Friday, April 8, 2011

अमेरिका की सदाशयता किसी को क्यों चुभे?

कल भारत और अमेरिका के बारे में सोचते-सोचते मुझे अचानक डॉ धर्मवीर भारती की याद आ गयी। उनसे एक बार छोटी और बड़ी पत्रिकाओं को लेकर मेरी काफी देर तक चर्चा हुई। वे उन दिनों ' धर्मयुग ' के संपादक थे , जो हिंदी की उस समय देश की सबसे बड़ी पत्रिका मानी जाती थी। वे अक्सर लघु पत्रिकाओं के संपादकों से नाराज़ रहते थे। वे कहते थे कि ये लोग अपनी पत्रिकाओं में बड़ी और व्यावसायिक पत्रिकाओं की आलोचना करते रहते हैं पर चुपचाप इन्ही में छपने को लालायित रहते हैं। सच कहूं तो मुझे भी उनकी बात में सच्चाई नज़र आती थी। कई छोटी पत्रिकाओं के मेरे मित्र संपादक लगातार धर्मयुग,सारिका,इंडिया-टुडे जैसी पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजते और उनकी स्वीकृति का इंतजार करते रहते थे। मुझे लगता था कि व्यावसायिकता कहाँ नहीं हैं? क्या जो पत्रिका निकालेगा वह अपना लगाया हुआ धन लौटते हुए नहीं देखना चाहेगा? न जाने क्यों हर बात को अपने पक्ष में ही सोचने की हमारी मानसिकता बन जाती है।गुटबाजी और वर्गभेद भी इसी मानसिकता की देन है। यद्यपि मैं यह भी मानता हूँ कि हर समय , हर बात में सर्वश्रेष्ठ को स्वीकार करना भी बाकी लोगों की उन्नति में बाधक हो सकता है। दिलीप में थोड़ी कमी निकाल कर ही कोई अमिताभ, और अमिताभ में थोड़ी कमी बता कर ही कोई शाहरुख़ बनता है। लेकिन भारत के लिए अमेरिका बनना अभी काफी दूर की कौड़ी है। इस लिए हम अपने में सच को स्वीकार करने की कुव्वत पैदा करके ही अपना भविष्य सुनहरा बना सकते हैं। किसी को कोसना तो बहुत आसान है।हम अमेरिका की सदाशयता के रास्ते बड़प्पन खोजने की भावना का सम्मान क्यों न करें?

2 comments:

  1. बिल्कुल सही और स्पष्ट कहा है आपने। सहयोग हो या विरोध, यदि स्वार्थ से सना हो तो फिज़ूल है।

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  2. mujhe kuchh aisi baten bataiye jahan aap bharat ki tulna me amerika ko kam pate hain. ve baten hamare logon ki hosla - afzai karengi.

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