Thursday, April 28, 2011

अमेरिका की रईसी दिल से है

लोग कहते हैं कि रईसी दिल ही से होती है, और काहे से होगी? जी नहीं, कुछ मुल्कों में रईसी ईर्ष्या से होती है. कुछ में बेईमानी से होती है. कुछ में लालच से होती है. पर अमेरिका में सचमुच दिल से ही होती है. मेरे एक मित्र जवाहरात के बड़े व्यापारी हैं. बाहर हीरे-जवाहरात एक्सपोर्ट करते हैं. वे अक्सर मुझसे कहते हैं कि हमारा जितना माल सब देशों में मिल कर नहीं जाता उससे ज्यादा अकेले अमेरिका में जाता है. और महत्त्व पूर्ण यह नहीं है कि वहां ज्यादा माल जाता है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि वहां इस्तेमाल होने के लिए जाता है. वे लोग रोजाना  के तैयार होने में हलके जेवर पहनते हैं.पुराने हो जाने पर उन्हें छोड़ भी देते हैं, और बदल भी लेते हैं. वर्ना अब अमेरिका को कोसने वाले देशों में तो हीरे-जवाहरात तिजोरियों में रख कर , भाव चढ़ा-उतार कर मुनाफाखोरी करने के लिए खरीदे जाते हैं. वास्तव में कुछ लालचियों ने लोगों का जीना हराम कर छोड़ा है, ज्यादा पैसा बनाने  के चक्कर में.जिस सस्ती सी चांदी की पतली-पतली पाजेब कभी मध्यम-वर्गीय किशोरियों के पांव की शोभा होती थी , मुनाफाखोरों ने उसे भी गद्दी के नीचे दबा कर आसमान की पतंग बना दिया है. क्या कभी ऐसे मुनाफाखोरों और जमाखोरों की गति भी डायनासोरों जैसी होगी, जिन्हें जड़ से मिटा कर कुदरत इतिहास में दफ़न करदे. कभी तो कोई ऐसा चमत्कार हो, कि ऐसे लोग अपने सब रत्नों समेत मिटटी में मिल जाएँ.     

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