतीक्षा है .

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  2. इन लहरों से तैयार रास्‍ता निसन्‍देह पुराने अन्‍धड़ाें से उजड़े रास्‍तों से ठीक ही होगा।

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