Friday, April 8, 2011

क्या तुम्हारी कहानी मुझे अब भी हीरो बना सकती है ,उसने पूछा

उन दिनों मैं मुंबई में था।धर्मयुग और कादम्बिनी-नवनीत के साथ-साथ फ़िल्मी पत्रिकाओं - माधुरी और फिल्मफेयर में भी लिख रहा था। पत्रिकाएं कहानी-लेखों के साथ-साथ लेखकों के पते भी छापतीं थीं।अतः इस तरह भी आपस में संपर्क बन जाते थे। एक बार एक फिल्म निर्माता ने एक छोटा सा पत्र लिख कर मुझे मिलने बुलाया। न जाने का कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि यह एक बड़ी बात मानी जाती थी।संक्षिप्त सी बात-चीत के बाद पता चला कि वे एक फिल्म बना रहे हैं, जिसका नाम उन्होंने ' सत्ताधीश ' बताया। मुझे कहानी का थीम बता कर उसे विकसित करने की बात उन्होंने की। इसी के साथ उन्होंने मुझे एक काम और दिया। बोले- हम परसों अमुक होटल में कुछ लड़के-लड़कियों का स्क्रीन-टेस्ट लेंगे। आप भी आजाना , और हमें टेस्ट के लिए कुछ द्रश्य व संवाद लिख कर देना। काम रोचक था, क्योंकि उन दिनों स्क्रीन टेस्ट बड़े वास्तविक हुआ करते थे जिनमे हर तरह से ठीक पाए जाने पर ही चयन होता था। आज स्थिति अलग है। अब तो तय होता है कि इसे ही लेना है, इसका जो ठीक नहीं है उसे ठीक कर लो। उन दिनों कोशिश करने अच्छे चेहरे-मोहरे वाले ही आते थे। टेस्ट के दिन वहां एक सोलह साल का हेंडसम सा लड़का भी आया। वह किसी संपन्न घर से था और बिहार से आया था। टेस्ट के दौरान उस से मेरी अच्छी पहचान हो गयी और वह मेरे साथ मेरे घर भी चला आया। सत्ताधीश तो नहीं बनी, पर बाद की कई मुलाकातों के बाद वह लड़का मेरे एक उपन्यास " रेत होते रिश्ते " का नायक बना। बाद में हमारा संपर्क टूट गया। परसों अन्ना हजारे के अनशन के सिलसिले में अख़बारों और टीवी से उसे मेरे बारे में पता चला, तो उसने फोन किया। वह अब मिलने आ रहा है, अब वह इक्यावन साल का है।

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