Friday, September 16, 2011

क्या टूटा ?

कल रात को मैं एक न्यूज़ चैनल पर समाचार देख रहा था.बड़े-बड़े अक्षरों में एक 'डिस्प्ले' था-यूपीए अध्यक्ष ने अपनी पुत्री के घर डिनर लिया.यह "समाचार" तो अच्छा था,पर इससे भी अच्छा था उस कार्यक्रम का टाइटल जिसके अंतर्गत वह समाचार आ रहा था.
जानते हैं,क्या था टाइटल ? "ब्रेकिंग न्यूज़"
मीडिया से थोड़ा-बहुत जुड़ाव होने के कारण मैं सोच में पड़ गया.क्या हम इतना पीछे रह गए,कि मीडिया के ताज़ा-तरीन जुमले हमें समझ में नहीं आ रहे?या फिर मीडिया ने अपने कोई ऐसे 'एथिक्स' गढ़ लिए कि किसी को समझदार होने की ज़रुरत ही न रहे.
मैंने पूरी मुस्तैदी से कानों को सतर्क करके समाचार फिर सुना.[आजकल यह सुविधा है कि महत्वपूर्ण समाचार तब तक बार-बार आते रहते हैं,जब तक आप उन्हें समझ न लें]लेकिन कहीं से कोई आवाज़ नहीं आई.मैं सोचने लगा कि जब कोई आवाज़ ही नहीं आई,तो कैसे पता चले कि क्या टूटा?जब कुछ टूटा ही नहीं तो कैसी ब्रेकिंग न्यूज़?
काफी देर बाद मुझे समझ में आया,कि यह तो वास्तव में ब्रेकिंग न्यूज़ ही नहीं,बल्कि 'नहले पे दहला'न्यूज़ थी.बारह दिन की सिविल सोसायटी की भूख के जवाब में सत्ता का डिनर !

2 comments:

  1. GOVIL JI,
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें /
    मेरी १०० वीं पोस्ट पर भी पधारने का
    ---------------------- कष्ट करें और मेरी अब तक की काव्य-यात्रा पर अपनी बेबाक टिप्पणी दें, मैं आभारी हूँगा /

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  2. dhanywad,badhai ke liye.badhai,100 post poori karne ke liye.aapki kavy yatraa par bhi aaunga.

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