Friday, July 1, 2011

क्या ज्यादा आगे बढ़ जाना पीछे रह जाना भी है?

कहने को तो भारत एशियाई महाद्वीप का एक राष्ट्र है, किन्तु एक बात में यह दो-दो महाद्वीपों से समानता रखता है. 
भारत पूरब-पश्चिम में उस शिद्दत से नहीं बँटा हुआ जिस तरह उत्तर-दक्षिण में. मैं जानता हूँ कि यदि यह बात मैं किसी प्रत्यक्ष समूह-चर्चा में कह रहा होता तो निश्चित ही मेरी सर्विस पर मुझे 'स्मैश' का सामना करना पड़ता.पर यहाँ एकतरफा वक्तव्य में मैं आसानी से कह सकता हूँ कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत दो अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं. जबकि पूरब और पश्चिम भारत एक ही देश के  दो विविधता पूर्ण हिस्से हैं.ये दोनों केवल मुहावरे में ही विपरीत ध्रुव हैं. 
अमेरिका भी भौगोलिक रूप से दो महा-द्वीपों में विभक्त है. और दोनों हिस्से दो महाद्वीप हैं. इन दोनों हिस्सों की जब आप तुलना करेंगे तो आपको दो संस्कृतियों की झलक मिलेगी. दिलचस्प तथ्य यह है कि आप के लिए यह तय कर पाना बहुत मुश्किल होगा कि आधुनिकता अथवा उत्तर-आधुनिकता के मानदंडों पर कौन सा भाग आगे है. 
एक बार एक सज्जन मुझसे बोले कि दक्षिण भारत में घूमने पर ऐसा लगता है कि वहां व्यवस्था अभी बनी हुई है जबकि उत्तर भारत में ऐसा लगता है कि सब कुछ बिगड़ गया है. 
ये लीजिये, अब तय कीजिये कि दोनों हिस्सों में से कौन सा आगे है?
अर्थात एक जगह तो सब जैसा था वैसा ही अब-तक बना हुआ है, पर दूसरी जगह जो था वह बीत कर अब अस्त-व्यस्त नया है. यानि कि यह आगे निकल गया. या फिर स्वीकार कीजिये कि संस्कृति उलटी भी चलती है. 
दक्षिणी अमेरिका के देश "चिली"की विरासत में आपको यदि कहीं यूनानी शास्त्रीयता के दर्शन होते हैं तो आप इसका मूल्यांकन कैसे करेंगे?इसे न्यूयार्क के मुकाबले 'पिछड़ा' कह कर, या फिर एक ऐसा देश कह कर जिसका बटुआ अभी तक चोरी नहीं हुआ.     

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