Monday, May 19, 2014

मैं, हम और आप

राजाओं का प्रशिक्षण चल रहा था।  उनका कोच उन्हें सुबह-सुबह शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर ले गया, और वहां उसने उधर से गुज़रते सारे दूध वालों को रोक लिया। कोच ने बुलंद आवाज़ में घोषणा की- "कल से यहाँ से गुज़रने वाले उन सभी दूध वालों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा, जो दूध में किसी भी तरह की मिलावट करेंगे।"
कोच वहां से चला गया और उसने राजाओं को निर्देश दिया कि वह सभी दूध वालों से यह जानने की कोशिश करें, कि लगभग कितने प्रतिशत ग्वाले इस घोषणा से खुश हैं?
फिर वह एक सरकारी दफ्तर में गए।  वहां कोच ने ऐलान किया-"कल से देर से आने वाले, जल्दी जाने वाले, बीच में ड्यूटी से नदारद रहने वाले कार्मिकों का उतने समय का वेतन काट लिया जायेगा।"
राजाओं को फिर निर्देश दिया गया कि वह इस निर्णय से खुश होने वालों की संख्या पता लगाएं।
तब कोच राजाओं को एक कॉलेज में ले गया।  ऐलान किया कि क्लास में नियमित रूप से न आने वाले और  परीक्षा में नक़ल करने वाले विद्यार्थियों को अगले वर्ष इसी क्लास में रहना होगा।
राजाओं से फिर कहा गया कि वह खुश होने वाले बच्चों की संख्या पता लगाएं।
अंत में कोच एक बाजार में ठहरा और व्यापारियों में घोषणा की-"जो लोग अपना सही और पूरा टैक्स नहीं चुकाएंगे, उनका व्यापार बंद करा दिया जाएगा।"
राजाओं को उन व्यापारियों की संख्या पता लगानी थी जो घोषणा से खुश हुए।
अब कोच ने राजाओं से पूछा-"आपने अभी तक क्या सीखा?"
पहले राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि मुझे कितने लोगों को सुधारना है!"
दूसरे राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि राजकोष में कितने लोग नियमित चंदा देंगे।"
तीसरे राजा ने कहा-"मैंने यह सीखा कि हर फैसला जनता से पूछ कर करना बुद्धिमानी नहीं है।"
            

6 comments:

  1. सुन्दर प्रसंग और उम्दा प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)

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  2. अच्छी प्रस्तुति पर आज के नेता यह निष्कर्ष निकलते कि घोषणाएं करे रखो करो कुछ नहीं क्योंकि भारतीय लोकतंत्र इन्ही पर टिका है

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  3. आपकी बात सही है, किन्तु जनता के पास ५ साल बाद उनका इम्तहान लेने का अवसर तो है, इसी का प्रयोग बुद्धिमत्ता से हो तो स्थिति सुधरेगी।

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  4. :)
    बार बार पूछ-पूछकर आम जनता को तंग करने वाले फैसले नहीं ले रहे होते, अपना छवि-निर्माण कर रहे होते हैं।

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  5. आपका कहना सही है, शायद इन्हें मिला समर्थन इस मनोविज्ञान पर आधारित था कि जनता 'नया'चाहती है। इस से आगे इनकी और न कोई तैयारी है, न सामर्थ्य !

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