Thursday, July 14, 2011

सा रे ग म प ध नी सा,सा नी ध प म ग रे सा

अगली सुबह फूलों और गुलदस्तों से शुरू हुयी. उसने इतनी सुबह फोन करने के लिए क्षमा मांगी और विनम्रता से कहा कि उसके दफ्तर के इलाके में फूल नहीं मिलते हैं, अतः मैं अपने साथ कुछ गुलदस्ते ले आऊँ, मुझे उनका भुगतान मिल जाएगा. 
दस बजते-बजते जैसे ही मैं अपने ऑफिस पहुंचा, उसका फोन आया कि मैं उनके जिन कुछ कर्मचारियों का सम्मान किया जाना है, उनके लिए 'प्रमाण-पत्र' बना कर फैक्स कर दूं.
जब उसका अगला फोन आया तो वह काफी हताश सा था, कह रहा था कि कार नहीं आ सकेगी, मैं टैक्सी कर के आ जाऊं. अगला फोन उसका और भी निराशा में आया. वह बोला- समारोह में 'बजट' की तंगी है, अतः मैं ज्यादा महंगे गुलदस्ते न लाकर एक माला ले आऊँ. 
अगली बार वह लगभग याचना कर रहा था. पूछ रहा था कि क्या मैं पुरस्कार स्वरुप बांटने के लिए अपनी पुस्तकों का एक सेट ला सकता हूँ? दो बजे उसने मुझे कार्यक्रम के देर से शुरू होने की सूचना दी, और तीन बजे फोन किया कि क्षेत्रीय प्रबंधक महोदय के अचानक टूर पर चले जाने के कारण कार्यक्रम रद्द किया गया है और वह रात को मुझे मेरे घर पर मिलेगा. 
मैं आज उसका नाम महादेवी, टंडन और निराला के साथ लिखने में गर्व महसूस करता हूँ. पर आपके सामने नहीं लिखूंगा, कहीं उसके गर्व को ठेस न लग जाये. 

1 comment:

  1. सारी किस्तें पढी, मज़ा आया। हिन्दी की कहावत याद आयी, नादान की दोस्ती, जी का जंजाल!

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