Friday, April 29, 2011

नज़र उडती पतंगों को लगती है, कटी पतंगों को नहीं.

"ये नज़र तो मिली, देखने के लिए ,पर देखने वालों ने कुछ इस तरह देखा कि नज़र लग गयी " आपने ख़बरों में पढ़ा - सुना होगा कि पिछले कुछ समय से अमेरिका में बार-बार तूफ़ान आ रहे हैं. कभी बर्फीले तूफ़ान आते हैं तो कभी मूसलाधार पानी के साथ. कभी तेज़ हवाओं के साथ. न जाने कुदरत को क्या हो गया है? और अब तो ऐसी ख़बरें भी आती हैं कि इन तूफानों में दर्ज़नों लोग मारे गए. क्या वहां प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है? क्या वहां पर्यावरणीय लापरवाही हो रही है? क्या वहां भौगोलिक केन्द्रों की पुनर्स्थापना हो रही है. क्या वहां प्रदूषण को हटाने में अनदेखी हो रही है? इनमे से कोई भी बात सही नहीं लगती, क्योंकि वह अमेरिका है. उसके लिए ऐसी आपदाओं की तकनीकी सम्भाल साधारण सी बात है. ऐसी विपत्तियों में अन्य देशों की सहायता करते रहने का उसका अपना एक इतिहास है.कोई नहीं मानेगा कि किसी मानवीय भूल या लापरवाही से आ रहे हैं अमेरिका में तूफ़ान. भारतीय चिर-परिचित अंदाज़ में सोचा जाये तो आसानी से कहा जा सकता है कि अमेरिका को नज़र लग गयी. यहाँ झोंपड़ियाँ हमेशा से बंगलों को नज़र लगाती रही हैं. और बंगला भी कोई ऐसा-वैसा न होकर राजा का हो , तब तो नज़र लगनी ही लगनी है.और अभी तो मंत्री का बंगला भी भू-कम्प से पूरी तरह नहीं उबरा. जापान की त्रासदी याद है न आपको? जाओ, पानी से तुम मरोगे अगर प्यासे हम मरेंगे, ऐसी दुआ देने में भला कितनी देर लगती है?   

No comments:

Post a Comment

प्राथमिक उपचार है तुष्टिकरण

यदि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे हों और उनमें से एक अपने को कमज़ोर पा कर रो पड़े तो हम उनमें फिर से बराबरी की भावना जगाने के लिए एक का तात्कालिक ...

Lokpriy ...