Wednesday, July 13, 2011

जब वह उन्नीस साल का हुआ, उसने तय कर लिया कि वह शारीरिक यातनाओं से डर कर राष्ट्रभाषा से दूर नहीं जायेगा. वह अपना शहर छोड़ कर मुंबई आ गया. यहाँ उसकी मेहनत रंग लाई और वह एक दक्षिण-भारतीय बैंक में हिंदी अधिकारी बन गया. अपने सहकारियों की उदासीनता और अधिकारियों की उपेक्षा के बावजूद उसने अपने दफ्तर में एक दिन हिंदी-दिवस मनाया. जानते हैं कैसे? 
उसने मुझे फोन किया कि अगले दिन मैं "मुख्य-अतिथि" के रूप में उसके कार्यालय आऊं.मेरे स्वीकृति दे देने के बाद वह बेहद खुश और उत्साहित हो गया. रात को आठ बजे मेरी उस से बात हुयी, और अगले दिन शाम चार बजे मुझे उसके दफ्तर पहुंचना था. बीच में बीस घंटे का समय था. इन बीस घंटों में मेरे पास उसके चौदह फोन आये. क्या-क्या कहा उसने,आप कल्पना कर सकते हैं? चलिए, कल मैं आपको बताता हूँ उसके फोन की पूरी कॉल-डिटेल्स.

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