Wednesday, July 6, 2011

आपका भी मान कभी लगा है दाव पर,अरे, सम्मानित हुए हैं?

कनुप्रिया, सूरज का सातवां घोड़ा और गुनाहों का देवता जैसी किताबों के लेखक और 'धर्मयुग' जैसी पत्रिका के तीन दशक तक सम्पादक रहे डा. धर्मवीर भारती से एक बार मैंने पूछा- आप देश की सबसे बड़ी हिंदी पत्रिका के इतने समय सम्पादक रहे, लेकिन इतने साल में उस पत्रिका में न कभी आपकी कोई रचना छपी, और न ही कोई तस्वीर? यहाँ तक कि आपका नाम भी बारीक अक्षरों में केवल एक जगह छपता था,वह भी इसलिए, कि प्रकाशकीय घोषणा के नियमों में यह आवश्यक है. आपके भीतर का लेखक आपके भीतर के सम्पादक का लाभ उठाने के लिए ललचाता नहीं था? 
भारती जी बोले- हलवाई अपनी बनाई मिठाई शायद ही कभी स्वाद से खा पाता है.किसान को भी आपने अपने ही खेत से मूली-गाज़र तोड़ कर खाते नहीं देखा होगा. वास्तव में सर्जक अपने सृजन का भोग कर ही नहीं सकता. यदि कहीं कोई ऐसा करता है, तो या तो सृजन झूठा है, या सर्जक. ऐसी पत्रिका भी उस रसोई के समान होती है जिसमे भूखे बच्चों के सामने पहले माँ खुद थाली भर कर बैठ जाये. 
आज आपको ऐसी असंख्य पत्रिकाएं मिलेंगी जिनके अधिकाँश अंकों के कवर-पृष्ठ पर संपादकों की  अपनी न्यूज़ और अपनी ही तस्वीर होती है. न्यूज़ भी क्या, वे कहीं न कहीं, किसी न किसी से सम्मानित हो रहे होते हैं. कुछ सेवा-निवृत्त अफसर और बीत चुके नेता भी सम्मान करने में इतने सिद्ध-हस्त हो चले हैं, कि जैसे क्रिकेटर विकेट चटका कर रिकार्ड बनाते हैं, ये सम्मान कर के रिकार्ड बनाते हैं. 
कुछ समय पहले मेरे पास एक वयोवृद्ध प्रकाशक-सम्पादक का फोन आया कि अमुक अवसर पर आप फलां धर्मशाला में पधारिये, आपके हाथों हम कुछ लोगों का सम्मान करायेंगे. 
मैंने जानना चाहा, वे कौन लोग हैं, कहाँ से आ रहे हैं, आपने उन्हें कैसे चुना है, आप उनके सम्मान में उन्हें क्या देंगे? 
मेरे सवालों से वे एकाएक तिलमिला गए. उन्हें मेरा इतना जानना भला नहीं लगा. वे तो मुझे आदेश दे रहे थे और अपेक्षा रखते थे कि मैं सर के बल चल कर आऊंगा, ताकि उनकी पत्रिका में मेरी तस्वीर छपे. वे बौखलाए से बोले- सब लोकल हैं, और हम इन्हें दें क्या, ये वर्षों से पत्रिका का चंदा तो देते नहीं, मुफ्त में पढ़ रहे हैं. हम अपने प्रकाशन की किताबों का एक-एक सेट उन्हें दे- देंगे. आप तो बस आकर 'सालों' को एक शाल ओढ़ा देना.
मैंने कहा- ऐसे लोगों को ओढ़ाने-पहनाने की क्या ज़रुरत है,घूमने दो ऐसे ही.
[खुदा का शुक्र है कि मैंने यह मन ही मन कहा, उन तक मेरी आवाज़ नहीं पहुंची, और न मैं ही पहुंचा उनके समारोह में]  
    

4 comments:

  1. बहुत अच्छा उदाहरण दिया है शाल उढाने/टोपी पहनाने/रेवडी बाँटने का। समय तेज़ी से बदल रहा है। जिनके पदों पर दूसरों को पहचानने की ज़िम्मेदारी है उन पर दूसरों की कीमत से अपनी पहचान बनाने वाले ही चढ बैठे हैं।

    ReplyDelete
  2. badalte samay me purani, kam se kam achchhi cheezon ko bachaa lene ki zimmedari nibhaiye. aap saksham hain, samvedansheel bhi.

    ReplyDelete
  3. आपने जो मन ही मन कहा, सही है लेकिन ये भी सही है कि आजकल आवरण(कृत्रिम) की जरूरत भी ऐसे ही लोगों(सालों) को है:)

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...